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लोहा नहीं अनाज चाहिए- विनोद कुमार

जनसत्ता 20 अगस्त, 2013 :  झारखंड बनने के बाद प्रभु वर्ग ने इस बात को काफी जोर-शोर से प्रचारित-प्रसारित किया है कि झारखंड का विकास और झारखंडी जनता का कल्याण उद्योगों से ही हो सकता है और खनिज संपदा से भरपूर झारखंड में इसकी अपार संभावनाएं हैं। यह प्रचार कुछ इस अंदाज में किया जाता है मानो झारखंड में पहली बार औद्योगीकरण होने जा रहा है। हकीकत यह है कि इस बात को पहले से लोग जानते हैं कि झारखंड खनिज संपदा से भरपूर है और इसीलिए आजादी के बाद देश में सबसे अधिक सार्वजनिक उपक्रम झारखंड में लगे।
देश का पहला उर्वरक कारखाना सिंदरी में लगा। दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र बोकारो में। देश का पहला अभियंत्रण प्रतिष्ठान एचइसी, सबसे बड़ी कंस्ट्रकशन कंपनी एचएससीएल, जादूगोड़ा का यूरेनियम कारखाना आदि झारखंड में लगे। प्राइम कोकिंग कोल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण खदानें झारखंड में हैं। निजी क्षेत्र के सर्वाधिक चर्चित और अग्रणी औद्योगिक घराने टाटा का साम्राज्य जमशेदपुर में है।
इन कारखानों की बदौलत झारखंड में धनबाद, बोकारो, टाटा, रांची जैसे समृद्धि के कई टापू बने। शानदार आवासीय कॉलोनियां, नियॉन बत्तियों से जगमग चौड़ी सड़कें। उपभोक्ता वस्तुओं से भरी दुकानें। नामी-गिरामी पब्लिक स्कूल आदि। लेकिन समृद्धि के इन टापुओं में यहां के आदिवासियों और मूलवासियों के लिए जगह नहीं है। तीस वर्ष पहले अकुशल श्रमिक होने की वजह से उन्हें काम मिला भी तो कुली और खलासी का और आज भी कमोबेश यही स्थिति है। उनके हिस्से पड़ा सिर्फ विस्थापन का दंश और विस्थापित बस्तियों और झोपड़पट्टियों का नारकीय जीवन।
यह स्थिति इसलिए त्रासद है कि झारखंड की पारंपरिक आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में गरीब से गरीब आदिवासी-मूलवासी के पास इतनी जमीन हुआ करती थी कि वह उस पर घर बना सके, आंगन और बाड़ी बना सके। यह इस सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की कितनी बड़ी खासियत थी, इसका अंदाजा तब होता है जब इसकी तुलना उत्तर भारत के दलितों की स्थिति से करते हैं। उनमें से बहुतों के पास आज भी बसने के लिए अपनी जमीन नहीं है, वे किसी जमींदार या बड़े किसान की जमीन पर बसे हुए हैं। उन्हें कभी भी उनके मालिक अपनी जमीन से बेदखल कर सकते हैं। और वे आज भी बासगीत के पर्चे के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
औद्योगीकरण के इस दौर ने झारखंड की पुरानी, परंपरागत सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को खत्म कर दिया। आदिवासियों-मूलवासियों से उनका ‘घर’ छीन लिया। कम से कम साठ लाख आदिवासी और मूलवासी इन औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए अपनी जमीन और घर से उजाड़ और दर-दर भटकने को मजबूर कर दिए गए। रांची में बेबसी की मूर्ति जैसे दिखने वाले अधिकतर रिक्शाचालक औद्योगिक विस्तार के शिकार हैं। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के खेत-खलिहानों में खटने वाले और र्इंट-भट्ठों में काम करने वाले वही लोग हैं जो इन कारखानों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को बनाने-बसाने के नाम पर उजाड़ दिए गए।
विडंबना यह है कि विकास के जिन ‘औद्योगिक मंदिरों’ के लिए उन्हें उजाड़ा गया, उनमें से अनेक अब बंदी के कगार पर हैं। सिंदरी कारखाना बंद हो चुका है। रांची स्थित एचइसी अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। झरिया की कोल खदानें खोखली होती जा रही हैं। एचएससीएल जैसी विशाल निर्माण कंपनी बंदी की तरफ बढ़ रही है। चीन में बढ़ी इस्पात की मांग की वजह से बोकारो इस्पात संयंत्र को नवजीवन मिला, वरना वह भारी घाटे में चल रहा था, हालांकि आज भी वहां रोजगार के अवसर सिमटते जा रहे हैं। मेघातुबुरु और किरीबुरू की खदानें बंदी की स्थिति में हैं।
डीवीसी के अधीन लगे तापविद्युत संयंत्र बिजली कम और प्रदूषण अधिक फैला रहे हैं। यानी जिन औद्योगिक कारखानों और तथाकथित विकास के लिए लाखों आदिवासी और मूलवासी ‘खाद’ बन गए, वे कारखाने और औद्योगिक प्रतिष्ठान अब मिटने वाले हैं और आने वाले कुछ वर्षों में उनका निशान भी मिट जाएगा। रह जाएगी विरूपित जमीन, प्रदूषित कृशकाय नदियां, जहां-तहां बिखरा औद्योगिक कचरा, जिन पर दूब भी मुश्किल से उग पाएगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि झारखंड के विशेष भू-कानूनों को नजरअंदाज कर इन औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए हजारों एकड़ जमीन यहां के आदिवासियों और मूलवासियों से अधिग्रहीत की गई थी। इनमें से आधी से अधिक का इस्तेमाल नहीं हुआ और अब उस जमीन की बंदरबांट शुरूहो गई है। उस पर निजी आवासीय कॉलोनियां बन रही हैं। पब्लिक स्कूल और मठ-मंदिर बन रहे हैं। इस पर शक हो तो औद्योगिक शहर बोकारो घूम आइए। रांची स्थित एचइसी की जमीन झारखंड सरकार अधिग्रहीत कर उस पर शहरी विकास की योजना बना रही है, जबकि उपयोग से फाजिल जमीन पर पहला हक मूल रैयतों का है।
विस्थापितों से अर्जित जमीन पर निजी रिहायशी कॉलोनियां इस कदर बन रही हैं मानो औद्योगीकरण का असली मकसद स्थानीय आदिवासियों-मूलवासियों को उजाड़ कर बहिरागतों की कॉलोनियां बनाना ही था।
और अब जो नए दौर की कंपनियां आने वाली हैं, वे तो रोजगार देने का दावा भी नहीं करतीं। थोड़ा-बहुत नियमित रोजगार सृजित होगा भी, तो वह पढ़े-लिखे बाबुओं और पेशेवरों के लिए। तीस वर्ष पहले भी जो कारखाने लगे, उनमें स्थानीय लोगों को रोजगार इसलिए नहीं मिला कि वे तकनीकी ज्ञान से वंचित थे, और आज तीस वर्ष बाद भी उनके सामने यही संकट है।
सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में बहिरागतों को ही सही, नौकरी तो मिली। लेकिन निजी रतिष्ठानों में रोजगार की संभावनाएं अत्यंत सीमित हैं। उदाहरण के लिए, चार मिली टन क्षमता के बोकारो इस्पात कारखाने में पैंतालीस हजार लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला। लेकिन इतनी ही क्षमता का इस्पात संयंत्र अगर मित्तल लगाते हैं तो अधिकतम पांच हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। वजह सिर्फ नई तकनीक नहीं, मजदूरों के बारे में बदला दृष्टिकोण भी है। अब अधिकतम काम ठेका श्रमिकों से कराने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
तथाकथित विकास के इस खौफनाक मंजर के बावजूद झारखंड के राजनेता और बुद्धिजीवी झारखंडी जनता को यह पट्टी पढ़ा रहे हैं कि औद्योगिक विकास से ही झारखंड और झारखंडी जनता का विकास संभव है। सभी राजनीतिक पार्टियां, चाहे वे नई औद्योगिक नीति की पैरोकार रही कांग्रेस और भाजपा हों या अन्य क्षेत्रीय पार्टियां, सब एक सुर से झारखंडी जनता को यह समझाने में लगी हुई हैं कि वह जिंदल, मित्तल आदि के स्वागत में जुट जाए, क्योंकि अब वही उसके भाग्य विधाता हैं। यह अलग बात है कि ‘दूध की जली जनता मट्ठा भी फूंक-फूंक कर’ पीना चाहती है। राजनीतिक दलों के पिट्ठुओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कुछ दलालों को छोड़ कर आदिवासी-मूलवासी जनता जिंदल, मित्तल और अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने इलाके से खदेड़ने के लिए सड़कों पर उतर आई है। इस विरोध की वजह से ही अब तक किसी एक कंपनी के लिए भी जमीन का अधिग्रहण सरकार नहीं कर सकी है। और एक नया नारा ग्रामीण इलाकों में गूंजने लगा है- ‘लोहा नहीं अनाज चाहिए, खेती का विकास चाहिए’।
यह नजारा सिर्फ झारखंड का नहीं, पूरे देश में ऐसा वातावरण बन रहा है। पहले कलिंगनगर (ओड़िशा) से यह आवाज उठी और फिर माकपा-शासित पश्चिम बंगाल से। सिंगूर और नंदीग्राम में इसी नारे की अनुगूंज सुनाई दी। और अब तो सुदूर दक्षिण तक यह आंदोलन चल रहा है। दर्जनों लोगों की कुर्बानी लेने के बाद सरकार भी इस तथ्य को समझने लगी है कि जनता अब आसानी से झांसे में नहीं आने वाली।
दूसरी तरफ जनता की समझ में भी यह बात आने लगी है कि ‘टाका पाइसा चार दिन, जोमिन थाकबे चिरो दिन’ (रुपया पैसा तो चार दिन टिकेगा, मगर जमीन-जायदाद हमेशा बनी रहेगी)। लोग इस बात को समझने लगे हैं कि औद्योगिक विकास का फायदा मुट््ठी भर लोगों को ही मिलता है, बहुसंख्यक आबादी का जीवनयापन तो खेती के विकास से ही संभव है।
आइए देखें कि झारखंड बनने के बाद किस तरह के कारखानों के लिए करार (एमओयू) हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों से कोई नया करार नहीं हुआ है, लेकिन बाबूलाल मरा२डी के जमाने से लेकर मधु कोड़ा की सरकार तक जितने भी करार हुए हैं, उनमें से अधिकतर स्पंज आयरन कारखानों के लिए। वैसे, वे कहते हैं इस्पात कारखाना लगाने की बात। स्पंज आयरन कारखाने के लिए उन्हें बेहतरीन लौह अयस्क वाले चिड़िया खदान से अयस्क निकासी का पट््टा चाहिए। गौरतलब है कि खनिज संपदा अतार्किक दोहन से निरंतर कम होती जा रही है और सभी देश अपने संसाधनों का संभल कर उपयोग कर रहे हैं। लेकिन भारत संभवत: एकमात्र ऐसा देश है, जो खनिज संपदा को सीधे बेच कर पैसा कमाने की जुगत में लगा हुआ है।
इस बात का विरोध होने पर केंद्र सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व यह प्रावधान किया कि खनिज पर आधरित उद्योग लगाने की स्थिति में ही किसी देशी-विदेशी कंपनी को लौह अयस्क का पट््टा आबंटित किया जाएगा। इसके बाद निजी कंपनियों ने लौह अयस्क की लूट का एक चोर दरवाजा बना लिया और स्पंज आयरन कारखाना लगाने के लिए करार होने लगे। यह भी जानने वाली बात है कि इस्पात निर्माण में स्पंज आयरन बनाना एक प्रारंभिक चरण है और लौह अयस्क से स्पंज आयरन बनाने की प्रक्रिया में भारी मात्रा में औद्योगिक कचरा निकलता है और पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होता है।
कोयला खनन, तापविद्युत संयंत्रों और बोकारो स्टील कारखाने से होने वाले प्रदूषण से झारखंड के पर्यावरण को कितनी क्षति पहुंची है, इसका अंदाजा झारखंड की जीवनरेखा समान दो पावन नदियों- दामोदर और सुवर्णरेखा- की वर्तमान स्थिति से लगाया जा सकता है, जो गंदे नाले में तब्दील हो चुकी हैं। और वास्तव में अगर जिंदल, मित्तल के कारखाने यहां लग गए तो प्रकृति का कितना विनाश होगा, यह कल्पनातीत है।
तो क्या कल-कारखाने लगने ही नहीं चाहिए? हम ऐसा नहीं कहते। लेकिन यह जनता को तय करने दीजिए कि उसे किस तरह का उद्योग चाहिए। ऐसे विद्युत संयंत्रों में जनता को क्या रुचि हो सकती है जिनसे सिर्फ प्रदूषित वातावरण मिले, बिजली नहीं। राज्य में तापविद्युत संयंत्र तो कई लगे, लेकिन उनके आसपास के गांवों तक बिजली नहीं पहुंची। दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे बड़ा इस्पात संयंत्र बोकारो (झारखंड) में है, लेकिन झारखंड की आदिवासी आबादी आज भी पत्ते के दोने में खाती है। देश का पहला और सबसे बड़ा खाद बनाने का कारखाना सिंदरी में लगा, लेकिन आदिवासी जनता रासायनिक खादों का इस्तेमाल नहीं करती। इसकी वजह है गरीबी। विपन्नता। ऐसा विकास किस काम का, जो विपन्नता बढ़ाए, गरीबी की फसल उगाए।