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राजस्थान के आदिवासी भील किसी भी दल की प्राथमिकता में क्यों नहीं हैं

चित्तौड़गढ़: खाट पर पड़े ढेरों फटे कपड़े, कुछ बर्तन, बुझा चूल्हा, पीपे में थोड़े से सूखे आटे के साथ रखी कुछ रोटी और लोहे के संदूक के अलावा इस खपरैल ओढे ‘घर' में कुछ नहीं है.

चूल्हे के पास ही तीन महीने पहले एक बेटी को जन्म देने वाली गोपी भील (40) दर्द से कराह रही हैं क्योंकि उनका प्रसव घर पर ही हुआ और उसके बाद उनकी देखभाल एक जच्चा की तरह नहीं हो पाई है.

उन्होंने बेटी का नाम पारसी रखा है. पारसी, गोपी और प्यारेलाल भील की आठवीं संतान है. गोपी का सबसे बड़ा बेटा जगदीश (25) बेरोज़गार है और दो किशोर उम्र के बेटे मज़दूर हैं. एक बच्चे की मौत हो गई और बाकी चार बच्चे काफी कम उम्र के हैं.

छोटे बच्चों में से फतह (5) और पायल (4) ढाणी के पास स्थित एक आंगनबाड़ी केंद्र में जाते हैं क्योंकि वहां इन्हें कुछ खाने के लिए मिल जाता है. इस सब के अलावा लोहे के उस संदूक पर एक नेता का पोस्टर भी चिपका है जो इस मुफ़लिसी का हाथ जोड़कर गवाह बना हुआ है.

ये देश के पश्चिमी छोर पर स्थित राजस्थान में चित्तौड़गढ़ ज़िले की भदेसर तहसील के भेरू खेड़ा ढाणी की तस्वीर है. भील जनजाति के लोगों की ऐसी तस्वीरें यहां आम हैं लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की प्राथमिकता में ये लोग नहीं हैं.

भूख, गरीबी, बीमारी और सामंतवाद के शिकार इन भील आदिवासियों को अपने अस्तित्व की लड़ाई ख़ुद ही लड़नी पड़ रही है.

राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर और प्रतापगढ़ जनजाति बहुल ज़िले हैं जबकि चित्तौड़गढ़, पाली, सिरोही और राजसमंद ज़िलों की कुछ तहसीलें जनजाति क्षेत्र में आती हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार, इन आठ जिलों में 5696 गांव हैं और इन गांवों में रहने वाली जनसंख्या की 70.42 प्रतिशत आबादी आदिवासी या जनजाति हैं. वहीं पूरे राजस्थान की आबादी की 13.48 प्रतिशत जनसंख्या जनजाति समुदायों से आती है.

लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र हमने राजस्थान के चित्तौड़गढ़ की भदेसर तहसील के कई गांव में जाकर आदिवासी भीलों की सामाजिक, आर्थिक और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच के बारे में पता लगाने की कोशिश की.

इस कोशिश में जो हक़ीक़त सामने आई वो सरकारों की ओर से किए जा रहे विकास के तमाम दावों के उलट और हैरान करने वाली है.

यहां भील समुदाय के लोग भयंकर मुफ़लिसी के शिकार हैं. ऊंची जाति के लोग भीलों से सिर्फ़ शराब या बहुत कम पैसों में खेती का काम कराते हैं. गरीबी की वजह से बीमारी इतनी है कि भदेसर में पाए जाने वाले टीबी के मरीजों में 90 प्रतिशत से ज़्यादा भील समुदाय से आते हैं.

उज्ज्वला जैसी सरकारी योजना इन गांवों में पहुंची तो हैं लेकिन ये लोग एक साल से भी ज़्यादा वक़्त से सिलेंडर रिफिल नहीं करा पाए हैं क्योंकि इनके पास सिलेंडर भराने के लिए पैसे नहीं हैं.

भदेसर तहसील में करीब 162 गांव आते हैं और इनमें से 77 गांव भील जनजाति बहुल हैं. 2011 जनगणना के अनुसार, भदेसर तहसील की जनसंख्या 1.24 लाख है. इसमें से 62 हज़ार से ज़्यादा की आबादी अनपढ़ है और 53 हज़ार लोग नॉन वर्कर हैं.

जागरूकता की कमी और अशिक्षा की वजह से भीलों की ज़्यादातर आबादी नशे की शिकार है. अधिकतर गांवों में महिलाएं ही मज़दूरी कर परिवार को पाल रही हैं.

द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें