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लोक संसद की कल्पना-- मणीन्द्र नाथ ठाकुर

सफल लोकतंत्र के लिए समाज के हर स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति श्रद्धा का होना जरूरी है. यदि व्यक्ति, परिवार, जाति समूहों और प्रकृति के साथ हमारा लोकतांत्रिक संबंध नहीं होगा, तो फिर राज्य और सरकार के स्तर पर भी इसका होना संभव नहीं है. बलात्कार, भीड़ द्वारा हत्या, धर्म के नाम पर हिंसा, घरेलू हिंसा आदि में यदि बढ़ोतरी हो रही हो, तो फिर हमें समझना चाहिए कि हमारा लोकतंत्र खतरे में है. इस खतरे से निकालने के लिए हमें नयी राजनीतिक संस्थाओं की खोज शुरू करनी चाहिए. कुछ खोज जो स्वतंत्रता संग्राम में हुए थे, उन्हें पुनः जांचने की जरूरत है, कुछ जो अधूरे रह गये थे, उन्हें पूरा करने की जरूरत है.

हमें समझने की जरूरत है कि हमारा समाज किस ओर जा रहा है. यहां बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहा है, अस्सी वर्ष के एक बुजुर्ग को काॅलेज के छात्र सामूहिक रूप से पीटने लगते हैं, बालिका सुरक्षा गृह में बलात्कार हो रहा है और बलात्कार करनेवाले लोग सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे. आये दिन लड़कियों पर एसिड फेंका जा रहा है, बहुओं को जलाया जा रहा है, दंगे हो रहे हैं, और इन सबके बीच हम जनतंत्र की बात भी कर रहे हैं. हम दावा भी कर रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र हैं हम. यह तो तय है कि यदि समाज में जनतांत्रिक मूल्य नहीं हैं, तो देश जनतांत्रिक नहीं हो सकता है.

अब सवाल है कि जनतांत्रिक सरकार बनाने के लिए तो चुनाव की व्यवस्था की गयी है, लेकिन इन मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण कैसे किया जा सकता है? मेरे खयाल से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के चिंतक इस कठिनाई से वाकिफ थे. शायद इसलिए गांधी प्रार्थना सभा किया करते थे, हिंदुस्तानी और गुजराती में लिखने पर जोर दिया करते थे, रबींद्र नाथ ठाकुर गीत और उपन्यास लिखा करते थे, और अांबेडकर सभाओं में जाकर लंबा भाषण दिया करते थे, मौलाना आजाद कुरान शरीफ की बातें लिखते और विनोबा के गीता प्रवचन का उर्दू अनुवाद हुआ करता था. आज ये परंपराएं लगभग मर सी गयी हैं.

ज्यादातर लोगों ने साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है. हमारे पुस्तकालयों को तोड़कर बाजार बनाये जा रहे हैं, और नतीजतन समाज में बहस के बदले गालियां दी जा रही हैं, चिंतन के बदले व्यक्ति-भक्ति हो रही है.

जनतंत्र का आधार जनसंवाद ही हो सकता है और जनसंवाद का राजनीतिक होना उतना ही जरूरी है, जितना उसका सामाजिक होना. खोजना यह है कि इसके लिए ऐसी कौन सी संस्था बनायी जा सकती है, जिससे राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक संवाद एक साथ हो सके और उसका वर्तमान राजनीति से सीधा संबंध हो. इन प्रक्रियाओं को अलग करना ही शायद आज की समस्या की जड़ में है.

क्या इसके लिए ‘लोक संसद' जैसी किसी संस्था की कल्पना की जा सकती है? यह कल्पना कोई नयी नहीं है. गांधी और जेपी जैसे चिंतकों ने इसकी चर्चा किसी-न-किसी रूप में की है. यदि आप तालाब के पानी में एक पत्थर फेंकें, तो कई छटे-छोटे वृत्त बनाते हुए लहरें उठती हैं, जिनका केंद्र एक ही होता है. इस प्रक्रिया में ऊर्जा छोटे वृत्त से बड़े वृत्त की ओर स्थानांतरित होती है.

क्या ऐसी ही कल्पना संस्थाओं के बारे में करना संभव है? स्थानीय स्तर पर एक छोटी संस्था हो और उसके प्रतिनिधियों से ऊपर की संस्था बने और यह प्रक्रिया बिल्कुल ऊपर तक चले. इसमें ऊर्जा का संचार नीचे से ऊपर हो और ऊपर से नीचे भी और इनके बीच संवाद की निरंतरता बनी रहे.

इन संस्थाओं का काम क्या हो? इनका पहला काम तो स्थानीय समस्याओं के बारे में विमर्श, उसके उपाय और उसके लिए लोगों को प्रेरित करना, सरकारी नीतियों के बारे में जानकारी लोगों तक ले जाना और उसकी समालोचना और उसके क्रियान्वयन पर ध्यान देना हो. एक तरह से यह माइक्रो प्लानिंग का काम करे. लेकिन, इसके साथ ही समस्याओं का समाधान सामाजिक स्तर पर करना भी इसका काम हो. एक तरह से इसका काम प्लानिंग, निगरानी और क्रियान्वयन तीनों हो.

हर वृत्त अपने क्षेत्र के बारे में ऐसा ही काम करे. राष्ट्रीय स्तर का यह वृत्त राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर विमर्श करे और इन विषयों पर स्थानीय वृत्तों को भी बहस के लिए प्रेरित करे. स्थानीय वृत्त आम लोगों की समस्याओं पर बहस करे और ऊपरी वृत्तों को इसके बारे में सही दृष्टिकोण बनाने में सहायता करे.

दूसरा काम है ज्ञान के जनतांत्रीकरण का. आज की एक बड़ी समस्या है कि आम लोगों के पास समान्य ज्ञान का श्रोत केवल मीडिया और सोशल मीडिया ही रह गया है. जो जन-चेतना स्वतंत्रता संग्राम में फैला था, लगभग खत्म हो गया है. धीरे-धीरे खस्ता हाल शिक्षा व्यवस्था ने भी इसे समाप्तप्राय कर दिया है. इसमें क्या शक है कि जनतांत्रिक चेतना के बिना जनतंत्र संभव नहीं है. इसलिए इन्हें आपस में जुड़े हुए छोटे-छोटे पुस्तकालयों का निर्माण करना चाहिए जिसमें बहस, मुशायरा, सामूहिक साहित्य चर्चा आदि किया जाना चाहिए.

इनका तीसरा बड़ा काम हो चुनावी राजनीति को प्रभावित करना. चुनाव के दौरान पार्टियों के उम्मीदवारों के बारे में लोगों को अवगत कराएं, उन्हें स्थानीय समस्याओं पर अपना नजरिया देने को बाध्य करे और उनके द्वारा किये वादों पर अमल करने के लिए जनमत का दबाव उन पर बनाये रखे. बल्कि, अंत में यह स्थिति भी जरूर आये कि लोक संसद उम्मीदवार के चुनाव के लिए भी आपस में चुनाव करे. अपने बीच से ही लोगों को पार्टी से इतर जाकर चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित करे.

एक तरह से मैं यह भी कहना चाह रहा हूं कि भारतीय जनतंत्र को राजनीतिक पार्टियों के मायाजाल से बचाने की भी जरूरत है. क्योंकि ये पार्टियां अब कॉरपोरेट घरानों की तरह काम करती हैं. उनके अंदर एक तरह का अधिनायकवाद होता है, फिर हम और आप उनसे जनतंत्र को स्थापित करने की मांग कैसे कर सकते हैं?

क्या लोक संसद केवल एक दूसरी तरह का यूटोपिया मात्र है? हो भी सकता है. लेकिन यह यूटोपिया जनतंत्र को बचाने के लिए जरूरी है. इसे साकार करना संभव भी है, यदि हम गांधी की तरह सामाजिक और राजनीतिक कार्यों को एक साथ करने की क्षमता रखते हों. यह याद रखना जरूरी है कि अपने सामाजिक कार्यों की पूंजी को राजनीतिक पूंजी में बदलने का प्रयास सही नहीं है और सफल भी नहीं हो सकता है. लेकिन, व्यवस्था कुछ ऐसी बनानी होगी कि ये दोनों एक-दूसरे के साथ प्रारंभ से ही जुड़े रहें और एक-दूसरे के पूरक हों.