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विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं-- ज्यां द्रेज

भारत में 'रिकॉर्ड्स' बनाने या रखने का बहुत शौक है. गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में घुसने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते हैं. लोग माउंट एवरेस्ट पर चढ़ जाते हैं, पांच कुंतल का लड्डू बनाते हैं, तो दस फुट की अपनी मूंछ बढ़ा लेते हैं.


आजकल भारत सरकार एक और रिकॉर्ड की तलाश कर रही है- सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था. और पिछले कुछ सालों में इस रिकॉर्ड की तलाश में थोड़ी सफलता मिली है.


इस तलाश में चीन का आर्थिक स्लोडाउन और शायद आर्थिक आंकड़ों की हेराफेरी से भी मदद मिली. फिर भी सच्चाई यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज नहीं, तो कम से कम सबसे तेजी की श्रेणी में है.


लेकिन, आर्थिक वृद्धि और विकास में बहुत फर्क होता है. विकास एक उद्देश्य है, आर्थिक वृद्धि माध्यम है. विकास क्या है? विकास का मतलब यह है कि जीवन की गुणवत्ता बढ़ रही है और आम लोगों के जीवन में सुधार लाया जा रहा है. विकास का दूसरा नाम है- आजादी. भूख से आजादी, गरीबी और बीमारी से आजादी, शोषण से आजादी, असमानता से आजादी, अंधविश्वास से आजादी, और हिंसा से भी आजादी.


इन सब बातों पर शायद अर्थशास्त्रियों के बीच में कोई असहमति नहीं होगी. इसके बावजूद भारत की आर्थिक नीति केवल आर्थिक वृद्धि पर ही केंद्रित है. आजकल सरकार को जीडीपी ग्रोथ (सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि) की इतनी चिंता है कि इसकी निगरानी हर तिमाही की जा रही है और दशमलव देखते हुए भी की जाती है. तिमाही जीडीपी ग्रोथ 7.2 प्रतिशत पहुंचता है, तो कहा जाता है कि 'भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज है'. फिर जब 6.7 प्रतिशत पर पहुंचता है, तो कहा जाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था संकट में है.


जबकि तिमाही जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों में इतनी शुद्धता नहीं है कि 7.2 और 6.7 में कोई फर्क देख सकें. सोचनेवाली बात यह है कि जीडीपी ग्रोथ करीब 7 प्रतिशत होने के बावजूद ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी नहीं बढ़ती है. लेकिन, इस पर कोई बात ही नहीं करता है. और अगर हमें विकास की बात करनी है, तो न केवल जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों को देखना पड़ेगा, लेकिन इसके साथ मजदूरी और सामाजिक सूचकांकों को ध्यान देना होगा.


विकास को आजादी मानते हुए भी कुछ लोग कहेंगे कि आर्थिक वृद्धि ही इस उद्देश्य का सही माध्यम है. दुनिया के विकास का इतिहास और कुछ कहता है. आर्थिक वृद्धि जरूर मदद कर सकती है, क्योंकि आर्थिक वृद्धि से व्यक्तिगत आय बढ़ती है और सरकारी राजस्व भी बढ़ता है, जिससे सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध करायी जा सकती है. लेकिन, विकास केवल आर्थिक वृद्धि की बात नहीं है.

आर्थिक वृद्धि के साथ सार्वजनिक कार्रवाई

(पब्लिक एक्शन) बहुत जरूरी है. उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य की बात करें, जो जीवन की गुणवत्ता का आधार है. अगर स्वास्थ्य के सूचकांक देखें, तो बांग्लादेश हमारे देश भारत से काफी आगे है. यह आर्थिक वृद्धि का फल नहीं है, यह पब्लिक एक्शन का फल है. बांग्लादेश की जीडीपी भारत की जीडीपी से बहुत कम है- मुश्किल से आधी है. लेकिन, बांग्लादेश में कई साल से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जा रहा है और उस क्षेत्र में भारत बहुत पीछे है.

भारत में जिन राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया गया (जैसे केरल, तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश) वहां भी इस प्रयास का फल दिख रहा है. उन राज्यों में स्वास्थ्य के सूचकांक बांग्लादेश से और अच्छे हैं. और जैसे पब्लिक एक्शन स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, उसी तरह कई चीजों के लिए जरूरी है- पोशन, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, समानता, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक वृद्धि के लिए भी.

पब्लिक एक्शन केवल सरकारी क्रियान्वन या सरकारी नीति की बात नहीं है. भारत में सरकारी नीति एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नतीजा है, जिसमें नागरिक संस्थानों और आम जनता की भूमिका भी है. सामाजिक लोकतंत्र कम होने के कारण शायद जनता की भागीदारी इतनी नहीं है, जितनी होनी चाहिए, लेकिन इस स्थिति को बदलना भी विकास का एक हिस्सा है.

पब्लिक एक्शन खासकर तीन क्षेत्र में महत्वपूर्ण है, जिनको मैं विकास का आधार समझता हूं- शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा. इन तीनों में से पहले शिक्षा की बात करें. अगर पिछले बीस साल में आर्थिक विकास से एक चीज सीखी गयी, तो वह है कि विकास के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है. शिक्षा रोजगार के लिए जरूरी है, स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, लोकतंत्र के लिए जरूरी है, शोषण से बचने के लिए जरूरी है, आदि. और शिक्षा अपने आप भी जीवन की गुणवत्ता का एक हिस्सा होती है.

जीवन की गुणवत्ता के अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा मानव संसाधन को बढ़ाते हैं. मानव संसाधन की कमी के कारण पकौड़ा बेचनेवाला पकौड़ा बेचता है, जबकि वह शिक्षक या इंजीनियर भी बन सकता था. और इस स्थिति के कारण भारत में मजदूरों की मजदूरी मुश्किल से बढ़ती है, जबकि चीन में लगभग जीडीपी के हिसाब से बढ़ती है.

अजीब बात यह है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जीवन की गुणवत्ता और आर्थिक विकास का आधार होने के बावजूद भारत के लोकतंत्र में इन मामलों की बात नहीं होती. यह भारत के अंतर्विरोधों का एक ताजा उदाहरण है.

पिछले चार साल में भारत में सामाजिक नीति की उपेक्षा बढ़ी है. केंद्र सरकार सामाजिक नीति में कोई रुचि नहीं ले रही है, केवल पैसे बचाने में लगी है. स्वच्छ भारत अभियान को छोड़कर सामाजिक क्षेत्र में कोई खास पहल नहीं दिख रही है.

याद रखें, विकास की साइकिल दो पहिये से चलती है- पहला पहिया आर्थिक नीति है, तो दूसरा पहिया सामाजिक नीति है. मोदी सरकार सामाजिक नीति के पहिये को छोड़कर सिर्फ एक पहिये से साइकिल चलाने की कोशिश कर रही है. और आर्थिक नीति के पहिये से भी थोड़ी हवा निकलने लगी है. लोकतांत्रिक संघर्ष से ही परिवर्तन लाने की उम्मीद है.