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मैला ढोने का काम कराने वालों को सजा देने के संबंध में कोई रिपोर्ट नहीं: केंद्र

नई दिल्ली: केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने मंगलवार को लोकसभा में स्वीकार किया कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 1993 में और फिर 2013 में मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला उठाना) को गैरकानूनी घोषित करने के बाद भी अभी ये प्रथा हमारे समाज में मौजूद है.


खास बात ये है कि मंत्रालय ने बताया कि राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों से मैला ढोने वालों को रोजगार देने या इस तरह का काम कराने के लिए किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने या सजा देने के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली है.


झारखंड के पलामू से भाजपा सांसद विष्णु दयाल राम द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि देश भर में कुल 53,398 मैला ढोने वालों की पहचान हुई है, लेकिन किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से ये जानकारी प्राप्त नहीं हुई है कि मैला ढाने का काम कराने वाले किसी भी व्यक्ति को सजा हुई है या नहीं.


मंत्री ने कहा कि ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार का निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम 2013' के तहत , जिला मजिस्ट्रेट या किसी संबंधित विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि उनके अधिकार क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति से मैला ढोने का काम न कराया जाए और अगर कोई ये कानून तोड़ता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.


उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकारों से इन प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने और इस संबंध में मासिक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का अनुरोध किया गया है.'


सांसद असदुद्दीन ओवैसी और इम्तियाज जलील द्वारा पूछे गए एक अन्य सवाल के जवाब में अठावले ने बताया कि पिछले तीन सालों में 88 लोगों की सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत हो गई. सबसे ज्यादा 18 मौतें दिल्ली में हुईं.


उन्होंने बताया कि 88 मृतक में से 36 लोगों के परिजनों को 10 लाख का मुआवजा सरकार द्वारा दे दिया गया है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 1993 से लेकर अब तक में 620 लोगों की सीवर सफाई के दौरान मौत हो चुकी है.


अठावले ने कहा कि इन 620 में से 445 परिवारों को 10 लाख रुपये का पूरा मुआवजा दिया जा चुका है. सबसे ज्यादा 141 मौतें तमिलनाडु में हुईं हैं. वहीं दूसरे नंबर पर गुजरात है, जहां 131 सफाईकर्मियों की मौत हुई है.


हालांकि मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने की दिशा में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मुआवजा अपर्याप्त है. अक्सर ये आरोप लगाया जाता है कि संबंधित अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं और कानून को सही तरीके से लागू करने के लिए उचित कदम नहीं उठा रहे हैं ताकि इन मौतों से बचा जाए.


कार्यकर्ताओं ने सरकार के पुनर्वास उपायों के बारे में भी चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि एक बार में 40,000 रुपये का नकद हस्तांतरण या व्यवसाय शुरू करने के लिए ऋण देने से कोई भी व्यक्ति नए सिरे से अपनी जिंदगी की शुरुआत नहीं कर सकता है.


देश भर में मैनुअस स्कैवेंजर्स की सही संख्या का पता लगाने के लिए सरकार द्वारा कई बार सर्वे कराए गए हैं और रामदास अठावले जिन आंकड़ों का जिक्र कर रहे थे वो आठवे सर्वे पर आधारित है.


आज के दौर में भी मैला ढोने की प्रथा होने के बावजूद स्थानीय अधिकारी ये नहीं स्वीकारते हैं कि उनके क्षेत्र में भी मैनुअल स्कैवेंजर्स हैं.