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विकास की बड़ी जिम्मेदारी है इस आयोग पर-- एन के सिंह

तीन साल पहले योजना आयोग को खत्म करके उसकी जगह एक थिंक टैंक के तौर पर नीति आयोग का गठन किया गया था। आलोचक यह सवाल अब तक उठाते हैं कि क्या यह बदलाव मुनासिब साबित हुआ? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले यह बताना चाहूंगा कि योजना आयोग के तीन बुनियादी काम थे। पहला, केंद्र और राज्यों के बीच सेतु का काम करना। दूसरा, हमारी विकास संबंधी नीतियों से जुडे़ तमाम पहलुओं की निगरानी करना। उसके इसी काम का महत्वपूर्ण हिस्सा था- पंचवर्षीय योजनाएं बनाना, उनका मध्यावधि मूल्यांकन करना और उनके क्रियान्वयन की निगरानी करना। तीसरा काम था, विभिन्न मंत्रालयों को सरकार से मिलने वाली बजटीय सहायता के आवंटन पर विवेक सम्मत फैसला लेना और वित्त आयोग से मिलने वाली मदद से इतर राज्य सरकारों के लिए संसाधन मुहैया कराना।

बहरहाल, नीति आयोग की संचालन परिषद की हाल ही मैं बैठक हुई थी, जिसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए थे। इस बैठक में तीन साल का एक ‘एक्शन एजेंडा' तैयार किया गया है। यह एजेंडा दरअसल वह राह है, जिस पर चलकर अर्थव्यवस्था के सभी आयामों को समेटते हुए भारत और भारतीयों का चौतरफा विकास हो सकता है। बावजूद इसके कुछ ऐसे बुनियादी मसले हैं, जिन पर तस्वीर साफ होनी चाहिए।


पहला तो यही है कि क्या हमारा मौजूदा ढांचा या बदलाव विकास से जुड़ी चुनौतियों से जूझने में सक्षम है? तीन साल के एजेंडे का भला क्या फायदा है? यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि केंद्रीय योजना की विरासत से बाहर निकलने के अलावा भी हमें इस एक्शन एजेंडे से कई फायदे होंगे। मसलन, भारत के लोकतांत्रिक चक्र पर गौर करें, तो पांच वर्ष का कार्यकाल अपारदर्शी होने के साथ-साथ बेमेल था। आमतौर पर इसमें आने वाली सरकार के कंधे पर जवाबदेही डाल दी जाती थी। ‘तीन साल का एक्शन एजेंडा' सरकार को अपनी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए कहीं अधिक जिम्मेदार बनाता है। इसका दूसरा फायदा यह भी है कि यह सत्तासीन सरकार को अपने कार्यकाल में ही सुधार करने और उसके अनुकूल बनाने के बेहतर अवसर देता है। इतना ही नहीं, 15 साल के विजन और सात साल की क्रियान्वयन नीति के साथ सामंजस्य बिठाए जाने की वजह से ‘तीन साल का एक्शन एजेंडा' बदलते समय के साथ फेरबदल के मौके देता है। स्पष्ट है कि यह हमें भविष्य को बेहतर तरीके से देखने में मदद करता है, खासतौर से विकसित होती प्रौद्योगिकी, जनसांख्यिकी और पारिस्थितिकी के अनुसार अपनी नीतियां गढ़ने में।


दूसरा सवाल यह है कि जो आकलन किए गए हैं, क्या वे वास्तविकता के करीब हैं? अनुमान यह लगाया है कि सकल मूल्य संवद्र्धन यानी जीवीए अगले तीन साल में क्रमश: 11.6 फीसदी, 12.3 फीसदी और 13 फीसदी बढ़ेगा। इसका अर्थ साफ है कि महंगाई काबू में आएगी और संसदीय मंजूरी के अनुरूप होगी। इसका एक मतलब यह भी है कि वास्तविक जीवीए में सालाना 7.6 से नौ फीसदी के बीच वृद्धि होगी। इन विकास पूर्वानुमानों को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की उम्मीदों व उनके द्वारा बताए गए ट्रेंड के समान रखना भी सुखद है।


यही नहीं, एफआरबीएम समीक्षा कमेटी द्वारा भेजे गए प्रस्तावों पर भरोसा करते हुए एक्शन एजेंडा ने अनुमान जताया है कि कुल बजट खर्च व जीडीपी के संदर्भ में गैर-विकास राजस्व खर्च में कमी आएगी। उल्लेखनीय है कि राजस्व और पूंजीगत खर्च के बीच दुर्भाग्यपूर्ण अंतर के कारण ही देश में संसाधनों का त्रुटिपूर्ण आवंटन होता रहा है।


इसी तरह, सकल कर राजस्व (जीटीआर) का अनुमान भी 2017-18 के बजट में उल्लेखित मध्यम अवधि के राजकोषीय वक्तव्य से मेल खाता है। प्रत्यक्ष कर-जीडीपी अनुपात अगले तीन वर्षों में क्रमश: 5.8 फीसदी, छह फीसदी और 6.3 फीसदी बढ़ने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त काला धन को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने, प्रत्यक्ष करों की चोरी को रोकने के लिए हुए समझौतों में सुधार करने और एडवांस प्राइसिंग एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने से भी व्यक्तिगत आय और कॉरपोरेट टैक्सों की उगाही, दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।


तीसरा मसला यह है कि हम इन लक्ष्यों को आखिर कैसे पा सकते हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था की अच्छी सेहत को देखें, तो ऊपर जिन विकास लक्ष्यों का जिक्र किया गया है, उसे पाने की राह में बाहरी कारण ही रुकावट बनेंगे। प्रतिकूल मानसून, दुनिया भर में जारी संरक्षणवादी प्रवृत्ति और तेल कीमतें ऐसी चंद वजहें बन सकती हैं। आर्थिक रूप से मजबूत देशों का गैर-पारंपरिक मौद्रिक नीति वाला नजरिया भी हमारी आर्थिक गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है। फिर भी, टैक्स वसूली में वृद्धि का प्रयास, डिजिटल इकोनॉमी पर जोर और जीएसटी से मध्यम अवधि के लाभ उल्लेखनीय साबित हो सकते हैं। विनिवेश पर एक सख्त रुख और रणनीतिक गठबंधन की तलाश भी सकारात्मक पहलू है। इसीलिए, सात साल की क्रियान्वयन रणनीति और पंद्रह साल का विजन दस्तावेज हमें तैयार करने ही चाहिए। अच्छी बात यह है कि इसकी शुरुआत हो चुकी है, बस इसमें और तेजी की दरकार है।


आखिरी सवाल यह पूछा जाता है कि हम इस एक्शन एजेंडा का प्रभावी क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित करेंगे? मेरा मानना है कि इसके लिए प्रस्तावित एक्शन प्लान पर व्यापक सहमति की दरकार है। पहले पंचवर्षीय योजनाओं पर संसद में चर्चा बमुश्किल ही हो पाती थी। मुझे ऐसा कोई मौका याद नहीं, जब संसद ने 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना को पर्याप्त समय दिया या उस पर गौर किया। नीति आयोग को हमें इस हश्र से बचाना होगा। बेहतर होगा कि योजनाओं को लेकर हम अलग से एक संसदीय कमेटी बनाएं, तभी नीति आयोग के मशविरों पर सार्थक रूप से बात हो सकेगी। वैसे नीति आयोग की संचालन परिषद को इस तरह बनाया गया है कि वह सहकारी संघवाद को बढ़ावा देती है। लिहाजा पहले की व्यवस्था की तरह ही राज्य स्तरीय इकाइयों का गठन होना चाहिए, जो उस राज्य से जुड़ी नीतियों को बनाने में मदद करे। इसे ‘सुनीति' (सब-नेशनल इंस्टीट्यूट्स फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) कहा जा सकता है।


जाहिर है, ‘तीन साल का एक्शन एजेंडा' उन्नत भारत की एक सधी हुई शुरुआत है। एक पुरानी कहावत है कि कर्म किए बिना विजन पूरा होने की सोचना एक दिवास्वप्न है और बिना विजन के कर्म करना दु:स्वप्न। हमें अपनी राह खुद चुननी होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)