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विकास को बरकरार रखनेवाला बजट-- आलोक पुराणिक

आम बजट को 'कामचलाऊ', 'लोकलुभावन' और 'ऐतिहासिक' जैसी संज्ञाएं दी जा रही हैं. लेकिन, इसे न तो पूरी तरह से लोगों के अलग-अलग तबकों को तुष्ट करने के इरादे से लाया गया है, और न ही इसमें आर्थिक सुधारों को गति देने की कोई ठोस पहल की गयी है. सरकार ने गांव और गरीब पर फोकस तो किया है, पर और बेहतर की गुंजाइश बनी हुई है. बजट के विभिन्न आयामों के विश्लेषण पर आधारित आज की विशेष प्रस्तुति.बजट ठीक वैसा नहीं निकला, जैसा विपक्षी दल चाहते थे.

मतलब वह चाहते थे कि कुछ ऐसा करे बजट कि इस सरकार को सूट-बूट की सरकार साबित करने का मौका मिले, पर यह बजट गांव-खेत में इंटरनेट चलाता हुआ, डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ाता हुआ दिखा. आयकर के मामले में इस बजट ने राहत दी है. ढाई लाख से पांच लाख की इनकम पर पहले आय कर दस प्रतिशत होता था, जिसे घटा कर पांच प्रतिशत कर दिया गया है. इससे अंतत: अर्थव्यवस्था में कुछ खरीद क्षमता पैदा होगी. अर्थव्यवस्था में बड़ी समस्या यह है कि मांग कमजोर है. मांग मजबूत हो, तो उद्योगपति नये निवेश के लिए प्रेरित होंगे. नये रोजगार वहां पैदा हो सकते हैं. 

ग्राम, कृषि और संबंधित क्षेत्रों में 1,87,223 करोड़ रुपये का प्रावधान यानी पिछले साल के मुकाबले 24 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति दो वजहों से ज्यादा संवेदनशील है, एक तो कई राज्यों में चुनाव हैं, दूसरे पांच सालों में किसानों की आय को दोगुना करने का इरादा है. यह आसान काम नहीं है. मनरेगा के लिए सरकार ने 48,000 करोड़ रुपये रखे हैं और सुनिश्चित किया है कि राहत अर्थव्यवस्था के उस तबके को मिले, जो संपन्नतम तबके में नहीं आता. किसानों की इनकम पांच सालों में दोगुनी हो जायेगी, यह बात मोदी सरकार लगातार कहती आयी है. बजट ने कहा है कि नाबार्ड के कंप्यूटराइजेशन पर ध्यान होगा, ताकि किसानों को आसानी से कर्ज दिया जा सके.

 

छोटा बनाम बड़ा कारोबार

वित्त मंत्री ने छोटी कंपनियों पर कर दायित्व कम कर दिया है. बजट के मुताबिक 50 लाख रुपये तक सालाना टर्नओवर वाली कंपनियों पर 30 प्रतिशत कर नहीं, 25 प्रतिशत रहेगा. बाकी कंपनियों पर कर दर तीस प्रतिशत ही रहेगी. बड़ी कंपनियों की मांग यह थी कि कर की दर में एक प्रतिशत बिंदु की कमी की जाये. पर, यह 25 प्रतिशत की दर अभी सिर्फ छोटी कंपनियों के लिए ही लायी गयी है, बड़ी कंपनियों को इसके लिए इंतजार करना होगा.

 

 


नौकरी बनाम रोजगार

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का लक्ष्य 2017-18 में दो लाख 44 करोड़ रुपये रखा गया, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुना है. गौरतलब है कि नौकरियों की बढ़ोत्तरी की गति धीमी है. कांग्रेस ने आर्थिक सर्वेक्षण से पूर्व पेश अपने दस्तावेज में मोदी सरकार के सामने सवाल उठाया था कि रोजगार को लेकर मोदी के दावे क्या हुए. मुद्रा योजना के तहत खास तौर पर छोटे कारोबारियों का कर्ज दिया जाता है. यानी रोजगार के लिए कर्ज सरकार दिलाना चाहती है. रोजगार और नौकरी का फर्क साफ है, नौकरियां अगर ज्यादा पैदा नहीं हो रही हैं, तो लोगों को स्वरोजगार की सोचनी चाहिए. मुद्रा योजना के तहत 2017-18 में सरकार ज्यादा कर्ज देगी. आर्थिक सर्वेक्षण में भी रोजगार की अनिश्चितता की बात कही गयी थी.

 

 


सबको न्यूनतम आय यानी यूनिवर्सल बेसिक इनकम की वकालत करते हुए आर्थिक सर्वेक्षण ने कहा था कि सबको न्यूनतम आय से इस मसले पर कुछ राहत मिल सकती है. मुद्रा योजना के तहत छोटे कारोबार के संवर्धन के प्रयास संभव है. दरअसल यह बात सरकार को भी समझ में आ रही है कि रोजगार के अवसर पैदा करना संभव है, सबके लिए नौकरियां पैदा कर पाना संभव नहीं है. नयी परियोजनाओं के आने के बाद भी नौकरियां पैदा होने के अवसर ज्यादा नहीं बन रहे हैं.

कंस्ट्रक्शन को महत्व 

इस बजट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण घोषणा की है कि सस्ते मकानों के निर्माण को एक बुनियादी उद्योग का दर्जा दिया गया है. मोदी सरकार का लक्ष्य 2020 तक 2 करोड़ मकान बनाने का है. कंस्ट्रक्शन को बजट ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका दी है. हाउसिंग को जो महत्व दिया गया है, उसका सीधा और परोक्ष असर कंस्ट्रक्शन पर पड़ता है. कंस्ट्रक्शन में उछाल आता है, तो स्टील, सीमेंट समेत कई कारोबारों में बेहतरी आती है और कंस्ट्रक्शन वह उद्योग है, जहां कम अशिक्षित लोगों को भी रोजगार मिल सकता है. कंस्ट्रक्शन को बढ़ावा दरअसल एक साथ कई उद्योगों को, रोजगार को बढ़ावा देना है. 

राजकोषीय घाटा

राजकोषीय घाटा 1917-18 में जीडीपी का 3.2 प्रतिशत रहेगा, यानी कुल मिला कर राजकोषीय घाटे को लेकर चिंता की जरूरत नहीं है. गौरतलब है कि राजकोषीय घाटे को लेकर काफी चिंताएं थीं, क्योंकि इसका ताल्लुक क्रेडिट रेटिंग से होता है. अगर राजकोषीय घाटा ज्यादा हो जाये, तो क्रेडिट रेटिंग कम होने की आशंका हो जाती है. गौरतलब है कि भारत सरकार अपनी उन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से नाराज है, जो भारत की रेटिंग को बेहतर नहीं करती हैं. आर्थिक सर्वेक्षण दस्तावेज में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने साफ तौर पर क्रेडिट रेटिंग में पक्षपात का आरोप लगाया कि चीन के मुकाबले भारत की स्थिति बेहतर होने के बावजूद चीन की क्रेडिट रेटिंग इंडिया के मुकाबले बेहतर रखी गयी है.

खेत पर नेट

भारत नेट योजना के लिए सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये रखे हैं, इसके तहत हाइ-स्पीड ब्राॅड-बैंड इंटरनेट की व्यवस्था की जायेगी. डिजिटल इकोनॉमी की दिशा में यह बड़ा कदम है. कैशलेस इकोनॉमी के लिए तेज गति का इंटरनेट जरूरी है. टेक इंडिया हमारा अगले साल का एजेंडा- ऐसा वित्त मंत्री ने कहा. पारदर्शिता के लिए डिजिटल इकोनॉमी पर जोर दिया गया है. नाबार्ड के कंप्यूटराइजेशन पर ध्यान दिया है, ताकि किसानों को आसानी से कर्ज दिया जा सके. इंटरनेट अब सिर्फ संवाद का नहीं, आर्थिक गतिविधि का भी केंद्र है.

चुनौतियां आगे हैं

इस बजट को बजट का भाग एक माना जाना चाहिए. बजट का दूसरा भाग जुलाई में या इसके बाद तब आ सकता है, जब जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स की व्यवस्था ठोस शक्ल लेगी. तब आय के क्या इंतजाम किये जायेंगे, साफ होगा. अभी माना जाना चाहिए कि सरकार खर्च और आय के नये आंकड़े भी पेश कर सकती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भावों का रुख लगातार ऊपर जा रहा है. गौरतलब है कि बरसों से वित्त मंत्री जेटली को कच्चे तेल के गिरते भावों का फायदा मिलता रहा है, पर अब वह फायदा मिलना संभव नहीं है. इसलिए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कुछ समय बाद बजट का भाग दो भी दिखायी पड़े.