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मुखियाओं ने डाला शहरों में डेरा- संजय पांडेय-अनिल तिवारी

माओवाद के खौफ के कारण राज्य की कई पंचायतों में विचित्र स्थिति पैदा हो गयी है. नक्सल प्रभावित इलाकों के मुखिया ही पंचायत में रात गुजारने के लिए तैयार नहीं है.

पश्चिम सिंहभूम के कई मुखिया ने चुनाव जीतने के बाद प्रखंड मुख्यालय में किराये पर घर ले लिया है. वे अब दिन के वक्त किसी योजना के क्रियान्वयन के दौरान ही अपनी पंचायत की तरफ जाते हैं.

मुखिया की हत्या से खौफजदा
पंचायती राज व्यवस्था के लागू हुए नौ माह भी नहीं बीते थे कि नक्सलियों के हाथों गुदड़ी प्रखंड के टोमडेल मुखिया की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी गयी. इस हत्या ने पंचायत प्रतिनिधियों में खौफ भर दिया. नतीजन कई मुखियों ने तो अपने पंचायत क्षेत्र में रात बिताना ही बंद कर दिया. कई ने तो अपना कार्यालय गोइलेकरा में ही खोल लिया और वहीं काम-काज निबटाने लगे हैं.

चौकीदार समझती है पुलिस
पंचायत प्रतिनिधि के क्षेत्र छोड़ने का एक कारण पुलिस का सर्च अभियान है. जब नक्सली गांव में शिविर लगाते हैं और पुलिस को शिविर की सूचना मिलती है तो वे सीधे पंचायत प्रतिनिधियों से भेंट कर उन्हें नक्सली शिविर तक ले जाने के लिए उन पर दवाब बनाते हैं. उन्हें लगता है कि ये पंचायत प्रतिनिधि न होकर चौकीदार हों.

इससे पंचायत प्रतिनिधि दुविधा में पड़ जाते हैं. नक्सलियों का पता बताने पर नक्सली उन्हें अपना दुश्मन मान लेते हैं और अगर पता नहीं बताते हैं तो पुलिस उन्हें नक्सली समर्थक बता कर टॉर्चर करते हैं. इसका ताजा उदाहरण हैं बंदगांव के मुखिया बाचो हेंब्रम. पुलिस ने बाचो हेंब्रम के घर की तलाशी ली थी. उस पर नक्सली समर्थक होने का भी आरोप लगा था.

इन तमाम घटनाओं का नतीजा यह हुआ कि आज जलासर के मुखिया हिलारिया कोनगाड़ी, सिंदुरीबेड़ा पंचायत के मुखिया राजेंद्र हपतगाड़ा, मेरोमगुटु पंचायत के बेरोनिका हपतगाड़ा, सावनिया पंचायत की रानी पुरती, चंपाबा के मुखिया पंकुरु सियुस बोदरा, उप प्रमुख जेम्स मुंडा समेत कई पंचायत प्रतिनिधि अपने क्षेत्र को छोड़ कर दूसरे क्षेत्र में रह रहे हैं. गोइलकेरा प्रखंड अंतर्गत आराहासा पंचायत, गम्हरिया पंचायत, बारा पंचायत के मुखिया ने अपना ठिकाना गोइलेकरा में ही बना लिया है. वहीं गुदड़ी प्रखंड अंतर्गत सारूगाड़ा पंचायत के मुखिया सत्यंत कमर गांव विरले ही अपने पंचायत क्षेत्र में दर्शन देते हैं.

मोबाइल टावर नहीं होने का बहाना
हालांकि इन पंचायत के जनप्रतिनिधियों से इस बाबत पूछे जाने पर वे आवागमन की असुविधा और मोबाइल नेटवर्क न होने की बात बताते हैं, लेकिन नक्सली खौफ इनके चेहरों पर साफ झलकता है.