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मुद्रा परिवर्तन के बाद--- अनुपम त्रिवेदी

विगत 8-9 नवंबर की रात कालेधन पर की गयी प्रधानमंत्री की सर्जिकल स्ट्राइक को 15 दिन पूरे हो गये हैं. आधा देश अभी भी लाइन में लगा है और बाकी आधा इस माथा-पच्ची में कि अब आगे क्या होगा? मोदी सरकार के इस दूरगामी और साहसी कदम के संभावित परिणामों पर कयासों का दौर चल रहा है. प्रधानमंत्री खुद रायशुमारी करा रहे हैं. बड़ा प्रश्न है कि क्या अर्थव्यवस्था पटरी से उतरेगी या फिर व्यवस्था-परिवर्तन का नया युग प्रारंभ होगा? आइये एक निगाह डालते हैं अभी तक की स्थिति पर. 

अब तक बैंकों में लगभग छह लाख करोड़ का धन जमा हो चुका है और नयी मुद्रा में डेढ़ लाख करोड़ के लगभग बांटा जा चुका है. बैंकों की तिजोरी भर चुकी है. नकदी की कमी और एनपीए (बुरे ऋण) की समस्या से जूझ रहे बैंकों के लिए यह एक संजीवनी की तरह है. वहीं बाजार ठंडे हो गये हैं, क्योंकि पैसे की उपलब्धता कम हो गयी है. आशा की जा रही है कि हालत सामान्य होते ही बाजारों की रौनक लौटेगी. साथ ही ब्याज दरें कम होंगी और व्यवसाय-ऋण, गृह-ऋण और अन्य उपभोक्ता-ऋण सस्ते होंगे. मांग बढ़ेगी, जिससे औद्योगिक उत्पादन और रोजगार सृजन बढ़ेगा. अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी. लेकिन, इसका एक दूसरा पहलू भी है. 

जमा धन की अधिकता बैंकों के लिए एक मुसीबत बन सकती है, क्योंकि बचत खाते में जमा हर रुपये पर तुरंत प्रभाव से न्यूनतम 4 प्रतिशत का ब्याज देना होगा. घर में इकट्ठा कैश जमा करनेवाले अपनी बचत को सावधि-जमा (फिक्स्ड-डिपॉजिट) में बदलने में देर नहीं लगायेंगे. इसका मतलब होगा बैंकों पर 7-7.50 प्रतिशत ब्याज का बोझ. ऐसा भी नहीं है कि बैंक इस धन को तुरंत ऋण में दे देंगे. इस प्रक्रिया में समय लगता है, दूसरे अच्छी ऋण-पात्रता वाले उद्यमी भी आसानी से नहीं मिलते.

वहीं जहां ऋण पर ब्याज कम होगा, तो जमा पर भी कम होगा. देश के वरिष्ठ नागरिकों के पसंदीदा फिक्स्ड-डिपाॅजिट पर मिलनेवाला ब्याज भी कम हो जायेगा. ऊपर से संभावना यह भी है कि जैसे ही सरकार की ओर से लगायी निकासी की सीमा खत्म होगी, लोग अपने पैसे नयी मुद्रा में निकालना शुरू कर देंगे. बैंकों की तिजोरी में फिर दरार पड़ जायेगी और यह चर्चा ही बेमानी हो जायेगी. 

एक अन्य संभावना है सरकार के खजाने में होनेवाली बेशुमार वृद्धि की. नोटबंदी से पूर्व देश में 500 और 1000 के नोटों की कुल 14 लाख करोड़ की मुद्रा चलन में थी. अनुमान है कि इसमें से लगभग 4 लाख करोड़ की मुद्रा- जो संभवतः कालेधन के रूप में हैं, बैंकों में वापस नहीं आयेगी. 
जाहिर है कि यह धन भी सरकार के खाते में जायेगा. समर्थक कहते हैं कि इससे सरकार की जन-कल्याण योजनाओं और ढांचागत सुविधाओं के विस्तार की योजनाओं को गति मिलेगी और विकास कार्यों की बाढ़ आ जायेगी. पर, यह संभावित धन सरकार को इस वित्त वर्ष में मिल जायेगा, इस पर संशय है. इसके लिए आरबीआइ एक्ट में बदलाव करना होगा (जिससे इस कालेधन को रिजर्व बैंक की मौद्रिक देनदारी से निगमन के रूप में दर्शाया जा सके). यह बदलाव तभी हो सकता है, जब पुराने नोट बदलने की समय सीमा समाप्त हो जाये. ऊपर से इसके लिए संसद से मंजूरी भी लेनी होगी. यानी इस वित्त वर्ष 2016-17 में तो सरकार के हाथ यह धन आना बहुत मुश्किल है. 

अर्थव्यवस्था को देखें, तो नकदी की कमी से फौरी तौर पर बड़ा झटका लगा है. बाजार खाली हैं. मंडियों में सौदे अपने न्यूनतम स्तर पर हैं. देश भर में ट्रकों की आवाजाही पर गंभीर असर पड़ा है, जिससे जरूरी वस्तुओं की आवक कम हुई है. मुद्रास्फीति बढ़ सकती है. स्थिति सामान्य होने में अनुमान से ज्यादा समय लग सकता है. रबी की फसल की बुवाई में देरी हो रही है, जिसका असर अन्न-उत्पादन पर हो सकता है. शादियों के सीजन में बहुत सारे परिवार प्रभावित हुए हैं. वर्षों की जमा-पूंजी बिटिया की शादी को निर्विघ्न संपन्न नहीं करा पा रही है. समाज के सबसे निचले स्तर पर चोट सबसे गहरी है. कामगार और दिहाड़ी मजदूर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. नकदी और काम के अभाव में शहरों को छोड़ गांव वापस जाने को मजबूर हो रहे हैं. बिहार, बंगाल आनेवाली सभी गाड़ियां खचाखच भरी हैं. 

पर, इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है. लाइन में लगा, धक्के खाता, मुसीबत झेलता देश कह रहा है कि मोदीजी ने अच्छा किया. लोग खुश हैं कि आखिरकार उनकी ईमानदारी के पैसे को इज्जत तो मिली. ज्यादा खुशी इस बात की है कि सरकारी महकमों और राजनीति के दम पर लोगों को लूट कर अरबों रुपये घर में बक्सों में भरनेवालों को मोदी सरकार के इस एक कदम ने सड़क पर खड़ा कर दिया है. ईमानदार उद्यमी राहत महसूस कर रहे हैं. गृहणियां खुश हैं, क्योंकि पड़ोसन की ब्लैक-मनी बाहर आ गयी है. थोड़ी दुखी भी हैं, क्योंकि उनके छुपे खजाने भी पति और सास की निगाह में आ गये हैं. बच्चे अपनी गुल्लकों से मां-बाप को उधार देकर खुश हैं. लोगों को एक सकारात्मक परिवर्तन का अहसास हो रहा है. जेब में दो-तीन सौ रुपये लेकर लोग दो-तीन दिन तक काम चलाने का दावा कर रहे हैं. छोटे नोटों का सम्मान वापस आ गया है.

मितव्ययिता की बयार चल रही है. लोग फूंक-फूंक कर खर्च कर रहे हैं. हां, बाजारों का भले ही नुकसान हो रहा हो, पर लोग अच्छा महसूस कर रहे हैं.

आतंकियों, नक्सलियों और हवाला ऑपरेटरों पर बड़ी चोट पहुंची है. कालेधन के दम पर राजनीति करनेवालों पर भी असर हुआ है. उनके नोटों के गोदाम रातों-रात रद्दी के गोदाम में बदल गये हैं. अब कैसे बांटेंगे शराब और नोट, कैसे खरीदेंगे वोट- यह सोच कर उनकी नींद उड़ गयी है. बेनामी संपतियां रखनेवाले समझ नहीं पा रहे हैं कि वे क्या करें. भ्रष्टाचारियों के मन में एक भय बैठ गया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि नोटबंदी के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कदम क्रांतिकारी है और उम्मीद की जानी चाहिए कि इसके दूरगामी परिणाम सार्थक ही होंगे.