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महिलाओं का सतत विकास--- डॉ सय्यद मुबीन जेहरा

लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्य के केंद्र में मानवता का विकास छुपा है. लोकतंत्र किसी एक की सत्ता नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है सत्ता में सब का योगदान और सभी का विकास. इसलिए जब हालिया सरकार ने सबका साथ सबका विकास की बात की, तो इसे कुछ लोग अलग-अलग सामाजिक ताने-बाने के अनुसार परखने और प्रचारित करने में लगे.

लोकतंत्र एक छोटा-सा शब्द भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी विचारधारा है, जिससे बेहतर अभी तक कुछ भी मानवता की नजर में नहीं है. इसलिए हर समाज में जितनी भी धाराएं निकलती रही हैं, वे लोकतांत्रिक मूल्यों को केंद्र में रख कर अपना कोई आंदोलन या अपनी बात आगे बढ़ाती हैं. लेकिन, प्रश्न यह उठता है कि लोकतंत्र की इस सोच में नारी शक्ति का भी कोई विशेष स्थान है या नहीं?

इतिहास यह बताता है कि लोकतंत्र की शुरुआत प्राचीन यूनान के नेशन-स्टेट्स में हुई. इतिहास में यह बड़ी उपलब्धि है कि लोकतंत्र ने अपने पैर पसारे. लेकिन, यह प्राचीन लोकतांत्रिक इतिहास भी महिलाओं को लेकर इतना लोकतांत्रिक नहीं था. विश्व के इस पहले लोकतांत्रिक रूप में महिलाओं की कोई भी भूमिका नहीं थी और ना ही उन्हें लोकतंत्र में शामिल होने योग्य माना जाता था.

यानी जिसकी शुरुआत ही महिलाओं को किनारे रख कर की गयी हो, उस लोकतंत्र में आज तक अगर महिलाएं अपने अस्तित्व के लिए तड़प रही हैं, तो अचंभा नहीं होना चाहिए. यूनान के लोकतांत्रिक समूहों में महिलाओं का कोई भी प्रतिनिधित्व नहीं था और उन्हें केवल घरेलू माहौल में रहने योग्य ही माना जाता था. विश्व के कई राजवंशों में भी महिलाओं के साथ अन्याय हुआ और उन्हें लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व मिलने में हजारों साल लग गये. अगर हम अपने यहां ही देखें, तो रजिया सुल्तान को अपने हक पाने के लिए लड़ना ही पड़ता है. राजशाही में होनेवाली बड़ी-बड़ी साजिशों का मकसद ही औरत को उसके अधिकार से वंचित करना होता रहा है.

इन दिनों आयी फिल्म बाहुबली भी इसको रेखांकित करती है. हालांकि, बाहुबली में जो कुछ है, वह इतिहास का हिस्सा नहीं है, लेकिन हमारे समाज की ऐनक से किसी और के, कहीं और के इतिहास में झांकने की कोशिश तो हम इसे भी कह सकते हैं. महिलाओं को हर दौर में और हर सभ्यता में अपने अधिकार के लिए या तो भीख मांगनी पड़ी है या फिर लड़ना पड़ा है. महिलाओं को कुछ भी आसानी से नहीं मिला है. यूनान हो या यूरोप या अरब का मरुस्थल जहां, इसलाम के आने के बाद महिलाओं का जीवन कुछ बेहतर हुआ और उन्हें जीने का भी अधिकार मिला, लेकिन यह भी त्रासदी है कि उसी अरब क्षेत्र के कई देशों में महिलाओं को वे अधिकार नहीं मिल पाये हैं, जिनका वादा लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में किया जाता है. हमारे इस पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में उन्हें अपने हक के लिए आज तक लड़ना पड़ रहा है. आज भी महिला आंदोलनों में मुद्दा वही नजर आता है- महिलाओं के हक का हनन. बस रूपरेखा थोड़ी बदल गयी है.

आज विश्व के कई लोकतांत्रिक देश अपने आपको विकसित करने में और आगे बढ़ने में लगे हुए हैं. वैश्विक तौर पर देखें, तो अपने-आप को लोकतंत्र का आईना माननेवाले देशों में कई तो आज महिलाओं के विकास के पायदान पर पहली सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाये हैं. महिलाओं के हक की बात तो बहुत बाद में आती है, सबसे पहले तो उनके योगदान की श्रेणी भी देश के विकास की श्रेणी में आती है कि नहीं, यह भी एक बड़ा सवाल है. विश्व में महिलाओं के कई ऐसे काम हैं, जो आर्थिक तौर पर योगदान ही नहीं समझे जाते. उन्हें विकास की परिभाषा और श्रेणी में जगह ही नहीं मिलती है. समाज की मुख्यधारा पर उदारीकरण का बहुत अधिक प्रभाव नजर आता है. लेकिन, इस उदारवाद का कोई फायदा महिलाओं को पहुंचा है, ऐसा तो प्रतीत नहीं होता.

पूंजीवाद और बाजारीकरण से महिलाओं को आजादी मिली है या उनकी राह और मुश्किल हो गयी है, यह एक बड़ी बहस का मुद्दा है. इसी तरह, विकासशील देशों में महिलाओं के हक को लोकतांत्रिक माना गया है या नहीं, यह भी एक अहम मुद्दा है. महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने की जरूरत है.

महिलाओं की स्थिति को ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स (वैश्विक लैंगिक अंतर) की रिपोर्ट को नजर में रखते हुए सुधारने की जरूरत है. संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक लैंगिक अंतर 2016 की रिपोर्ट कई बिंदुओं को दर्शाती है, जो यह साफ करता है कि लोकतंत्र का आना महिलाओं के लिए लोकतांत्रिक है या नहीं. वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट को पहली बार 2006 में शुरू किया गया. इस रिपोर्ट के बनने में विश्व आर्थिक फोरम वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की यही मंशा थी कि विश्व में लैंगिक अंतर के कारणों और उनको समाप्त करने की कोशिश वैश्विक रूप से करनी होगी. अगर वैश्विक लैंगिक अंतर 2016 की रिपोर्ट देखी जाये, तो आइसलैंड जैसे छोटे देश सबसे ऊपर नजर आते हैं और रवांडा जैसा देश भी पहले दस देशों में है. भारत इन 144 देशों में 87वें पायदान पर है. भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसरों के आंकड़े उसे 87वें पायदान पर दिखाते हैं, तो वहीं शिक्षा प्राप्ति में उसे 113वें पायदान पर दिखाते हैं.

इन आकड़ों से अलग एक बड़ी बात यह है कि हम महिलाओं के विकास को लोकतांत्रिक विकास के साथ नहीं जोड़ते हैं. यही कारण है कि महिलाओं का सतत् विकास नहीं हो पाता है.

वैसे भी महिलाओं को जाति-धर्म और भाषा के अलग-अलग खानों में बांट कर उसकी शक्ति और कम करने की साजिश की जाती है. ऐसे में नारी उत्थान को समर्पित लोगों के लिए बड़ा कठिन समय है.

इसलिए हमें लोकतंत्र के वर्चस्व के लिए नारी उत्थान को भी लोकतांत्रिक मर्यादा और मूल्यों से जोड़ कर देखना चाहिए. जिस लोकतंत्र में महिलाएं सुरक्षित और स्वस्थ जीवन जी रही हों, उन्हें किसी प्रकार की अपने अस्तित्व की जंग नहीं लड़नी पड़ रही हो, उस समाज और लोकतंत्र को हम सच्चा लोकतंत्र करार दे सकते हैं. लेकिन, सवाल यह है कि क्या ऐसा लोकतंत्र कहीं मौजूद है? अगर इसका उत्तर नहीं में है, तो हमें बहुत कुछ सोचने और करने की जरूरत है.