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लोहे की पहाड़ियों के पीछे बसता है दूसरा अबूझमाड़ !

पिनाकीदास रंजन, दंतेवाड़ा। लोहे के अकूत भण्डार को गर्भ में समेटे बैलाडीला की पहाड़ियों के पीछे की हकीकत अंधे कुएं के समान है। अच्छी गुणवत्ता के लोहे के लिए प्रसिद्घ इन खदानों के पीछे बसे गांवों के हालात को अगर विकास के तराजू पर तौला जाए तो दूसरा अबुझमाड़ कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सुबह के लगभग 10 बजे थे। बुधवार का दिन था। आयरन हिल्स के पीछे बसा गांव करका का रहने वाला बुधरू और सोमारू की तरह दर्जनभर ग्रामीण आकाश नगर की उजड़ी बस्ती के नजदीक बस के इंतजार में थे।

यह बसें एनएमडीसी परियोजना द्वारा माइनिंग स्टॉफ के लिए चलाई जाती है। बुधरू और सोमारू के पास कच्चे और पके केले थे तो कुछ महिलाओं के पास झाड़ू। इक्का-दुक्का ग्रामीण अपने साथ बस्तर बीयर यानि सल्फी से भरा तुम्बा लेकर पहुंचे थे। इंतजार के बीच बुधरू और सोमारू से चर्चा में लोहे के पहाड़ियों के पीछे का सच सामने आया। पहाड़ियों से लगभग 10 किमी नीचे उतरने पर छोटे-बड़े दर्जनों गांव है।

तीन दिन लग जाते हैं जाने में

लगभग सभी गांव बीजापुर जिले की सरहद में है। करका गांव भी उनमें से एक है। सोमारू के अनुसार पहाड़ियों के पीछे गांव आबाद जरूर है मगर बुनियादी सुविधाओं को मोहताज है। करका सहित दर्जनों गांवों के ग्रामीण रोजमर्रा के लिए बचेली साप्ताहिक बाजार पर निर्भर है। ऊंचे आयरन हिल्स को पार किए बिना उनकी जरूरतें पूरी भी नहीं हो सकती है।

बुधवार को बचेली में साप्ताहिक बाजार भरता है। आकाश नगर से करका लगभग 10 किमी दूर है। कई गांव है जो इससे भी दूर है, इसलिए बाजार आने-जाने में तीन दिन लग जाते है। इसलिए वे अपने साथ राशन लेकर चलते है। बुधरू ने बताया कि पहाड़ियों के पीछे अधिकतर गांव है जहां ग्रामीणों के नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं है। उनके राशन कार्ड नहीं है। सल्फी, झाड़ू, इमली, महुआ, कंदमूल के अलावा मुर्गे-मुर्गियां बेचकर जो रुपए मिलते है उससे वे अपनी जरूरत के सामान बाजार से खरीदते है।

पहाड़ी पार करना चुनौती

गांवों में राशन दुकान नहीं है। अस्पताल-स्कूल भी संचालित नहीं है। रोजमर्रा या बीमार की जान बचाना हो, पहाड़ियों को पार करने की चुनौती को स्वीकार करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। जिन खदानों से लोहा निकालकर सरकारें कमाई कर रही है, ठीक इसके पीछे गांव के गांव गुजर-बसर के लिए तरस रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि परियोजना ने क्षेत्र के विकास के लिए कितना काम किया है।

बुधरू, सोमारू की तरफ अन्य ग्रामीणों से चर्चा हुई । उनका कहना था कि पुलिस, सुरक्षा बल उन पर संदेह करते है। बाजार से खरीदा गया रोजमर्रा का सामान हो, दवाइयां हो। अक्सर उन पर नक्सलियों का मददगार होने का संदेह किया जाता है, इसके बावजूद हालात के आगे चुनौती को स्वीकार करने वे विवश है।

चूंकि वे जानते हैं कि पहाड़ियों को पार किए बिना वे अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर सकते हैं। इस तरह पहाड़ियों के पीछे गांवों की तस्वीर एक बानगी अबूझ न होकर भी परियोजना और शासन की अनदेखी के चलते हालात अबूझमाड़ जैसे ही है।