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तिर्यक आसन: योगास्कर गोज़ टु मिस्टर प्राइम मिनिस्टर!

-जनपथ,

स्मार्ट सिटी के शोर के बीच स्मार्ट विलेज बनाने की भी पैरवी हो रही है। गाँवों को इस स्मार्ट शब्द की जद से बख्श देना चाहिए। भाषायी कौशल के मामले में गाँव, शहरों से अधिक स्मार्ट हो चुके हैं। शहर अभी हिंग्लिश बोल रहा है। वहीं गाँव भोजपुरी, हिंदी और अंग्रेजी को मिलाकर नई भाषा ईजाद कर चुका है।

गाँव से शहर के स्मार्ट कान्वेंट स्कूल में पढ़ने जाने वाला बच्चा कहता है- “अँधेरा हो गया है। कुछ लौकाई नहीं दे रहा है। लाइट बार दो।” भोजपुरी भाषा विद्वानों को इस भाषा का भी नामकरण कर देना चाहिए और इस भाषा के खतरों से भोजपुरी भाषाप्रेमियों को आगाह करना चाहिए।

भाषा विद्वानों ने हिंदी और अंग्रेजी की मिलीजुली भाषा को हिंग्लिश नाम दिया। हिंग्लिश को सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी की संयुक्त भाषा कहना उचित नहीं है। हमने हिंग्लिश के माध्यम से अंग्रेजों की गुलामी का बदला लिया है। अंग्रेजी भाषा के शब्दों की टाँग तोड़ अपना कब्जा जमा लिया है।

वैसे, तोड़ने में हम माहिर हैं। योग से भोग और बाबा से व्यापारी बनने की कला का खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन करने वाले रामदेव ने योग के माध्यम से देह को तोड़कर फिल्म फेयर अवार्ड बनना सिखाया। अंग्रेजों से थोड़ा और बदला लेना हो, तो फिल्म फेयर अवार्ड मुद्रा वाले योग का नाम योगास्कर रख देना चाहिए। योगास्कर नाम से फिल्म फेयर अवार्ड का महत्त्व बढ़ जाएगा। नाम के कारण अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार का बोध होगा। इससे योग के प्रचार-प्रसार में भी सहायता मिलेगी। 

भारत सरकार योग को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। ऑस्कर अवार्ड देने वाले अमेरिका के साथ इन दिनों भारत सरकार के रिश्ते मधुर हैं। जैसे दुकानदार का अपने ग्राहक के साथ होता है। भारत-अमेरिका संबंधों में ‘प्रोटोकॉल-तोड़ मधुरता’ है। ये भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और कूटनीति की सफलता है। प्रोटोकॉल-तोड़ मधुरता की हवाई यात्रा मित्र बराक से केम छो ट्रम्प तक चली। उसके बाद यात्रा में ‘ब्रेकर’ आ गया।

नहीं नहीं, जो बाइडेन नहीं। कोरोना। कोरोना के कारण नरेंद्र मोदी की प्रोटोकॉल-तोड़ मधुरता पैदा करने वाली यात्राएं स्थगित हैं। यात्रा शुरू होगी तो देश का प्रतिनिधित्व करते हुए नरेंद्र मोदी भारत की भाषायी विविधता को विस्तार देंगे। प्रोटोकॉल-तोड़ मधुरता बढ़ाने के लिए जो बाइडेन से कहेंगे- का हो बाइडेन!  फगुआ खेलाई? 

योग को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए भारत सरकार को प्रोटोकाल-तोड़ मधुरता से अर्जित हवाई साख का प्रयोग करना चाहिए। ऑस्कर कमेटी पर दबाव बनाना चाहिए कि ऑस्कर कमेटी, ऑस्कर अवार्ड का मोमेंटो फिल्म फेयर अवार्ड की तरह कर दे। अवार्ड की जगह योगास्कर मुद्रा बनाने में सक्षम किसी योग प्रचारक को पुरस्कारस्वरूप सौंपे। जीवंत अभिनय के बदले जीवंत योगास्कर अवार्ड। इससे योग को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिलेगी।

विलियम शेक्सपियर ने कहा था- “ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं।” ऑस्कर कमेटी ‘मेज़रमेंट ब्लाइंडनेस’ का शिकार है। उसे सिर्फ 72 एमएम का पर्दा दीखता है। लाखों किलोमीटर में फैला दुनिया के रंगमंच का पर्दा नहीं दीखता। इस पर्दे पर कितने ही प्रतिभाशाली अभिनेता गुमनामी का शिकार हैं। उनके अभिनय को ऑस्कर कमेटी लगातार नजरअंदाज कर रही है। ऑस्कर कमेटी को दुनिया के रंगमंच पर सबसे सशक्त अभिनय कर रही नरेंद्र मोदी नामक कठपुतली नहीं दिखायी देती? अभिनय के उत्तंग शिखर पर पहुँचकर कितना खाबसूरत रोता ये कठपुतली। योगास्कर दो बे मेजरमेंट ब्लाइंडों! 

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