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मनरेगा पर नयी सरकार की सोच - चंदन श्रीवास्तव

किसी एक को या कुछ एक को मिले तो वह ‘दान' या फिर ‘उपहार' कहला सकता है, अधिकार नहीं. देनेवाले ने दया-दृष्टि से दिया तो ‘दान' और अगर चुनने-छांटने के मामले में अपने को आजाद मान कर दिया, तो ‘उपहार'. अधिकार न तो ‘दान' होता है और ना ही ‘उपहार', वह एक गुण की तरह है. जैसे दाल में नमक डालने से दाल के कण-कण नमक से भींग जाते हैं, वैसे ही राष्ट्र नामक राजनीतिक समुदाय का सदस्य होने मात्र से उसके हर नागरिक के भीतर अधिकार-संपन्न होने का गुण उत्पन्न हो जाता है. अधिकार स्वाभाविक है, यह राज्यसत्ता की मनमर्जी पर निर्भर नहीं कि वह कुछेक को अधिकार के मामले में उपकृत या पुरस्कृत करे और शेष को छोड़ दे.

केंद्र की नयी सरकार लोकतांत्रिक राजनीति की इस बुनियादी समझ को शायद दुरुस्त करना चाहती है कि अधिकार अपने स्वभाव में सार्विक होते हैं. मनरेगा (पहले नरेगा) एक्ट के प्रावधानों के मुताबिक, अब तक चलन था कि देश के प्रत्येक ग्रामीण गरीब परिवार को मांगने पर सरकार की ओर से साल में सौ दिन का गारंटीशुदा रोजगार दिया जायेगा, लेकिन नयी सरकार मनरेगा का दायरा सिकोड़ना चाहती है. वह अब मनरेगा को महज जनजातीय या पिछड़े जिलों तक सीमित करना चाहती है. साथ ही, सरकार की योजना मनरेगा एक्ट में संशोधन कर इसमें वर्णित मजदूरी और सामान के मौजूदा अनुपात (60:40 से घटा कर 51:49) को बदलने की है. सरकार ने राज्यों से यह भी कहा है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के शेष महीनों में वे मनरेगा पर अपना खर्च सीमित करें.
मनरेगा का एक्ट बना तो उसमें सहमति बीजेपी की भी थी.

लेकिन, केंद्र में सरकार गठन के तुरंत बाद से मनरेगा को लेकर सबसे असहज बीजेपी खेमा रहा. इस साल आम बजट से पहले राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी कि मनरेगा कानून को बदला जाये, ताकि यह रोजगार गारंटी की अधिकार आधारित योजना न रहे, राहत पहुंचाने की कोई सामान्य सरकार योजना बन जाये. ऐसा होते ही योजना पर होनेवाले खर्च और योजना के आकार को सीमित करना सरकार के अख्तियार में आ जाता है. वसुंधरा राजे की इसी समझ का एक रूप बीते जुलाई में देखने में आया. जुलाई में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने संसद को सूचित किया था कि मनरेगा कानून में बदलाव अपेक्षित है.

इसको अमलीजामा पहनाने की कोशिश भी शुरू हो चुकी थी. इस कोशिश को झटका सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लगा. जुलाई में सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया कि मनरेगा के अंतर्गत काम करनेवाले को न्यूनतम मजदूरी राज्यों द्वारा तय की गयी दर से दी जाये, न कि केंद्र सरकार द्वारा तय दर से. फिलहाल मनरेगा के तहत मजदूरी राज्यों द्वारा तय दर से मिलती है. अलग-अलग राज्यों में यह दर अलग-अलग है, तो भी कहीं भी यह सीमा डेढ़ सौ रुपये से कम नहीं है. केंद्र सरकार चाहती थी कि मनरेगा के तहत 119 रुपये मजदूरी दी जाये. सुप्रीम कोर्ट का फैसला सरकार की मंशा के आड़े आया, तो अब कोशिश यह है कि मनरेगा कानून को ही बदल दो, न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी.


तथ्य संकेत करते हैं कि मनरेगा के मद में किया जानेवाला बजट-आवंटन कम हो रहा है. वित्त वर्ष 2014-15 के लिए मनरेगा के मद में आवंटन महज 34,000 करोड़ रुपये का था, जो राज्यों द्वारा इस मद में मांगी गयी राशि से 45 प्रतिशत कम है. 2009-10 में देश की जीडीपी में मनरेगा के मद में हुए आवंटन का हिस्सा 0.87 प्रतिशत था, जो 2013-14 में घट कर 0.59 प्रतिशत हो गया. मनरेगा के अंतर्गत खर्च की गयी राशि का सालाना औसत 38 हजार करोड़ रुपये का रहा है, जबकि सालाना आवंटन औसतन 33 हजार करोड़ रुपये का हुआ है.

मुद्रास्फीति के बढ़ने और आवंटित राशि की कमी के दोतरफा दबाव में मनरेगा का क्रियान्वयन लगातार बाधित होता रहा है. आवंटन में हो रही कमी को ध्यान में रखें, तो समझ में आता है कि सौ दिन की जगह क्यों अभी तक मनरेगा में गरीब ग्रामीण परिवारों को सालाना औसतन 50 दिन का भी रोजगार नहीं दिया जा सका. मनरेगा के अंतर्गत 2013-14 में कुल 10 करोड़ लोगों को रोजगार मिला. अगर मजदूरी और सामान पर खर्च की जानेवाली राशि का अनुपात बदला जाता है, तो मनरेगा के अंतर्गत रोजगार-सृजन की मौजूदा दर कायम रखने के लिए अतिरिक्त 20 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी. चूंकि सरकार मनरेगा का बजट आवंटन बढ़ाने की जगह घटा रही है, विशेषज्ञों को आशंका है कि मनरेगा के रोजगार सृजन की क्षमता में 40 प्रतिशत की कमी आयेगी.

मनरेगा के विरोध में एक प्रबल तर्क योजना के क्रियान्वयन में होनेवाले भ्रष्टाचार का रहा है. लेकिन, भ्रष्टाचार की दलील देकर क्या किसी अधिकार को समाप्त किया जा सकता है? जीवन की रक्षा पूरी तरह नहीं हो पा रही है, तो क्या जीवन जीने से तौबा कर लिया जाये!