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विकास की होड़ में बेसुध- अभय मिश्र

जनसत्ता 6 फरवरी, 2014 : भारतीय जनता पार्टी के गंगा समग्र अभियान की सर्वेसर्वा उमा भारती ने पर्यावरणविद अनुपम मिश्र से आंदोलन के भविष्य की रूपरेखा पर सलाह मांगी, जिसे वे जनता के सामने संकल्प के तौर पर रख सकें। अनुपमजी ने कहा कि आप अच्छा काम कर रही हैं लेकिन कोई भी बड़ी घोषणा करने से बचिए। थोड़ा रुक कर वे बोले, आज आप कोई बड़ा संकल्प ले लेंगी और कल आपका एक नेता आकर कहेगा कि मैं तो विकास पुरुष हूं, मैं तो बांध बनाऊंगा, आस्था और पर्यावरण के नाम पर देश का विकास नहीं रोका जा सकता। तब आपके पास उसका साथ देने के अलावा कोई चारा नहीं होगा, आप पार्टी लाइन से बंधी होंगी।

यह बातचीत छह माह पुरानी है।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को लक्षित कर की गई अनुपम मिश्र की भविष्यवाणी आज सही साबित हो रही है। ‘विकास-पुरुष’ नरेंद्र मोदी ने देहरादून में ललकारते हुए कहा कि उत्तराखंड की नदियों में इतनी ताकत है कि वे सारे देश की ऊर्जा-जरूरतों को पूरा कर सकती हैं। सिर्फ बेहतर तकनीक के साथ नदियों का दोहन कर पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आ सकती है।

अब तक गंगा पर बांधों का विरोध करती और उन्हें निरस्त करती आई भाजपा के लिए यह विरोधाभासी स्थिति थी। लेकिन मोदी की कही बात ही अब पार्टी लाइन होती है, इसलिए एक भी सवाल नहीं उठा। नरेंद्र मोदी के बयानों से पर्यावरण-प्रेमियों की पेशानी पर बल पड़ने लगे हैं। एक बड़ा डर यह है कि क्या मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा के साथ वही नहीं करेंगे जो उन्होंने नर्मदा के साथ किया है?

प्रकृति ने नदी के पानी पर सबसे बड़ा हक समुद्र का तय किया है, लेकिन दुनिया भर की सरकारें इसे अनदेखा करती रही हैं। नदी को समुद्र तक पहुंचने से बहुत पहले ही निचोड़ लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। मोदी के देहरादून में दिए भाषण के बाद बांध-कंपनियों में एक नया उत्साह देखने को मिल रहा है। लोहारी-नागपाला जैसी परियोजना को भी दोबारा आरंभ करने की कवायद शुरूहो गई हो तो आश्चर्य नहीं होगा। 2010 में तत्कालीन वित्तमंत्री और बांधों पर गठित मंत्री-समूह के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी ने भागीरथी पर बन रही लोहारी २ेनागपाला परियोजना को बंद करने का निर्णय लिया था। इसे बंद करवाने में जीडी अग्रवाल और गोविंदाचार्य का बड़ा हाथ था। भाजपा भी इस परियोजना को बंद करवाने के लिए पूरी तरह सक्रिय थी। उत्तराखंड में गंगा की विभिन्न धाराओं पर एक लाख तीस हजार हजार करोड़ की जलविद्युत परियोजनाएं बन रही हैं या प्रस्तावित हैं।

लगातार चल रहे नदी-आंदोलनों से इन परियोजनाओं पर तलवार लटक रही थी और भाजपा गंगा की अविरलता की मांग के साथ इन आंदोलनों के साथ खड़ी थी। ऐसे समय में मोदी की विकास-पसंद छवि ने बांध कंपनियों को नया भरोसा दिलाया है। आशंका इसलिए भी बलवती होती है कि सरकारी बैठकों और कागजात में लोहारी-नागपाला और पाला-मनेरी जैसी परियोजनाओं की चर्चा लगातार जारी है। क्या जाने ये कब पुनर्जीवित होकर कागजों से छलांग लगा कर बाहर आएं और हमारे सीने पर बैठ जाएं। अगर आपको यह आशंका हवाई लगती हो तो वीके चतुर्वेदी समिति की अंतिम रिपोर्ट उठा कर देख लें।

लोहारी नागपाला बंद करते समय प्रणब मुखर्जी ने परियोजना के लिए बनाई गई सुरंग को पूरी तरह भर देने का आदेश भी जारी किया था। उस सुरंग के बने रहने से सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी थीं, इसके बावजूद लोहारी नागपाला की सुरंग को भरा नहीं गया, उसे सिर्फ एक गेट लगा कर छोड़ दिया गया। क्यों? क्या बांध अधिकारियों को पता है कि पिक्चर अभी बाकी है? मोदी का मानना है कि ‘रन आॅफ द रिवर’ तकनीक अपना कर नदी की अविरलता प्रभावित किए बिना बिजली पैदा की जा सकती है।

इस नई तकनीक का गाना तो यूपीए सरकार भी गाती रही है लेकिन थोड़ी सावधानी के साथ। रन आॅफ द रिवर की परिभाषा को पूरी तरह तोड़-मरोड़ कर उत्तराखंड की नदियों को सुरंगों के हवाले कर दिया गया है। विष्णु प्रयाग और गणेश प्रयाग में एक बूंद पानी नहीं है। सरकार कहती है नदी को रोका नहीं गया है, सच है, लेकिन उसके दर्शन भी नहीं हो रहे हैं। दुनिया में कहीं भी, किसी भी रन आॅफ द रिवर परियोजना में मुख्य धारा को इस निर्लज्जता से सुखाया नहीं जाता। दो कलकल करती धाराओं को आपने उठाया, सुरंगों में ठूंसा और वहीं संगम करा दिया। इसके बाद उस पर ‘रन ऑफ द रिवर’ का ठप्पा लगा दिया।

दसियों किलोमीटर की सजा काट कर जब नदी एक सुरंग से बाहर निकलती है, खुले में सांस भी नहीं ले पाती कि अगली सुरंग को मुंह खोले सामने पाती है। उस सुरंग के बाद फिर एक और सुरंग... यह सिलसिला पूरे पहाड़ पर चलता रहता है। क्या मोदीजी इसी आधुनिक तकनीक के सहारे नदियों के उद्धार की बात कर रहे हैं?

भाजपा की नदी नीति को नर्मदा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। ‘नमर्दे सर्वदे’ अर्थात ‘नर्मदा सब कुछ देती है’ इस सूत्रवाक्य को भाजपाई सरकारों ने भलीभांति समझ लिया है। नर्मदा मुख्यत: मध्यप्रदेश और गुजरात से बहती है। विकास की होड़ में बेसुध ये दोनों राज्य नर्मदा का अंधाधुंध दोहन करने में विश्वास रखते हैं। दोनों ही राज्य अपने-अपने जल-संकट से जूझ रहे इलाकों तक नर्मदा को पहुंचाना चाहते हैं। झीलों की नगरी होते हुए भी राजधानी भोपाल की प्यास बुझाने नर्मदा को लाया जा रहा है और वहां मौजूद तालाबों को नई इमारतें ढक रही हैं। वह दिन दूर नहीं जब नर्मदा दोनों राज्यों के बीच कावेरी विवाद की तरह ही कटुता का कारण बनेगी।

इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। मध्यप्रदेश की शिकायत पर नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने नोटिस जारी कर अपने हिस्से से अधिक पानी लेने और उसके व्यावसायिक इस्तेमाल की बाबत मोदी से सफाई मांगी है। गुजरात में अठारह लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जानी है लेकिन नहरें न होने से अभी दस फीसद हिस्से पर ही सिंचाई संभव हो पा रही है। पानी ज्यादातर बड़े शहरों के पीने के लिए और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए दिया जा रहा है। जिस कच्छ के नाम पर गुजरात को नर्मदा जल के ज्यादा उपयोग की अनुमति मिली है वह आज भी प्यासा ही है। सरदार सरोवर की कार्य-योजना देखने से यह साफ हो जाता है कि इससे कच्छ के खेती लायक दो फीसद हिस्से में ही सिंचाई हो पाएगी। जबकि पचास फीसद से अधिक पानी की आपूर्ति मध्य गुजरात के संपन्न इलाके में की जाएगी। मोदी का गुजरात अपनी जल-समस्या का ‘स्थायी’ समाधान नर्मदा की घेरबंदी में ही देख पाता है। स्थानीय स्तर पर जल संग्रहण जैसी कोई योजना तो शायद इन्हें सपने में भी नहीं सूझती।

नरेंद्र मोदी ने सौराष्ट्र के सौ से अधिक बांधों को नर्मदा के पानी से भरने की घोषणा की है। मध्यप्रदेश भी निमाड़ और मालवा के सूखा प्रभावित हिस्सों में नर्मदा को पहुंचाना चाहता है। शिवराज सिंह चौहान की नर्मदा-क्षिप्रा जोड़ परियोजना पर तेजी से काम चल रहा है। चौहान का सपना उज्जैन में लगने वाला अगला महाकुंभ नर्मदा के भरोसे पूरा करने का है। हालांकि घोषित रूप से चौहान का दावा उज्जैन और देवास के सैकड़ों गांवों को पानी पिलाने का है।

पिछली बार कुंभ के दौरान उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं और कुंभ स्नान के लिए टैंकरों से पानी लाकर क्षिप्रा को भरा गया था। क्या मोदी और चौहान की नजर में नर्मदा किसी अक्षयपात्र से निकलती है? नर्मदा अगर बोल पाती तो शायद यही कहती कि अब मेरी हिम्मत टूट रही है। पहाड़ पर गंगा की सभी धाराओं से बिजली बनाने की बात करते मोदी मैदान में आकर दूसरी भाषा बोलने लगे। इसमें भी नदी को लेकर उनकी समझ की झलक मिलती है।

बनारस में मोदी ने कहा कि जैसे हमने साबरमती को साफ किया वैसे ही हम गंगा को साफ करेंगे। लेकिन क्या मोदीजी को कभी इस प्रश्न ने भी सताया है कि साबरमती जैसी नदियां एक नाले में कैसे तब्दील हो जाती हैं? साबरमती को जिस तरह भरापूरा करने का दावा मोदी बनारस में कर रहे थे वह भी अर्धसत्य ही है। दरअसल, मध्यप्रदेश के कैचमेंट एरिया में इस साल हुई भारी बारिश के चलते पानी साबरमती तक पहुंचा है। भारी उफान के बीच पानी को मुख्य नहर में नहीं छोड़ा जा सका क्योंकि उसका निर्माण अभी पूरा ही नहीं हुआ है। कच्छ और सौराष्ट्र में उप-नहरें भी अब तक नहीं बनी हैं।

उमा भारती संवेदनशीलता के साथ सार्वजनिक मंच से बालू चुगान की बात करती हैं। उनका मानना है कि बालू का अवैध और अंधाधुंध खनन ही अनियंत्रित बाढ़ का कारण है, वहीं रांची के भाषण में मोदी ने सवाल उठाया कि नदियों से बालू खनन बंद क्यों है, बालू खनन तुरंत शुरूहोने से विकास कार्य शुरूहोंगे।

मोदी हर जगह गंगा की सफाई और निर्मलता की बात कर रहे हैं। बड़ी चालाकी से वे उसकी अविरलता पर कोई दावा नहीं कर रहे। जबकि अविरलता निर्मलता की पूर्व शर्त होती है। नदी को बांधना और उसे अविरल रहने देना एक साथ संभव नहीं है।

भाजपा की नदी नीति पर सवाल तब भी उठे थे, जब उमा भारती उत्तराखंड की श्रीनगर परियोजना में डूब रही धारी देवी को बचाने के लिए धरने पर बैठी थीं। अंतत: प्रधानमंत्री ने सात करोड़ रुपए जारी कर धारी देवी मंदिर को लिफ्ट करवाने का आदेश दिया और आंदोलन सफल रहा। लेकिन पार्टी धारी देवी के साथ-साथ अलकनंदा की बात समग्रता में नहीं कर पाई।

अटल बिहारी वाजपेयी ने सत्ता से जाते-जाते नदी जोड़ योजना सामने रखी थी, जिस पर बाद में विशेषज्ञों ने कई गंभीर सवाल उठाए। फिर भी पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस परियोजना पर काम करने के लिए आदेश दिया है। निश्चित रूप से सत्ता में आने के बाद मोदी नदी जोड़ योजना में विकास की संभावनाएं टटोलेंगे।

जाने क्यों हम नदी को जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र न मान कर उसके साथ राजमार्गों-सा व्यवहार करने की सोचते हैं। हम नदियों को देवी की तरह पूजते तो जरूर हैं लेकिन मां की तरह उनका ध्यान नहीं रख पाते।

मोदी अगर सचमुच गंगा को बचाना चाहते हैं तो उन्हें एक बार ठहर कर गंगा पर चल रहे विकास के सारे कार्यक्रमों, परियोजनाओं और धारणाओं पर गहरी नजर डालनी होगी। नए पैमाने गढ़ने होंगे। सीवेज से लेकर अपर गंगा कैनाल, लोअर गंगा कैनाल और चमड़ा उद्योग तक हर विषय पर अब तक का सीखा सब भुला कर नए सिरे से नए रास्ते खोजने होंगे।