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मीडिया समझे अपना दायित्व-- विश्वनाथ सचदेव

कुछ दिनों पहले भारत-पाक के बीच एक क्रिकेट मैच हुआ था. उस दिन जिसने भी टीवी देखा होगा, तो वह सबेरे से ही एक युद्धोन्माद का गवाह बना होगा. लगभग हर समाचार चैनल पर सबेरे से ही रथी-महारथी जुट गये थे. क्रिकेट की बात तो हो रही थी, पर उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था वह नकली जोश, जो स्टूडियो में, और स्टूडियो से बाहर अलग-अलग लोकेशनों पर दिखाया जा रहा था. एक समाचार चैनल ने तो वाघा बॉर्डर को ही सेट बना लिया था. बातचीत का लहजा, हाव-भाव सब एक लड़ाई का माहौल बना रहे थे. एक चैनल पर अपने-अपने देश में बैठे भारत और पाकिस्तान के समर्थक ताल ठोक रहे थे.

एक अन्य चैनल पर तो भारत-पाक के भूतपूर्व सैनिक युद्ध की भाषा में क्रिकेट की बात कर रहे थे. वैसे, भारत-पाक के बीच जब भी कहीं क्रिकेट मैच होता है, स्थिति भी विशेष बन जाती है और माहौल भी. मैदान में खेल रहे खिलाड़ी तो पता नहीं क्या सोचते होंगे, पर दर्शक दोनों देशों के झंडे उछाल-उछाल कर नारों से आसमान सिर पर उठा लेते हैं. पता नहीं दोनों देशों के लोग क्रिकेट को सिर्फ क्रिकेट क्यों नहीं समझ पाते! सवाल यह भी उठता है कि दोनों देशों का मीडिया इस 'युद्धोन्माद' का हिस्सा क्यों बन जाता है?

यह सही है कि पिछले एक अरसे से पाकिस्तान और भारत के बीच संबंधों में कड़वाहट बढ़ी है. पाकिस्तान की ओर से होनेवाली हर अनुचित कार्रवाई का माकूल जवाब दिया जाना चाहिए, और हमारी सेना दे भी रही है. लेकिन, जिस तरह का युद्धोन्माद टीवी के परदे पर दिखाया जा रहा है, क्या वह सचमुच जरूरी है?

अंगरेजी का एक शब्द है 'पीसनिक' अर्थात् शांतिवादी. हमारे कुछ टीवी चैनलों में भारत-पाक के रिश्तों के संदर्भ में इस पीसनिक शब्द का अर्थ ही बदल दिया है. जिस तरह इन चैनलों के एंकर इस शब्द को काम में लेते हैं, उससे देशद्रोही की ध्वनि ही निकलती है. अर्थात् जो शांति की बात करे, वह देशद्रोही है! देशद्रोही का लेबल लगाये जाने के खतरे के बावजूद मैं कहना चहता हूं कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता और सभ्य मानवीय समाज में युद्धोन्माद फैलाने की कोशिशों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. पिछले एक अर्से में हमने मीडिया पर ऐसी बहसें होती देखी हैं, जो आग में घी का काम ही कर सकती हैं.

भारत-पाक रिश्तों के संदर्भ में मीडिया की ऐसी बहसों में दोनों ओर के भूतपूर्व सैन्य-अधिकारियों को बुला कर जिस तरह का माहौल बनाया जाता है, जिस तेवर में बातें होती हैं, उसमें विवेकशील तर्क-वितर्क के लिए कोई जगह हो ही नहीं सकती. टीआरपी आधारित ऐसी बहसों को आपे चाहें तो राष्ट्रभक्ति का नाम दे सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि एक अनावश्यक युद्धोन्माद पैदा करके पारस्परिक अहित को ही साधा जाता है.

युद्धोन्माद फैलाने का काम दोनों ही देशों का मीडिया कर रहा है. इस प्रयास में दोनों ही देशों में नकारात्मकता का माहौल बनता है, नफरत फैलती है. मैं फिर कहता हूं कि युद्ध भड़काने की शत्रु की कोशिशों का पूरा जवाब दिया जाना चाहिए, लेकिन इस बात को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि युद्ध में कोई भी हारे-जीते, नुकसान दोनों तरफ होता है. युद्ध में मनुष्यता का सर्वश्रेष्ठ सबसे पहले बलि चढ़ता है.

इस सर्वश्रेष्ठ की रक्षा करना मीडिया का दायित्व है. इस सर्वश्रेष्ठ की बलि चढ़ानेवाली ताकतें मनुष्यता की दुश्मन हैं. मीडिया की कोशिश इन ताकतों का पर्दाफाश करने की होनी चाहिए.

सही है कि पाकिस्तान की ओर से अक्सर उकसानेवाली कार्रवाई होती रहती है, पर हमें यह भी समझना होगा कि इन कार्रवाइयों के पीछे अक्सर वे ताकतें होती हैं, जो भारत-पाक के बीच युद्ध की स्थिति बना कर अपनी स्थिति मजबूत बनाना चाहती हैं. इसलिए, पाकिस्तान की भड़काऊ गतिविधि का शिकार हमें नहीं बनना है. हमें ऐसे तत्वों से सावधान रहना होगा, जो दोनों देशों में युद्ध की स्थितियां बना कर अपने स्वार्थों की रोटियां सेकना चाहते हैं. युद्ध की बात करनेवालों को यह ध्यान में रखना होगा कि भारत-पाक दोनों आण्विक शक्ति से लैस हैं. आण्विक हथियारों से होनेवाला विध्वंस सीमाओं का बंदी नहीं होगा. इसलिए जरूरी है कि मीडिया विवेकशील बने, विवेकशीलता का समर्थन करे. युद्धोन्माद फैलाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है.

उस दिन भारत-पाक के बीच हुए क्रिकेट मैच में क्या हुआ? दोनों टीमें उस 'युद्धोन्माद' के दबाव में थीं, जो दोनों देशों के मीडिया ने फैलाया था. पर, अच्छी बात यह थी कि दोनों टीमें इस दबाव से टूटी नहीं.

खिलाड़ी शांतिपूर्ण ढंग से अपना खेल खेल रहे थे. युद्धोन्माद हमेशा व्यर्थ होता है. मीडिया को चाहिए कि वह अपने दर्शकों और पाठकों को इस उन्माद से बचाये. उन्हें युद्ध की भयावहता का एहसास कराये, ताकि उनका विवेक भी जागे, जिनके कंधों पर बोझ होता है युद्ध करने, न करने का निर्णय लेने का. मीडिया का काम विवेक जगाना है. यही मीडिया का दायित्व भी है.