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मानवीय गरिमा के खिलाफ--- कनिष्का तिवारी

नए साल की शुरुआत में ही हस्त आधारित मल निस्तारण की वजह से सात लोग अपनी जान गंवा बैठे। वर्ष 2017 में यदि अखबारों के आंकड़ों पर ही गौर करें तो सौ दिनों के अंतराल में सत्रह मजदूरों को इस अमानवीय कार्य में लगने के चलते अपनी जान गंवानी पड़ी। यह एक ऐसी समस्या है जो व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाती है, साथ ही संविधान व मानवीय आचरण के मूलभूत सिद्धांतों को भी। बेहद गरीब परिवार से आने वाले ये सफाई कर्मचारी झाड़ू, बाल्टी जैसे साधारण-से उपकरण का इस्तेमाल करते और अपनी सेहत को दांव पर लगाते हुए दस रुपए से लेकर सौ रुपए तक की दिहाड़ी में इस कार्य को करते हैं। इनमें से कुछ की मौत सेप्टिक टैंक में फैली जहरीली गैस से हो जाती है, तो कई लोग मानव मल व अपशिष्ट की गंदगी में घुटन से दम तोड़ देते हैं। स्थिति जितनी घिनौनी है, उससे कहीं ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण।


इस कुप्रथा ने देश के लगभग हर राज्य में अपने पैर पसार रखे हैं। भारत में इस कार्य में लगभग बारह लाख व्यक्ति संलग्न हैं। ग्रामीण इलाकों में आज भी खुलेआम अनेक व्यक्ति हाथ से मानव मल की सफाई का काम करते हैं। इस तरह का कार्य करने वाले व्यक्ति को समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिलता। वे अनेक शारीरिक व मानसिक समस्याओं से पीड़ित भी होते हैं। एक तरह से उन्हें समाज का एक अलग-थलग अंग ही मान लिया जाता है। साथ ही, इस कार्य के लिए उन्हें बेहद कम मेहनताना मिलता है। शहरों से ज्यादा बुरी स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों में है, जहां आज भी इस प्रकार के सफाईकर्मी हीन भावना के शिकार हैं। न केवल वे, बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ी भी इसका शिकार होती है। विद्यालयों में उनके बच्चों को अलग बिठाया जाता है और मिड-डे मील जैसी योजनाओं के तहत उनको भोजन भी अलग से उपलब्ध करवाया जाता है। कहीं-कहीं तो वे आज भी अछूत समझे जाते हैं।


इस तरह के कार्य दलित विशेषकर ‘वाल्मीकि' समुदाय के लोगों द्वारा किए जाते रहे हैं। इस सामाजिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को नकारा नहीं जा सकता, पर इस समस्या को केवल जातीय विश्लेषण तक सीमित रखना ठीक नहीं है। कई जगह यह भी देखने को मिला है कि कुछ गैर-दलित समुदायों के लोगों ने भी रोजगार के अभाव में, अपने रिहायशी क्षेत्र को छोड़ कर अन्य जगहों पर इस प्रकार के कार्य किए हैं। इससे एक बात तो साफ होती है कि वर्तमान में यह समस्या किसी एक जाति-समुदाय तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि तकनीक व रोजगार के अभाव और आर्थिक असमानता से उपजी एक ऐसी बड़ी बीमारी बन चुकी है जिसकी एक प्रगतिशील और सभ्य समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए।


कहना गलत नहीं होगा कि इस तरह का कार्य करने वाले लोगों में शिक्षा का अभाव है और नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता नहीं है, जो कहीं न कहीं उनके पिछड़ेपन का एक प्रमाण है। वर्ष 1993 में पारित और वर्ष 2013 में संशोधित ‘सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) एवं पुनर्वास अधिनियम' के तहत शुष्क शौचालयों में हस्त आधारित मल निस्तारण की प्रक्रिया से संबंधित नियुक्तियों को गैर-कानूनी करार दिया गया था। 2013 में उपर्युक्त कानून में हुए संशोधन में इस कार्य से जुड़े व्यक्तियों के पुनर्वास की बात भी कही गई थी, मगर इस कानून के लागू होने के इतने वर्षों बाद भी आज स्थिति में न के बराबर ही सुधार हुआ है।


नगरपालिकाओं द्वारा जब सीवर आदि से जुड़ी निविदाएं प्रस्तावित की जाती हैं, तो निविदा पाने वाले ठेकेदार अकसर पैसा बचाने के लिए ग्रामीण व पिछड़े इलाकों से मामूली दिहाड़ी पर उन लोगों को काम पर रखते हैं जो हाथ, झाड़ू या बाल्टी से मल व अन्य गंदगी हटाने का काम करते हैं। इस तरह का काम लेने पर पाबंदी के बरक्स संबंधित कानून की अवज्ञा आम बात है। और तो और, जब भी इस पेशे से जुड़े लोगों की मृत्यु होती है, तो ज्यादातर यही देखने को मिलता है कि पुलिस, लापरवाही से मौत अथवा दुर्घटना का मामला बना कर मूल वजह को ही दबा देती है। भारतीय रेल में निचले स्तर पर इस कानून की धज्जियां उड़ते हुए विशेष तौर पर देखा जा सकता है।


मार्च 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने, एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, माना था कि देश में 96 लाख से अधिक शुष्क शौचालय हैं, मगर सरकारी आंकड़ों में इन शौचालयों की सफाई करने वालों की संख्या ठीक से स्पष्ट न करते हुए सिर्फ सात लाख के आसपास बताई जाती है। इस समस्या से निपटने के लिए कानून के अलावा सामाजिक स्तर पर भी कुछ प्रयास हुए और हो रहे हैं। इस दिशा में कई समाजसेवियों ने प्रयास किए हैं। डॉ बिंदेश्वर पाठक ने ‘सुलभ शौचालय' नाम से एक पहल की, जिसके द्वारा सार्वजनिक शौचालयों की अवधारणा का इस देश में विकास हुआ है और स्वच्छता को बढ़ावा मिला है। इसके अलावा सामाजिक कार्यकर्ता बेजवाडा विल्सन ने 1994 में ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन' की शुरुआत की, जिसके तहत उन्होंने शुष्क शौचालयों के निर्माण पर प्रतिबंध लगवाने का जिम्मा जोर-शोर से उठाया। यहां एक यह कदम भी उल्लेखनीय होगा कि हाल ही में इस समस्या के समाधान के लिए केरल में ‘केरल वाटर अथॉरिटी' तथा ‘केरल स्टार्टअप मिशन' के बीच ‘बंदिकूत' नामक रोबोट तथा संबंधित तकनीक के हस्तांतरण के सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं। यह रोबोट इस हस्त आधारित मल निस्तारण के कार्य को अंजाम देगा। इसमें कैमरा, ब्लूटूथ आदि उपकरण लगे हैं, जिससे यह अपना कार्य सुचारु रूप से कर सके। इस तरह की अन्य तकनीकों का निर्माण तथा उपयोग देश के अन्य क्षेत्रों में भी होना चाहिए।


हालांकि इन कोशिशों के ठोस परिणाम अभी कम ही सामने आए हैं। खास तौर पर तब जब 2013-14 के बजट से इस गतिविधि में लिप्त पेशेवरों के पुनर्वास का बजट 557 करोड़ से लगातार घटते हुए 2017 में पांच करोड़ पर आ चुका है। स्वच्छ भारत अभियान को जोर-शोर से चलाने का दम भरने वाली सरकार द्वारा इस दिशा में बजट में कमी लाना समझ से परे है। क्योंकि यहां बात केवल स्वच्छता से नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, उनके मौलिक अधिकारों और उनकी अपनी गरिमा से भी जुड़ी हुई है, जिसकी रक्षा करना एक कल्याणकारी राज्य की सरकार की जिम्मेदारी है।


इस कुप्रथा के खात्मे के लिए सरकार को इसे स्वच्छ भारत अभियान से जोड़ना चाहिए। इसके अलावा आधारभूत संरचना में सुधार लाते हुए तकनीक द्वारा मल निस्तारण की पद्धति का विस्तार अनेक क्षेत्रों में करना चाहिए। स्वीडन व कई अन्य देशों के साथ, इस समस्या के समाधान के लिए, तकनीक के हस्तांतरण का करार किया जा सकता है। साथ ही, इस कुप्रथा का बोझ ढोने को अभिशप्त श्रमिकों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किए जाने की जरूरत है। किसी बीमारी से पीड़ित होने पर उनकी जांच करवानी चाहिए और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। ग्रामीण स्तर पर सरकार को समय-समय पर औचक निरीक्षण करते हुए इन गतिविधियों की निगरानी करते रहनी होगी। देश को स्वच्छ बनाना ही पर्याप्त नहीं है, इसे स्वच्छ बनाने का रोजाना भार उठाने वाले स्वच्छताकर्मियों के जीवन में गुणात्मक विकास लाना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है।