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यूपी: महराजगंज में बंद पड़ी चीनी मिल से प्रभावित 48,000 किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं

‘18 अप्रैल के बिटिया के गवना के दिन धइले बाटीं, हर साल एक से डेढ़ एकड़ बोअत रहलीं, अबकी तीन एकड़ गन्ना बो देहलीं. सोचलीं कि बिटिया के गवनवा के खर्चा फसलिया बेच के निपटाई देब. फसल बढ़िया भईल तब सोचलीं भगवानों दुखिया के दर्द समझत बाटें, केहू से कर्जा नाहीं लेवेके पड़ी. जनवरी बीत गईल, गन्ना अबहीं खेतवे में खड़ा बा. 2014-15 के अबहीं 22 हजार रुपिया मिलवा से नाहीं मिलल. घर में बिटिया और खेतवा में फसलिया देख के रतिया के नींद नाहीं आवत बा....'

58 वर्षीय रामबृक्ष यादव अपनी बात पूरी करते उसके पहले ही अलाव की रोशनी में उनकी आंखों में भरे आंसू चमकने लगते हैं. मेरी नज़र को भांप वह अपना चेहरा घुटनों के बीच कर जल्दी से उन्होंने आंखें पोछ लीं.

इस बीच शिवपूजन चौधरी तपाक से बोल पड़े, ‘2014-15 में 20,000 और 2017-18 में 25,000 रुपइया के दू पर्ची के हमके पइसा आज ले नाहीं मिलल. हम ट्रैक्टर चलाइला, ई सीजन में महीनन से काम नाहीं मिलल, घरे बैइठल बाटीं. मार्च में बिटिया के शादी पड़ल बा, 1.75 एकड़ खेत में गन्ना के फसल अब सूखे लागल, खेत बंधक रखले के अलावा कउनो चारा नाहीं लउकत बा.'

शिवपूजन की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कई लोग एक साथ बोल पड़े, ‘के तोहर खेत बंधक रक्खी, जब सबकर इहे हाल बा....?'

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