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मीडिया के लिए आत्मचिंतन का समय- अनूप भटनागर

17वीं लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया संपन्न हो गयी है लेकिन सात चरणों के इस चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के बयानवीर नेताओं और मीडिया की भूमिका सुर्खियों में रही। नतीजा यह हुआ कि न्यायपालिका ने राजनीतिक दलों के नेताओं को कटुता पैदा करने वाले भाषणों के लिये आड़े हाथ लेने के साथ ही इस तरह के भाषणों और बयानों को प्रमुखता देने की मीडिया की भूमिका पर भी नाराजगी व्यक्त की। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी अब आत्मनिरीक्षण करना होगा।

इस बीच, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजग के नवनिर्वाचित सांसदों को मीडिया में छपने और दिखने की ललक से बचने की सलाह दी है। सूचना क्रांति के इस दौर में बातचीत रिकार्ड करने के तरह-तरह के उपकरण और तरीके उपलब्ध हैं। शायद इन्हीं की ओर इशारा करते हुए प्रधानमंत्री ने अपने नवनिर्वाचित सांसदों से कहा है कि कुछ लोग आपके पास ऑफ द रिकॉर्ड बात करने आते हैं लेकिन याद रखिये दुनिया में कोई भी चीज ऑफ द रिकॉर्ड नहीं होती है। बयानवीरों के मामले में ढुलमुल रवैये पर नाराजगी व्यक्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने जहां निर्वाचन आयोग को आड़े हाथों लिया वहीं अभिनेता से नेता बने कमलहासन के विवादास्पद बयान के परिप्रेक्ष्य में मद्रास उच्च न्यायालय ने मीडिया को भी उसकी जिम्मेदारियों की याद दिलाई।

चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, उ. प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ, बसपा सुप्रीमो मायावती, सपा नेता आजम खान, कांग्रेस के नवजोत सिंह सिद्धू, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, भाजपा नेता अनंत कुमार हेगड़े और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सहित अनेक नेताओं के कई भाषणों पर सवाल उठे। ऐसे ही कई मामलों में नेताओं के प्रचार करने पर पाबंदी भी लगायी गयी। इस चुनाव के दौरान ‘हिन्दू आतंकवाद' का मुद्दा विशेष रूप से सुर्खियों में रहा लेकिन इसी संदर्भ में कमलहासन की टिप्पणी ने राजनीतिक माहौल को ही गरमा दिया। उनके खिलाफ उनके विवादास्पद बयान को लेकर प्राथमिकी दर्ज हुई और उन्हें उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत करानी पड़ी। उच्च न्यायालय ने उन्हें अग्रिम जमानत देते हुए सख्त लहजे में कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं के बयानों से भड़कने वाली चिंगारी पूरे समाज को उद्वेलित कर सकती है।

ऐसी स्थिति में मीडिया की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। न्यायालय का मत था कि मीडिया को इस तरह के नफरत फैलाने वाले भाषणों को प्रमुखता नहीं देनी चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आयी क्रांति और अब सोशल मीडिया के युग में मीडिया की पहुंच दूर-दूर तक हो गयी है। प्रिंट मीडिया भले ही नेताओं के इस तरह के उत्तेजक भाषणों को पेश करते समय संयम बरते लेकिन सोशल मीडिया और यूट्यूब पर तो इसे जस का तस या फिर थोड़े बहुत संपादन के बाद फटाफट परोस दिया जाता है। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कई बार नेतागण सिर्फ सुर्खियों में आने के लिये ही उत्तेजक भाषणों का सहारा लेते हैं।

इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के न्यायाधीश की इस टिप्पणी का उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा, जिसमें उन्होंने एक महिला द्वारा भगवान मुरूगा की तुलना एक श्वान से करने और फिर अग्रिम जमानत की गुहार करने के मामले का उल्लेख किया।

यह सही है कि हमारा संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है। शीर्ष अदालत ने अपने कई फैसलों में कहा है कि बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार मुकम्मल नहीं है और इस पर उचित प्रतिबंध लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल बयानवीर नेताओं द्वारा प्रचार पाने या फिर सुर्खियों में रहने की खातिर नफरत फैलाने और समाज में कटुता पैदा करने वाले भाषणों पर अंकुश लगाने का है। बेहतर हो यदि कानून में ही इस तरह के उत्तेजक और नफरत फैलाने वाले भाषणों से संबंधित मामलों में कठोर सजा और जुर्माने की राशि बढ़ाने का प्रावधान किया जाये। इसके साथ ही कानून में व्यवस्था की जाये कि ऐसे मामलों की जांच कम से कम समय में पूरी करके अदालतों में मुकदमा चलाने की कार्यवाही तेजी से की जाये ताकि इन नेताओं को उनके उत्तेजक भाषणों के लिये जल्द सजा मिल सके।

सबसे पहले या दूसरों से अलग खबर देने के प्रयास में कई बार चूक होती है। इस तरह चूक की वजह से समूचे मीडिया जगत को सरकार और न्यायपालिका के साथ ही राजनीतिक दलों को भी उसकी विश्वसनीयता पर उंगली उठाने का मौका मिल जाता है। प्रधानमंत्री द्वारा संसदीय दल की बैठक में सदस्यों को इस तरह से आगाह करना भी अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने जैसा ही है। मीडिया के लिये भी यह आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण का अवसर है।