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लाइलाज हो चुकी है एनपीए की बीमारी-- आदर्श तिवारी

बैंकों की तेजी से बढ़ती गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) आज एक ऐसी लाइलाज बीमारी बन चुकी हैं जिसका इलाज विशेषज्ञों को भी नहीं सूझ रहा है। इसलिए ऐसे में सवाल उठता है कि एनपीए के इस अंधकार से रोशनी कब और कैसे मिलेगी? दरअसल, बैंकों की बुनियाद को कमजोर करने में बढ़ता एनपीए एक बड़ा कारक है। बैंकों के बढ़ते एनपीए को लेकर सरकार और रिजर्व बैंक भी चिंता जाहिर कर चुके हैं। इसके साथ ही समय-समय पर नियम-कानून भी बनते रहे हैं। लेकिन सभी नियम-कानून महज फाइलों में दबे रह गए। आखिर क्या कारण है कि सरकार की सक्रियता के बावजूद एनपीए से मुक्ति का रास्ता नहीं दिखाई पड़ रहा है? जब एनपीए का मर्ज अपने शुरुआती दौर में था तब तत्कालीन सरकार इसे रोकने की बजाय और खुल कर कर्ज देती चली गई। इससे बैंकों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता चला गया। कर्जदार कर्ज चुकाने को लेकर टालमटोल करते रहे और बैंकों ने भी इस स्थिति को समझने के बावजूद अपने ही नियमों को लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।


हैरान करने वाली बात यह है कि इस विकट स्थिति के बाद भी बड़े-बड़े उद्योगपतियों को नियम-कानून को ताक पर रख कर कर्ज देते रहने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। आज बैंकों की हालत कितनी खोखली है, इसका अंदाजा एनपीए की बढ़ती रकम को देख कर लगाया जा सकता है। सितंबर 2017 तक साढ़े आठ लाख करोड़ की मोटी राशि एनपीए के रूप में थी। यह न केवल बैंकों की माली सेहत के लिए नुकसानदायक है, बल्कि इस फंसे कर्ज ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। पिछले दिनों रिजर्व बैंक ने एनपीए से मुक्ति के लिए नए नियमों की घोषणा की। नए नियम के तहत अब किसी भी कर्ज के मामले में बैंकों को छह महीने के अंदर उसका हल ढूंढ़ना होगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो संबंधित बैंक को दिवालिया प्रक्रिया के तहत मामले को आगे बढ़ाना होगा। इस नियम में एक अहम बिंदु यह भी है कि दो हजार करोड़ से अधिक की धनराशि के एनपीए को छह महीने में निपटाने की बात कही गई है। हालांकि नए नियम आने के बाद भी यह साफ नहीं है कि बैंक अपनी फंसी रकम वसूल पाएंगे या नहीं। अर्थशास्त्रियों ने इस बात की चिंता जरूर जाहिर की है कि नए नियमों के बाद दो लाख अस्सी हजार करोड़ की धनराशि एनपीए में बदलने की आशंका और बढ़ जाएगी। अतीत को देखें तो इस पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा होता है कि नए नियमों के बाद कितनी रकम बैंक वापस ले पाएंगे और इससे एनपीए की स्थिति में कितना सुधार आएगा, क्योंकि एनपीए से निपटने के लिए अब तक जो नियम-कानून बने, वे प्रभावी नहीं हुए। इसलिए सवाल उठता है कि एनपीए से मुक्ति का रास्ता आखिर है क्या?


दूसरा अहम सवाल यह है कि बढ़ते एनपीए पर जवाबदेही तय क्यों नहीं हो रही? पहले सवाल की तह में जाएं तो यह स्पष्ट है कि फंसे कर्ज को वसूलना बैंकों और सरकार दोनों के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ है। सरकार के यथास्थिति नियमों में बदलाव और तमाम प्रकार की सख्ती के बावजूद नतीजे निराशाजनक रहे हैं। इसलिए बढ़ते एनपीए से अगर बैंक बचना चाहते हैं तो एक साथ मिल कर ईमानदारी से प्रयास करने होंगे। उस भेदभाव को मिटाना होगा जिसमें बड़े कारोबारी और किसान के बीच नीति, नियम और कानून- तीनों के मायने बदल जाते हैं। आखिर क्या कारण है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद सभी नामों को उजागर नहीं किया? अगर एनपीए का हल खोजने की नीयत सही है तो बैंकों को उन सभी बड़े बकाएदारों की सूची तैयार कर, ठीक उसी तरह दबाव बनाना होगा जैसे बैंक छोटे बकाएदार मसलन किसान या मध्यवर्ग पर बनाते हैं।


गौरतलब है कि एनपीए आज राजनीतिक मुद्दा बन गया है। सरकार और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा कर इस गंभीर समस्या से आंख चुराने की कोशिश कर रहे हैं। बैंक डिफाल्टरों का मुद्दा समय-समय पर संसद से सड़क तक चर्चा का विषय बनता रहा है। चूंकि बैंकों पर एनपीए का बढ़ता दबाव देश की आर्थिक स्थिति को दीमक की तरह चाट रहा है, बावजूद इसके हमारे बैंक खुद के पैसे वसूलने में असहाय नजर आ रहे हैं। एनपीए के बोझ तले कराह रहे बैंक क्या खुद इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं? अगर किसी बड़े उद्योगपति को कर्ज बैंक ने दिया है तो उसे वसूलने के लिए सरकार, सुप्रीम कोर्ट और रिजर्व बैंक को क्यों दखल देना पड़ रहा है? आखिर इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है? एनपीए को लेकर सरकार ने भी कुछ बड़े कदम तो उठाए हैं। केंद्र सरकार ने एनपीए के खिलाफ एक महत्त्वपूर्ण और सार्थक कानून मानसून सत्र में पास कराया था। ‘द एनफोर्समेंट ऑफ सिक्युरिटी इंटरेस्ट एंड रिकवरी ऑफ डेब्ट्स लॉस एंड मिसलेनियस प्रोविजंस' नाम का विधेयक सरकार ने संसद के दोनों सदनों से पास करवाया था। एनपीए की समस्या से निपटने की दिशा में यह एक बड़ा कदम था, जिसमें न सिर्फ सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों को और अधिकार दिए गए, बल्कि इस महत्त्वपूर्ण संशोधन की बदौलत एनपीए से जुड़े मामलों का निपटारा भी जल्द से जल्द हो सकेगा। लेकिन यह कानून आने के बाद भी परिणाम उत्साहजनक नहीं दिखाई पड़े।


हमें एनपीए की मुख्य जड़ों की ओर ध्यान देना होगा, जहां से यह समस्या विकराल रूप धारण करने लगी। एनपीए की समस्या मुख्य रूप से यूपीए शासन के दौरान ही बढ़ने लगी थी। अब इसने विकराल रूप धारण कर लिया है। वर्ष 2009 से ही बैंकों में कर्जदारों की संख्या लगातार बढ़ती चली गई, खासकर बड़े उद्योगपति जिन्होंने अपने उद्योग के लिए बैंक से बड़ी रकम लेना शुरू किया। उद्योगपति विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर पर बकाए कर्ज का मुद्दा आज भी चर्चा का विषय है। बड़े उद्योगपतियों की एक लंबी फेहरिस्त है जो बैंकों का कर्ज डकार कर बैठे हैं। वर्ष 2008 में जब वैश्विक मंदी छाई हुई थी, उस समय भारत का जीडीपी भी निचले स्तर पर था। लेकिन भारत में मंदी का असर विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा कम था। आज भी यह समझना मुश्किल है कि जब पूरी दुनिया मंदी की चपेट में थी तब ऐसी विकट परिस्थिति में इतने कर्ज क्यों बांटे गए? यही नहीं, यूपीए सरकार ने बढ़ते एनपीए पर भी कोई ध्यान नहीं दिया जिससे बैंक एनपीए की बोझ तले दब गए। आज सरकारी बैंकों का एनपीए इतना बढ़ चुका है कि समूचे देश का आर्थिक विकास इसकी गिरफ्त में है। अब तो कर्ज लेकर भारत से चंपत होने की परंपरा भी जोर पकड़ रही है। पंजाब नेशनल बैंक का ताजा मामला तो आम जनता का बैंकों से भरोसा डिगाने वाला है। एनपीए की समस्या का असर देश की आर्थिक स्थिति पर असर तो पड़ता ही है, आम जनता के मन में भी यह धारण पैदा हो जाती है कि हमारे बैंक बड़े व्यापारियों को सहूलियत प्रदान करते हैं और मामूली वसूली के लिए भी गरीब किसान का उत्पीड़न किया जाता है। देश की इस विकराल समस्या को लेकर सर्वोच्च अदालत भी समय-समय पर सरकारों को फटकार लगाती रही है। लेकिन सरकारें इस मुद्दे पर किसी ठोस रणनीति के तहत कार्रवाई करने से बचती रही हैं, जिससे बैंकों पर बढ़ता एनपीए आर्थिक स्थिति को खोखला करता जा रहा है।