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मानसिक रोगों की फैलती जड़ें-- मोनिका शर्मा

महिलाओं के सशक्तीकरण की तमाम योजनाओं और तमाम स्त्री-विमर्श के बरक्स स्त्रियों के स्वास्थ्य से जुड़े मुद््दे हाशिये पर हैं। विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर तो न खुद महिलाएं सजग हैं और न ही समाज और परिवार में दिमागी अस्वस्थता के मायने समझने की कोशिश की जाती है। यही वजह है कि अनगिनत बीमारियों की जकड़न से लेकर बाबाओं के फेर तक, सब कुछ यह साबित करता है कि भारत में महिलाएं मानसिक रूप से कितनी परेशान रहती हैं। सामाजिक-पारिवारिक और कामकाजी मोर्चों पर एक साथ जूझ रही महिलाएं आज बड़ी संख्या में मानसिक तनाव का शिकार बन रही हैं। उनके जीवन का अनचाहा हिस्सा बना यह तनाव उन्हें न केवल अवसाद की ओर ले जा रहा है बल्कि कई अन्य मानसिक व्याधियों की भी वजह बन रहा है। अनगिनत जिम्मेदारियों के दबाव और हमारी व्यवस्थागत असंवेदनशीलता के चलते स्त्रियों को हर कदम पर उलझनों का शिकार बनता पड़ता है। कभी अपराध-बोध तो कभी असुरक्षा का भाव उन्हें घेरे रहता है। ऐसे में वाकई आज के असुरक्षित और असंवेदनशील परिवेश में आधी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य भी एक भी चिंता का विषय है।

 

भावनात्मक आधार पर परिवार और समाज की रीढ़ महिलाएं आज इन मानसिक व्याधियों का शिकार बन रही हैं। गृहणी हों या कामकाजी, मानसिक तनाव और अवसाद उनके जीवन में जड़ें जमा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर पांच में से एक महिला और हर बारह में से एक पुरुष मानसिक व्याधि का शिकार है। मानसिक रोग आज के दौर में सभी वर्गों और हर उम्र के लोगों को अपनी चपेट में ले रहे हैं। लेकिन महिलाएं तेजी से इनकी गिरफ्त में आ रही हैं, क्योंकि वे आज भी अपनी परेशानियां खुल कर नहीं कह पाती हैं, जिसके चलते अवसाद और तनाव के जाल में वे ज्यादा फंसती हैं। कई बार तो वे इस समस्या से घिर भी जाती हैं और उन्हें भान तक नहीं होता कि वे किस उलझन में हैं। भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी जागरूकता नहीं है। विशेषकर महिलाओं के बारे में तो यह बात विचारणीय ही नहीं मानी जाती। इन रोगों के जाल में फंसे लोग और उनके परिजन भी इलाज के बारे में कम ही सचेत दिखते हैं। 1982 में भारत में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इसका मकसद था कि लोगों के बीच मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाई जाए। 1987 में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम भी बना। फिर भी आज तक हमारे यहां न केवल मानसिक रोगों के इलाज के लिए उपलब्ध सेवाओं और मनोचिकित्सकों की भारी कमी है बल्कि शिक्षा के आंकड़े बढ़ने के बावजूद इस मामले में सतर्कता और संवेदनशीलता देखने को नहीं मिलती। सामाजिक स्तर पर भी इस उदासीनता ही दिखती है। जागरूकता कहां से आएगी?

 

संचार माध्यमों की भूमिका भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती, बल्कि कुछ टीवी चैनलों पर तो रोज कोई न कोई धारावाहिक या अन्य कोई कार्यक्रम ऐसा आता रहता है जो अंधविश्वास के नाना रूपों को और बढ़ावा देता है। ऐसे कार्यक्रमों के दर्शकों में महिलाएं ज्यादा होती हैं। टीवी कार्यक्रमों की दिशा इससे उलट भी हो सकती है, होनी ही चाहिए, जिससे अंधविश्वास से दूर होने की प्रेरणा मिले। पर बेहद अफसोस की बात है कि मनोरंजन के नाम पर जादू-टोने और बाबाओं के तंत्र-मंत्र आदि में रोज-रोज दिलचस्पी जगाई जा रही है!


आज दुनिया भर में पैंतालीस करोड़ से भी अधिक लोग मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। भारत में पांच करोड़ लोग मानसिक अस्वस्थता के शिकार हैं। मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर भी चिंता का विषय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2020 तक भारत में अवसाद दूसरा सबसे बड़ा रोग होगा और उस समय तक यह महिलाओं में सबसे आम बीमारी होगी। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं मानसिक रोगों की ज्यादा शिकार हैं। पुरुषों की अपेक्षा दोगुनी संख्या में महिलाएं रोगों से ग्रस्त हैं। प्रसव की संस्थागत सुविधा और सुरक्षित मातृत्व की योजनाओं के लाभ से बहुत सारी महिलाएं वंचित हैं। मां बनने के सुखद और चुनौतीपूर्ण दौर में उनके कई तरह की मनोवैज्ञानिक और शारीरिक समस्याएं पैदा होती हैं। इस दौरान उनकी जरूरतें भी आम महिलाओं से अलग हो जाती हैं। सही देखभाल न मिलने पर वे अवसाद का शिकार भी बन जाती हैं। ऐसी महिलाओं की तादाद बढ़ रही है जो लगातार एक खास तरह की मानसिक स्थिति से जूझ रही हैं। यही नहीं, भारत में गृहणियों में आत्महत्या के मामले भी तेजी से बढ़े हैं।

 

असल में देखा जाए तो हमारा सामाजिक-पारिवारिक ढांचा ही ऐसा है कि बहुत सारी महिलाएं उलझनों से बाहर आ नहीं पाती हैं। साथ ही, उनके साथ समाज में होने वाला भेदभावपूर्ण व्यवहार, घरेलू हिंसा और बलात्कार जैसे मामले भी चिंता का विषय हैं। असुरक्षा का भाव उन्हें घर के भीतर भी घेरे रहता है और घर के बाहर भी। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में दो तिहाई गृहणियां घरेलू हिंसा या उत्पीड़न की शिकार हैं। इतना ही नहीं, 2009 में हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में चालीस फीसद महिलाएं रोज किसी न किसी बहाने पति की हिंसा का शिकार बनती हैं। कई शोध यह साबित करते हैं कि अपनों से मिलने वाला अमानवीय और कटुतापूर्ण व्यवहार मानसिक स्वास्थ्य को सबसे अधिक हानि पहुंचाता है। भारत की स्त्रियों में मानसिक रोग बढ़ रहे हैं, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनमें से अधिकांश के साथ कैसा सलूक होता होगा।

 

बीते कुछ बरसों में बड़ी संख्या में महिलाएं कामकाजी बन घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। शारीरिक और मानसिक हिंसा गृहणियां ही नहीं, कामकाजी और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएं भी झेलती हैं। यह आम धारणा है कि अशिक्षित और निचले तबके में ऐसे मामले अधिक होते हैं, जबकि हकीकत यह है कि उनमें और कामकाजी महिलाओं में इस मामले में कोई खास फर्क नहीं है। महानगरों में रहने वाली कामकाजी स्त्रियों में मानसिक तनाव और अवसाद अधिक देखने को मिल रहा है। शायद इसका एक बड़ा कारण उन पर काम का दोहरा बोझ होगा। घर तथा दफ्तर में अपनी जिम्मेदारियों पर खरा उतरने का दबाव उन्हें लगातार परेशानी में रखता है, जिसके चलते उनका मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है। कई बार वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती हैं।

 

घर हो या बाहर, महिलाओं के साथ होने वाला असंवेदनशील व्यवहार उनके मानसिक स्वास्थ्य को बड़ा आघात पहुंचाता है। नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज के अनुसार, भारत में आज दो करोड़ से अधिक लोग गंभीर मानसिक असंतुलन के शिकार हैं। महिलाओं में ये आंकडेÞ पुरुषों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में देश की आधी आबादी के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना आवश्यक है।आज महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा कामकाजी है। ऐसे में, घर-परिवार की धुरी होने के साथ ही आर्थिक क्षेत्र में भी उनकी काफी भागीदारी है। उनमें तनाव और अवसाद के बढ़ते मामले बेहद चिंताजनक इसलिए भी हैं कि इसका असर न केवल वर्तमान में घर-समाज पर पड़ रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को भी इसका खमियाजा भुगतना पड़ेगा। उन्हें मानसिक तौर पर दुरुस्त रखने के लिए घर और बाहर, दोनों जगह सुरक्षित व सम्मानजनक माहौल की दरकार है। सहयोग-भरा संग-साथ और संवेदनशील पारिवारिक व्यवस्था उनके लिए बड़ा संबल बन सकती है।