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महिला खेतिहरों के श्रम का अवमूल्यन क्यों-- ऋतु सारस्वत

हाल ही में जारी आर्थिक समीक्षा दो महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान खींचती है। एक यह कि कामकाजी महिलाओं की संख्या में गिरावट आई है। वर्ष 2005-06 में रोजगार में आ रही महिलाओं का प्रतिशत 36 था, जो कि कम होकर 2015-16 में 24 प्रतिशत रह गया है। दूसरा यह कि खेती, बागवानी, मत्स्य-पालन, सामाजिकी वानिकी में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होने पर भी, उन्हें लंबे समय से उचित महत्त्व नहीं दिया जा रहा है। ये दोनों तथ्य चर्चा-योग्य हैं। पहला प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में कामकाजी महिलाओं की संख्या में कमी आ रही है? दूसरा प्रश्न यह कि क्यों महिला कृषकों को उचित महत्त्व नहीं मिल रहा है? दरअसल, ये दोनों ही प्रश्न अंतर-संबंधित है। सर्वप्रथम, यह जानना जरूरी हो जाता है कि ‘कामकाजी' किसे माना जाता है? इस संबंध में, यह स्पष्टत: उल्लेखित है कि ‘कामकाजी' वह है जो अपने श्रम से अर्थार्जन करता हो और जिसकी आय को देश की सकल घरेलू आय में गिना जाए। तो क्या महिला कृषकों को कामकाजी माना जाता है? यह एक गहन विश्लेषण का विषय है।


मानव समाज में श्रम के असमान बंटवारे और उसके भेदभावमूलक निर्धारण के जरिए लैंगिक भेदभाव को स्थापित किया गया है। ‘ईयू-एफटीए लाइकली इम्पैक्ट ऑन इंडियन विमेन, सेंटर फॉर ट्रेड ऐंड डेवलपमेंट' के अनुसार, भारत में कुल कामकाजी महिलाओं में से चौरासी प्रतिशत महिलाएं कृषि उत्पादन और इससे जुड़े कार्यों से आजीविका अर्जित करती हैं। चाय उत्पादन में लगने वाले श्रम में 47 प्रतिशत, कपास उत्पादन में 48.84 प्रतिशत में उनका सीधा योगदान है। जाहिर है वे ‘कामकाजी' हैं। फिर उन महिलाओं का क्या, जो खेती से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हैं, पर उन्हें किसान नहीं माना जाता है और न ही उनके श्रम का आर्थिक मूल्यांकन होता है। दरअसल अब तक हम सब उसे ही ‘किसान' कहते आए हैं जिसका जमीन पर मालिकाना अधिकार होता है या जो हल जोतता है। जनगणना 2011 के अनुसार, कुल महिला कामगारों में से 55 प्रतिशत कृषि श्रमिक और 24 प्रतिशत खेतिहर थीं, जबकि जोत क्षेत्रों में मात्र 12.8 प्रतिशत का स्वामित्व लैंगिक असमानता को प्रतिबिंबित करता है। विश्व खाद्य एवं कृषि (एफएओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘पहाड़ी इलाकों में लगभग एक एकड़ के खेत में हर साल एक बैल 1064 घंटे, पुरुष खेतिहर 1212 घंटे और एक महिला खेतिहर 3485 घंटे काम करते हैं।' बावजूद इसके, महिलाओं को किसान क्यों नहीं माना जाता? यह उल्लेखनीय है कि कुछ दशकों में पुरुषों के गांवों से हट कर शहरों की ओर पलायन करने के चलते खेतिहारों, उद्यमियों और श्रमिकों के रूप में महिलाओं की बढ़ती संख्या से कृषि क्षेत्र का काफी हद तक ‘नारीकरण' हो गया है।


भारत में कृषिक्षेत्र में कुल श्रम की साठ से अस्सी प्रतिशत हिस्सेदारी ग्रामीण महिलाओं की है। वैश्विक रूप से अनुभवसिद्ध साक्ष्य है कि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्थानीय कृषि जैव विविधता बनाए रखने में महिलाओं की निर्णायक भूमिका है। एकीकृत प्रबंधन और दैनिक घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति में विविध प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग का श्रेय भी ग्रामीण महिलाओं को जाता है और यह स्थिति भारत की ही नहीं बल्कि विश्व भर की है। संपूर्ण विश्व में, कृषि व्यवस्था के प्रबंधन में महिलाओं का योगदान पचास प्रतिशत से ज्यादा है। खाद्य एवं कृषि संगठन के आंकड़ों के मुताबिक कृषिक्षेत्र में कुल श्रम में ग्रामीण महिलाओं का योगदान 43 प्रतिशत है वहीं कुछ विकसित देशों में यह आंकड़ा 70 से 80 प्रतिशत भी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और डीआरडब्ल्यूए की ओर से नौ राज्यों में किए गए एक शोध से पता चलता है कि प्रमुख फसलों की पैदावार में महिलाओं की भागीदारी पचहत्तर प्रतिशत तक रही है। इतना ही नहीं, बागवानी में यह आंकड़ा 79 प्रतिशत और फसल कटाई के बाद के कार्यों में 51 प्रतिशत तक है। इसके अलावा, पशुपालन में महिलाओं की भागीदारी 58 प्रतिशत और मछली उत्पादन में 95 प्रतिशत तक है।


राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के आंकड़ों के अनुसार तेईस राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में ग्रामीण महिलाओं के कुल श्रम की हिस्सेदारी पचास प्रतिशत है। छत्तीसगढ़, म.प्र. और बिहार में यह भागीदारी सत्तर प्रतिशत है। शोध के अनुसार, पौध लगाना, खरपतवार हटाना और फसल कटाई के बाद ग्रामीण महिलाओं की सक्रिय भागीदारी शामिल है। पूरे भारत में महिलाएं खेती के लिए जमीन तैयार करने, बीज चुनने, अंकुरण संभालने, बुआई करने, खाद बनाने, खरपतवार निकालने, रोपाई, निराई-गुड़ाई और फसल कटाई का काम करती हैं। वे ऐसे कई काम करती हैं जो सीधे खेत से जुड़े हुए नहीं है पर कृषि क्षेत्र से संबंधित हैं। मसलन, पशुपालन का लगभग पूरा काम उनके जिम्मे होता है। घर के लिए जलाऊ लकड़ी, परिवार के लिए लघु वनोपज और पशुओं के लिए घास का प्रबंध उन्हीं का दायित्व है। बावजूद इसके वे स्वयं को ‘कामकाजी' कहलाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।


यह बात गौर करने लायक है कि संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था कुछ इस तरह की है कि स्त्री को उसके किए गए हर कार्य के लिए यह बताया जाता है कि उसका श्रम, ‘श्रम' नहीं, घरेलू सहयोग मात्र है और यही कारण है कि अधिकांश महिलाएं जो कृषिकार्य में संलग्न हैं स्वयं भी यह मानती हैं कि वे कोई कार्य नहीं करती। भूस्वामित्व और किसानी के बीच का अंतर भारतीय कृषि संरचना का ही बुनियादी अवरोध नहीं है, यह स्त्री के अधिकार, उसके निर्णय की क्षमता, उसकी आत्मनिर्भरता व उसके आत्मविश्वास का भी अवरोध है, क्योंकि जमीन का स्वामित्व एक अहमसामाजिक व आर्थिक पहलू है। ‘मांउटेन रिसर्च जर्नल' में उत्तराखंड के गढ़वाल अंचल का एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। इसका विषय था- ‘परिवार की खाद्य और आर्थिक सुरक्षा में महिलाओं का योगदान'। इस अध्ययन में महिलाओं ने अध्ययनकर्ताओं से कहा कि वे कोई काम नहीं करतीं, पर जब विश्लेषण किया गया तो पता चला कि परिवार के पुरुष औसतन नौ घंटे काम कर रहे थे जबकि महिलाएं सोलह घंटे काम कर रही थीं। अगर तात्कालिक सरकारी दर पर उनके काम के लिए भुगतान किया जाता तो पुरुष को 128 रु. प्रतिदिन और महिला को 228 रु. प्रतिदिन प्राप्तहोते। सच तो यह है कि कृषिकार्य पूर्ण रूप से लैंगिक असमानता जनित हैं और इस तथ्य की पुष्टि विभिन्न अध्ययनों से हो रही है। ‘लैंड ऑफ द टिलर: रिविजटिंग द अनफिनिश्ड लैंड रिफॉर्म्स एजेंडा' में उल्लेखित है कि हरित क्रांति भी लिंग-पक्षपाती (जेंडर बायस्ड) है।


यह बेहद अफसोसनाक है कि जो महिलाएं दिन-रात, कृषि और उससे संबंधित कार्य करती हैं, उन्हें न इसका श्रेय दिया जाता है न उनके श्रम का मूल्य आंका जाता है। अपने अधिकारों, अवसरों और सुविधाओं की अनभिज्ञता के चलते कृषि में उनकी भागीदारी नकारी जा रही है। यह आवश्यक हो जाता है कि महिला कृषकों की भूमि, जल, ऋण, प्रौद्योगिकी और प्रशिक्षण जैसे संसाधनों तक सहज पहुंच हो। जमीन पर महिला किसानों का स्वामित्व उनकी परिस्थिति तथा कृषि उत्पादन, दोनों में सुधार लाएगा। भूमि, ऋण, जल, बीज और मंडियों जैसे संसाधनों तक महिलाओं की विशिष्ट पहुंच सुनिश्चित करने की जरूरत है। यों तो कृषिक्षेत्र में महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए केंद्र ने सभी चालू योजनाओं, कार्यक्रमों तथा विकास कार्यकलापों में महिला लाभार्थियों की खातिर बजट आबंटन का कम से कम तीस प्रतिशत अलग से रखा है। आर्थिक समीक्षा 2017-18 में भी यह स्वीकार किया गया है कि ‘कृषि में उत्पादकता बढ़ाने के लिए महिलाओं के कृषि मूल्य कड़ी के- कृषि उत्पादन, फसल पूर्व, कटाई के बाद प्रसंस्करण, विपणन- सभी स्तरों पर महिला विशिष्ट हस्तक्षेप अनिवार्य है।'