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महिला सशक्तिकरण पर भारतीय जनता पार्टी के खाने के दांत अलग हैं और दिखाने के अलग--- अनुमा आचार्य

देश में, खासतौर पर उत्तर प्रदेश में कुछ दिनों पहले हुई और मुख्यधारा के मीडिया से जानबूझकर अनदेखा किए जाने वाली घटनाओं के बारे में सोचते हुए एक विचार बड़ी शिद्दत से मन में आया कि जिनकी बेटी, पत्नी या बहन न हों, उनमें संवेदनशीलता की कमी जाहिराना तौर पर भी दिख ही जाती है. इस सोच के पीछे कुछ और भी तथ्य हैं, जिन पर ध्यान देने से बात स्पष्ट होती है.

एक तरफ जहां देश की महिला-पुरुष जनसंख्या के अनुपात में खास सुधार नहीं दिख रहा (यह पूरे पचास प्रतिशत पर भी नहीं पहुंच स्का है), वहीं दूसरी ओर आए दिन कई तरीकों से लड़कियों और महिलाओं के मनोबल को गिराने वाले हादसे भी हो रहे हैं.

खासतौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश से अब भी रोजाना मिलने वाली खबरों में लड़कियों और महिलाओं, यहां तक कि छोटी बच्चियों पर होने वाली ज्यादतियों की घटनाएं ज्यादा संख्या में हैं.

चाहे वह गैंगरेप के वीडियो वायरल किए जाने की बात हो, बलात्कार के आरोपी को बचाने की जद्दोजहद में पीड़िता को ही निशाना बनाकर जेल में डालने की या पीड़ित लड़की को ही रास्ते से ही हटा देने की, निशाने पर महिलाएं ही हैं.

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में बात करें तो ऐसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का न कोई बयान आता है और न ही आश्वासन. कार्यवाही होती तो है, पर न्याय के बजाय पार्टी के उन दोषी नेताओं के आरोपों को हल्का करने की दिशा में ज्यादा लगती है, चाहे वह चिन्मयानंद मामले में अब तक की कार्रवाई हो या कुलदीप सेंगर मामले में गिरफ़्तारी.

जाहिर सी बात है कि न्याय में जानबूझकर लगाई जाने वाली यह देर पीड़ित लड़की के लिए हर तरह से अवसाद या डिप्रेशन का कारण बनती चली जाती है और ऐसे में पीड़िता का आत्मविश्वास भी खत्म होने लगता है. लंबी कानूनी लड़ाई न केवल डरा देती है, बल्कि साथ देने वालों की या तो हिम्मत तोड़ देती है या उन्हें लालच अथवा भय का शिकार बना देती है.

द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें