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रिपोर्ट को नहीं अपने धुएं को देखें-- अनिल प्रकाश जोशी

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की रिपोर्ट उस समय आई है, जब हमारे सिर पर कई खतरे मंडरा रहे हैं। दिल्ली का बढ़ता वायु प्रदूषण फिर एक बार हमारी नीतियों पर सवाल खड़े कर रहा है। हरियाणा, पंजाब की पराली का धुआं फिर पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का गला घोंटने को तैयार है। पराली को जलाने की बजाय अन्य उपयोगों में लाने की कवायद असफल होती दिख रही है। इसके लिए बनी केंद्र सरकार की 1,000 करोड़ रुपये की योजनाएं भी शायद स्वाहा हो गई हैं। बताया जा रहा है कि इन दोनों राज्यों में किसान पराली जलाने के विकल्प के अभाव का रोना रो रहे हैं। उनके अनुसार, सरकार द्वारा पोषित पराली प्रबंधन मशीन ज्यादा लाभदायक सिद्ध नहीं हुई। साथ ही कुछ जगह यह नारा भी सामने आया है- किसान दी मजबूरी है, नर्द (पराली) नू अग्ग जरूरी है। कहा जा रहा है कि पराली जलाने का जुर्माना उसके अन्य उपयोग में लाने वाले खर्च से सस्ता है।


बेशक आईपीसीसी की रिपोर्ट का पराली जलाने और दिल्ली के प्रदूषण से कोई सीधा नाता नहीं, लेकिन इसमें हम उन चिंताओं का कारण देख सकते हैं, जो रिपोर्ट में व्यक्त की गई हैं। इस रिपोर्ट में साफ बताया गया है कि तमाम संकल्पों के बाद भी हम सुधार लाने की कोशिशें करने में पूरी तरह असफल हैं। रपट के अनुसार, धरती का मौजूदा औसत तापमान 1.5 या 2 डिग्री तक बढ़ जाएगा। इसे अगर तत्काल गंभीरता से नहीं लिया गया, तो 2030 तक दुनिया गंभीर संकट में पड़ जाएगी।

दुनिया भर के 40 देशों के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई 400 पन्नों की इस रिपोर्ट के अनुसार, हम इतने गंभीर संकट में फंसे होंगे, जहां से वापसी संभव नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को कतई भी हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि पिछली गरमी और बरसात ने कुछ ऐसे ही प्रमाण दिए हैं, जो इस रिपोर्ट की प्रामाणिकता को बताते हैं। एशिया महाद्वीप में तूफान और बाढ़ का उन जगहों पर प्रकोप, जहां इसकी कल्पना नहीं की जा सकती, इसी परिवर्तन का हिस्सा हैं। इस रपट के अनुसार, बढ़ते तापक्रम के कारण हिमखंड तेजी से पिघलेंगे ही, जिससे समुद्र के जल-स्तर के बढ़ने की आशंका के साथ ध्रुवीय भालू, ह्वेल, सील व समुद्री पक्षियों के आवास को सीधा खतरा झेलना पड़ेगा। और अगर यह तापमान 2 डिग्री तक बढ़ा, तो गरमियों में बर्फ 10 गुना तेजी से पिघलकर एक बड़ी तबाही पैदा कर देगी।


सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत, पाकिस्तान और एशिया इसका बड़ा शिकार बनेंगे। अगर तापमान 1.5 डिग्री बढ़ा, तो दुनिया की करीब 14 फीसदी आबादी भीषण गरमी झेलेगी और इसकी वृद्धि 2 डिग्री हुई, तो 37 फीसदी आबादी पर गाज गिरेगी। इसका एक असर जल की उपलब्धता पर पड़ेगा, जिससे दुनिया का भूमध्यरेखीय क्षेत्र सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे और करीब 41़1 करोड़ से अधिक शहरी आबादी को बड़े जल संकट से जूझना पड़ेगा। दुनिया भर की तमाम प्रजातियों की संख्या में बड़ी कमी आ जाएगी, जिनमें छह फीसदी कीट प्रजाति, 18 फीसदी पादप प्रजाति और चार फीसदी जीवों की संख्या आधी रह जाएगी। ये सारी स्थितियां दुनिया में खाद्य संकट पैदा कर देंगी।


भारत की स्थिति और गंभीर है, जहां जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को कभी अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया, बस इसके लिए खानापूर्ति की जाती रही। यहां दो चुनौतियां एक साथ हैं। एक तरफ विकास की अंधी दौड़ और दूसरी तरफ अज्ञानतावश उठाए गए कदम, दोनों ही घातक सिद्ध हो रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था ‘कार्बन ब्रीफ' के अनुसार, पिछले 150 वर्षों में दिल्ली का तापमान एक डिग्री सेल्सियस, मुंबई का 0.7 डिग्री, चेन्नई का 0.6 डिग्री व कोलकाता का 1.2 डिग्री बढ़ा है। लेकिन ये चारों ही महानगर इसके प्रति कितने संवेदनशील हैं, इससे हम सब परिचित हैं। एक बात साफ है कि जलवायु परिवर्तन का बड़ा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि यहां एक तरफ 9,000 ग्लेशियरों पर घातक असर पडे़गा, वहीं दूसरी तरफ देश के 7,000 किलोमीटर से ज्यादा समुद्री सीमा तमाम तरह की नई परेशानियां खड़ी करेगी। अपने देश में समुद्र और हिमालय के बीच एक प्राकृतिक तारतम्यता है, जिस पर बढ़ते तापकम के कारण चोट पहुंचेगी और इन दोनों के बीच पलते जीवन को पर्यावरणीय जोखिम से गुजरना पड़ेगा।

पिछले कुछ समय में कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों, चाहे वे विश्व स्वास्थ्य संगठन की हों या फिर किसी अन्य संस्था की, सबने हमें चेताने की कोशिश की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वायु प्रदूषण की रपट पहले ही दुनिया की सर्वश्रेष्ठ दूषित देशों में भारत को शामिल कर चुकी है। ऐसे में, अपने देश को अतिरिक्त संवेदनशीलता दिखानी ही होगी, वरना यह विकासशील देश अपना संतुलन खो देगा। जलवायु परिवर्तन जैसा बड़ा मुद्दा जहां एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहसों में कलाबाजियां खाता रहता है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर देश भी इसे आत्मसात नहीं करते। मतलब साफ है कि नई दिल्ली का प्रदूषण न्यूयॉर्क में बहस करने से नहीं निपटने वाला और न ही कोलकाता के औसतन तापमान को क्योटो प्रोटोकॉल से नियंत्रित किया जा सकेगा। अपने को अगर बचाना हो, तो सबसे सुरक्षित जगह अपना ही घर ही होता है। इसलिए दुनिया की बहस में उलझने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि अपने देश में इस दिशा में कारगार कदम उठाए जाएं।


संयुक्त राष्ट्र अंतर-सरकारी पैनल की रपट चुनिंदा आंकड़ों और सर्वेक्षणों पर आधारित है, पर अगर अपने देश में गंभीरता से आकलन कर लें, तो स्थिति ज्यादा भयावह दिखाई देगी। ऐसे में, अगर सवाल जान पर बन आने का हो, तो जहान के बीच में बहस पर पड़ने की जरूरत नहीं। शायद हमारी अपनी पर्यावरणीय अंतरिम रिपोर्ट हमें सही आईना दिखा देगी। औरों के लिए वर्ष 2030 या 2050 संकट आने का समय होगा, पर उससे भी जल्दी हम अपने को काल की भेंट चढ़ा देंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)