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मौलिक अधिकार से वंचना क्यों?- पवन के वर्मा

मेरी दृष्टि में जान-बूझ कर बड़ी चालाकी से भारत के संविधान का उल्लंघन किया जा रहा है. संविधान सभा में लंबी बहसों के बाद हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने भारत को सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार देने का निर्णय किया था. इसका अर्थ यह है कि 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी भारतीय नागरिक मतदान के अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं. इसी तरह यह अधिकार भी दिया गया कि योग्य आयु का कोई भी नागरिक संसद और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में प्रत्याशी बन सकता है.

संविधान सभा में भी कुछ लोग ऐसे थे, जो इन अधिकारों के साथ कुछ शर्त लगाने के पक्षधर थे, लेकिन हमारे संविधान-निर्माताओं ने दूरदर्शितापूर्ण और साहसिक निर्णय लिया.

परंतु, ऐसा लगता है कि राजस्थान और हरियाणा की सरकारों की नजर में हमारे संविधान को निर्धारित करनेवाले सिद्धांतों में खामियां हैं. पिछले वर्ष राजस्थान सरकार ने निर्णय किया कि राज्य के सभी नागरिक पंचायत समितियों और जिला परिषदों के चुनाव में खड़े नहीं हो सकते हैं.

राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश के द्वारा राजस्थान पंचायती राज कानून, 1994 में संशोधन करते हुए जिला परिषद् और पंचायत समिति के चुनाव में खड़े होने के लिए उम्मीदवार के पास दसवीं कक्षा पास होने और सरपंच के चुनाव के लिए आठवीं कक्षा पास होने का प्रमाण-पत्र जरूरी कर दिया गया. अनुसूचित क्षेत्रों में न्यूनतम पात्रता पांचवीं कक्षा रखी गयी है.

राजस्थान से प्रेरित होकर एक अन्य भाजपा-शासित राज्य हरियाणा ने अपना पंचायत कानून संशोधित किया है. अगले वर्ष जनवरी में होनेवाले चुनाव के लिए निर्णय किया गया है कि सामान्य श्रेणी के पुरुष प्रत्याशियों के लिए मैट्रिक की डिग्री होना तथा सामान्य श्रेणी की महिला और अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आठवीं पास होना जरूरी कर दिया गया है. इन संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी, पर उसने भी इन्हें वैध ठहराया है.

हमें देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले को मानना चाहिए, लेकिन सम्मान के साथ एक सवाल जरूर खड़ा होता हैः क्या राज्य सरकारें विधायी आदेशों के द्वारा स्थानीय निकायों के चुनाव में संविधान के स्पष्ट निर्देश और भावना को कमजोर कर सकती हैं? यह सही है कि उनके पास ऐसा करने के अधिकार हैं. परंतु, क्या पंचायत चुनावों में भी संसदीय और विधानसभाओं के लिए निर्दिष्ट योग्यताओं का पालन नहीं होना चाहिए?

यह सवाल पूछने के वैध कारण हैं. राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 45.8 फीसदी है. आदिवासी क्षेत्रों में स्थिति और खराब है, जहां यह दर महज 25.22 फीसदी ही है.

नये कानून के कारण इन श्रेणियों में अधिकतर महिलाएं जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के अपने बुनियादी अधिकार से वंचित रह जायेंगी. वंचना के इस प्रयास से पुरुष भी प्रभावित हुए हैं. ग्रामीण क्षेत्र में पुरुषों की साक्षरता दर 76.16 फीसदी है. इसका मतलब यह हुआ कि करीब एक-चौथाई पुरुष चुनाव में खड़े होने के अधिकार से वंचित रह जायेंगे.

हरियाणा में साक्षरता दर राजस्थान से कुछ ही बेहतर है. वर्ष 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में साक्षरता दर 76.6 फीसदी थी. इसमें महिलाओं में साक्षरता 66.8 फीसदी ही है. शहरी इलाकों में, जहां बेहतर साक्षरता की उम्मीद होती है, महिलाओं की साक्षरता दर सिर्फ 60.97 फीसदी है. यानी हरियाणा में हुए संशोधन के बाद एक-चौथाई पुरुषों और एक-तिहाई महिलाओं को चुनाव लड़ पाने का अवसर नहीं मिल सकेगा.

क्या वंचित करनेवाले ऐसे मनमाने नियम थोपना लोकतांत्रिक है? लोग अपनी इच्छा से निरक्षर नहीं हैं. इसका कारण अवसर की कमी है, जिसके लिए राज्य को सर्वाधिक दोष अपने सर पर लेना होगा. इसके अलावा, निरक्षरों में से बहुसंख्यक समाज के सबसे वंचित वर्गों से आते हैं. क्या इन राज्यों में ऐसे कानून बनानेवाले अहंकारियों का उद्देश्य यह है कि सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग जनता का प्रतिनिधित्व करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से भी वंचित कर दिये जायें?

राजस्थान और हरियाणा सरकारों ने तर्क दिया है कि पंचायतें धन का लेन-देन करती हैं, और यह कि इस कारण निरक्षर लोग ऐसा कर पाने के योग्य नहीं हैं. निश्चित ही बहुत ठोस तर्क नहीं है. आठवीं या दसवीं कक्षा पास कोई व्यक्ति रातों-रात जटिल वित्तीय मामलों को समझने लायक नहीं हो जाता है. पंचायतों के पास लेखा प्रबंधन के लिए अधिकारी होते हैं, और जो निरक्षर हैं, वे लोग कतई मूर्ख नहीं होते. इतना ही नहीं, हमारा लोकतांत्रिक अनुभव यह इंगित करता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में प्रभावी ढंग से काम करने की क्षमता सिर्फ निरक्षरता से बाधित नहीं होती है.

निश्चित रूप से एक आदर्श स्थिति में सभी भारतीयों को न सिर्फ शिक्षित होना चाहिए, बल्कि उन्हें कम-से-कम स्नातक तक शिक्षा भी प्राप्त करनी चाहिए. लेकिन, हमारे संविधान-निर्माताओं को यह भान था कि गरीबी, अवसर की समानता का अभाव, और भारत की सामाजिक वंचना को देखते हुए चुनाव लड़ने पर रोक लगाना लोकतांत्रिक बराबरी के विरुद्ध, और खासकर, समाज के सबसे गरीब तथा वंचित समुदायों के खिलाफ होगा.

उनकी ऐसी सोच थी कि जब इन वर्गों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पूरी तरह से शामिल होने का मौका मिलेगा, तो वे लोग व्यवस्था में बदलाव के लिए दबाव डाल सकेंगे, ताकि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक लाभ मिल सकें, जिन्हें अधिक संपन्न वर्गों के अधिकार के रूप में देखा जाता है.

इस पूरे प्रकरण में एक विडंबना भी है. संसदीय चुनाव में खड़ा होने के लिए उम्मीदवार के लिए पढ़ना आना जरूरी नहीं है. विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारी के लिए लिखना आना जरूरी नहीं है. लेकिन, स्थानीय निकायों के चुनाव में प्रत्याशी के पास शैक्षणिक योग्यता का होना अनिवार्य है! क्षोभ का एक और कारण भी है. कानून में ये बदलाव पंचायत चुनावों से ठीक पहले किये गये हैं.

ये बदलाव अगले चुनाव में या धीरे-धीरे क्यों नहीं लागू किये जा सकते थे, ताकि लोग प्रोत्साहित होते? लोकतंत्र सुविधा-संपन्न वर्ग के हाथों में एक हथियार नहीं बन सकता है, जिसके सहारे भारतीय नागरिकों के बड़े समूह को हाशिये पर धकेल दिया जाये, जिन्हें यह कीमती अधिकार हमारे संविधान-निर्माताओं ने दिया है. मेरी राय है कि सर्वोच्च न्यायालय को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि इन दोनों राज्य सरकारों से तो यह उम्मीद नहीं है.