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वैज्ञानिक विरासत को सहेजने का सवाल

नई दिल्ली [प्रवीण प्रभाकर]। 'विज्ञान के सामने दिक्कत नई सूचनाओं, नई समझ को इस्तेमाल करने भर की नहीं है, बल्कि पुरानी सूचनाओं, जानकारियों और समझ को सहेजने की ज्यादा है।' मशहूर भौतिक विज्ञानी और 1965 में नोबेल पुरस्कार विजेता रिचर्ड फेमैन का यह कथन विज्ञान और तकनीक के भविष्य की कम और अतीत की ज्यादा चिंता दिलाती है।

सचमुच जिज्ञासु प्रवृत्ति की वजह से इंसान खोज और आविष्कारों को लेकर काफी उत्सुक रहता है। उसकी नजर आने वाले दिनों में वैज्ञानिक जगत में क्या हलचल होने वाली है, इस पर ज्यादा होती है। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्ऱानिक मीडिया से लेकर न्यू मीडिया तक में इन आविष्कारों, खोजों और योजनाओं को तसल्ली बख्श तरीके से परोसा जाता है, लेकिन विज्ञान की दुनिया की हमारी भरी पूरी विरासत किन मुश्किलों और हालात से गुजर रही है, इस पर कोई चर्चा-बहस या चिंता देखने को नहीं मिलती। सचमुच वैज्ञानिक धरोहरों से हमारी धरा भरी पड़ी है और अब इसे सहेजने की गंभीर जरूरत है।

भले ही जोसेफ एच टेलर जूनियर ने इन बातों को दुनिया को केंद्र में रखकर कहा हो, लेकिन उनकी बात पर अमल करने की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे मुल्क को है। विदेशी संस्कृति में वैज्ञानिक विरासत को सहेजने के लिए कई तरकीबें है। मसलन, प्रोपगेंडा, पब्लिसिटी, कापीराइट, पेटेट और प्रीजर्व। प्रोपगेंडा इसलिए कि बेतार का आविष्कार हमारे यहां हुआ था, लेकिन इतिहास में नाम विदेशी वैज्ञानिक मार्कोनी का हुआ। यहां तक कि इसमें ब्रेन ड्रेन को भी गिना जा सकता है यानी दूसरे मुल्क के वैज्ञानिकों को अपने मुल्क में बेहतर सुविधा और धन मुहैया कराना और उनके आविष्कार को अपना बनाना। इस मायने में अमेरिका को उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है।

भारतीय मुल्क के ज्यादातर वैज्ञानिक वहां शोध से जुड़े है और उनके नए-नए अविष्कार वैज्ञानिक जगत में खलबली पैदा करने वाले साबित हुए है।

इस मायने में यहां पर 2003 में प्रकाशित एक किताब 'द साइंटिफिक एज' का जिक्र जरूरी है। इसमें 20वीं सदी के दस भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों की चर्चा है, जिसमें पांच 1950 से पहले की हैं और बाकी 1950 के बाद की। इस किताब के बहाने 20वीं सदी की दस वैज्ञानिक उपलब्धियों की जानकारी मिल जाती है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या इनसे पहले भारत में वैज्ञानिक आविष्कार और खोज नहीं हुए, और अगर हुए तो क्या इसके साक्ष्य और दस्तावेज हमारे पास हैं और अगर है तो कितने सुरक्षित हाल में है? सवाल इसलिए भी मायने रखता है कि इस किताब में सीवी रमन और एसएन बोस की चर्चा है, जहां तक की जानकारी स्कूली किताबों में भी मिलती है, लेकिन इससे पहले की वैज्ञानिक विरासतों की जानकारियां हमें नहीं मिलती हैं। अगर मिलती भी हैं तो छिटपुट अंदाज में, जिसमें विश्वास कम और भ्रम ज्यादा दिखता है। इसलिए जितने दावे के साथ गैलीलियो के उपलब्धियों की चर्चा होती है, उतने ही दावे के साथ आर्यभट्ट और वराहमिहिर की उपलब्धियों पर प्रकाश नहीं डाला जाता है।

हमने अब तक पढ़ा कि गैलीलियो बहुत बड़े खगोलशास्त्री थे। उन्होंने सबसे पहले किसी पदार्थ को हवा या पानी में मापने के लिए जलस्थैतिक संतुलन [हाइड्रोस्टैटिक बैलेंस] का आविष्कार किया। ये भी पढ़ा है कि गैलीलियों ने सबस पहले कहा कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है, लेकिन हमें यह नहीं बताया जाता है कि गैलीलियो से पहले ही हमारे यहां आर्यभट्ट, वराहमिहिर और भास्कर द्वितीय हुए। कैंब्रिज और आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पहले ही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय में खगोलशास्त्र की पढ़ाई होती थी।

दरअसल, इस पिछड़ेपन की वजह रही पाश्चात्य देशों की तुलना में हमारे देश की वैज्ञानिक विरासत का प्रचार-प्रसार का कम होना। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे इतिहास की किताब में अंग्रेजी शासन काल ज्यादा हावी है, इसलिए उन्होंने जो भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियां गिनाई, उससे आगे हम नहीं बढ़ सके।

बहरहाल, प्रचार की पहली झलक मिली फिल्म 'पूरब और पश्चिम' में। पूर्वी और पाश्चात्य सभ्यता की तुलना को परोसने वाली फिल्म का गाना- जब जीरो दिया भारत ने तब दुनिया को गिनती आई., सबकी जुबान पर ऐसा चढ़ा कि आज तक उतरने का नाम नहीं लेता।

नई दिल्ली के राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र ने हमारी वैज्ञानिक विरासतों को सहेजने की कोशिश जरूर की है। पिछले महीने केंद्र ने एक नई गैलरी 'ऑवर साइंस एंड टेक्नोलॉजी हैरिटेज' की शुरुआत की है। इस कोशिश को जानने की इच्छा मुझे विज्ञान केंद्र तक खींच ले गई। वहां मेरी नजरे इन कोशिशों को टटोलने में लग गई। यह देखकर अच्छा लगा कि देर से ही सही, लेकिन रंग बिरंगी पट्टिकाओं, डेमो, प्रतिरूपों, प्राचीन अवशेषों, यंत्रों और मल्टीमीडिया से भरी इस गैलरी में भारत की 5,000 साल पुरानी वैज्ञानिक विरासतों को सहेजा गया है। इस गैलरी में 2300 ईसा पूर्व में बने एक हल की मृत्तिका मिली।

गौरतलब है कि इतिहास में सुमेरियन सभ्यता के दौरान हल की उत्पत्ति की चर्चा मिलती है, लेकिन यहां ज्ञात हुआ कि हल का निर्माण सबसे पहले हड़प्पाकाल में हुआ था। ऐसी कई जानकारियां यहां है।

अंकगणित की प्रयोग विधि, परमाणु शब्द का इस्तेमाल, शून्य और दशमलव का ज्ञान और ऊर्जा संरक्षण व परिवर्तन, माप-तौल की सारी पुरानी तकनीकों [कौटिल्य से लेकर अकबर तक के काल की], ग्रैविटी, इलास्टिसिटी और विस्कोसिटी, सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान खाना बनाने की तकनीक, पदार्थो के शुद्धिकरण के तरीके, 300 से भी ज्यादा तरीकों की शल्य चिकित्साएं, भवन निर्माण कला, वूट्स बनाने जैसी कई अहम तकनीकों को सहेजने का यह प्रयास काफी सराहनीय बन पाया।

इस साल दिल्ली में कामनवेल्थ गेम्स का आयोजन होना है। दुनिया भर के सैलानी, खिलाड़ी और आयोजक यहां जुटेगे और उन्हे हमारे वैज्ञानिक विरासत की जानकारी इस संग्रहालय के जरिए जरूर मिलेगी, लेकिन सवाल यह है कि विज्ञान विरासत को सहेजने की यह कोशिश अकेले काफी है? सच यही है कि हमें इस दिशा में और भी दूसरे तरह के प्रयासों की जरूरत है।

बहरहाल, पुरानी मान्यता है कि किसी तकनीक या यंत्र को सहेजने की प्रक्रिया तभी मुमकिन हो पाती है, जब उस तकनीक, धरोहर को लगातार रियाज-अभ्यास में लाया जा सके। रोजाना के हिसाब से उफनती नई तकनीकों की बाढ़ में यह करना मुश्किल-सा है।

अब कौन कैलकुलेटर, कंप्यूटर के जमाने में बारहखड़ी याद रखे? लेकिन ऐसी कई वैज्ञानिक विरासत हमें अपने पूर्वजों से मिली है, जो हमारी जिंदगी को सरल बना सकती है, जिसे बड़ी आसानी से पुन: इस्तेमाल में लाया जा सकता है। इसके अलावा जरूरत इस बात की है कि हम अपनी वैज्ञानिक विरासतों का दुनिया भर में प्रचार-प्रसार करे। शुरुआत तो स्कूली पाठ्यक्रमों से होनी ही चाहिए। केंद्र सरकार को भी चाहिए कि वह भारतीय आविष्कारों, खोजों को पेटेट कराए। तभी जाकर हमारी वैज्ञानिक विरासत बचे रहेगी और आने वाली पीढ़ी को इस पर गर्व होगा।