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शासन की भटकी प्राथमिकताएं-- उर्मिलेश

अपनी हाल की पूर्वी उत्तर प्रदेश यात्रा में मुझे बार-बार इस बात का एहसास होता रहा कि किस तरह हमने अपने वास्तविक मसलों को छोड़ कर अनावश्यक सियासी विवादों को प्राथमिकता में शुमार कर लिया है! यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति, एक दल या एक सरकार की बात नहीं है, ऐसा लगता है मानो यह हमारा राष्ट्रीय स्वभाव बन गया है.

बड़े राजनीतिक दलों के बड़े पदाधिकारी भी एक-दूसरे को गालियां देकर राष्ट्रीय विवाद छेड़ते रहते हैं. ऐसे मसलों को महत्व देना राष्ट्रीय न्यूज चैनलों की आदत में शुमार है. विवादों के बीच वे किसी को ‘नेता' तक बना देते हैं! कुछ राष्ट्रवादी सांस्कृतिक संगठनों की अपनी-अपनी ‘निजी सेनाएं' सक्रिय हैं, जो कभी ‘गो-रक्षा' के नाम पर, तो कभी अंतरजातीय-अंतरधर्मीय प्रेम या विवाह रोकने के नाम पर ‘लव-जिहाद विरोधी' हथियारबंद अभियान चलाती हैं. विपक्ष इसकी निंदा करता है. फिर ऐसे विवादों में उलझा देश और समाज अपने वास्तविक मसलों को लगातार नजरअंदाज करता जाता है. भारत की राजनीति आज इसी खतरनाक मुकाम पर खड़ी है.

भले ही वास्तविक मुद्दों से समाज को लगातार भटकाया जा रहा हो, लेकिन जो लोग गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सेहत से जुड़ी समस्याओं को झेल रहे हैं, उन्हें इनके बारे में ज्यादा बेहतर जानकारी है. मैं जुलाई महीने के घटनाक्रमों और अपने यात्रा-अनुभव की रोशनी में कुछ जरूरी मुद्दों को सामने रख रहा हूं. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में दो संगोष्ठियों के सिलसिले में एक जिला मुख्यालय से दूसरे मुख्यालय, एक टैक्सी से जा रहा था. अचानक एक जगह टैक्सी रुक गयी.

मैंने पूछा ‘क्या हुआ?', तो ड्राइवर ने अंगुली से रेलवे-लाइन की तरफ इशारा किया और कहा, ‘कोई ट्रेन आ रही है.' सड़क और रेल-लाइन के बीच कोई फाटक नहीं था. सिर्फ रेलवे स्टाफ ने वहां लाल झंडी लगा दी थी. कुछ देर बाद ट्रेन आयी, तब हमने रेल-लाइन पार की. लेकिन उसी पूर्वांचल के भदोही में स्कूली वैन के ड्राइवर ने इंतजार नहीं किया और बीते सोमवार को पैसेंजर ट्रेन और स्कूली वैन की भिड़ंत में आठ बच्चों की मौत हो गयी. दसेक बच्चे गंभीर हालत में अस्पताल में हैं.

ऐसी दुर्घटनाएं पूरे देश में आम हैं.

हर महीने कहीं न कहीं ऐसा होता रहता है, पर रेल मंत्रालय का सारा जोर कुछेक लाख करोड़ रुपये की लागत वाली मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन, दिल्ली-आगरा जैसे शहरों के बीच स्पीड ट्रेन, कहीं मोनो ट्रेन या कुछ महानगरों सहित देश के अनेक मझोले शहरों में मेट्रो ट्रेन चलाने पर है. मैं रेलवे के आधुनिकीकरण की सारी परियोजनाओं के खिलाफ नहीं हूं. लेकिन, जिस देश में लगभग 12 हजार ऐसी जोखिम भरी रेल-सड़क क्राॅसिंग हैं, वहां उसकी प्राथमिकता में ओवरब्रिज, अंडरपास या आॅटोमेटिक गेट बनाना क्यों नहीं शामिल है? रेलवे के जानकारों के मुताबिक, ऐसे तमाम असुरक्षित रेलवे-क्राॅसिंग को सिर्फ 60 हजार करोड़ खर्च करके सुरक्षित बनाया जा सकता है. ऐसे में लाखों करोड़ रुपये वाली बुलेट ट्रेन दौड़ाने की क्या जल्दी है?

दूसरा नजारा जो मैंने पूर्वांचल के कुछ शहरों-कस्बों में इस बार देखा, वह भी हमारी भटकी हुई राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की पोल खोलता है.

वाराणसी और गाजीपुर के बीच मैं जिन-जिन शहरों-कस्बों के बीच से गुजरा, वहां सबसे ज्यादा भीड़ निजी क्लीनिकों, पैथोलाॅजिकल लैबों और डाॅक्टरों के घरों के पास देखी. ज्यादातर सरकारी अस्पतालों को खस्ताहाल देखा. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इस तरह की ज्यादातर लैबें और क्लीनिकें आज लूट का अड्डा बनी हुई हैं. कई-कई शहरों-कस्बों में तो रेलवे स्टेशन और बस स्टैंडों पर ही एजेंट घूमते मिल जाते हैं. होटलों के एजेंट की तरह वे क्लीनिकों-लैबों के लिए रोगियों या उनके परिजनों को आकृष्ट करते हैं.

आखिर हमारे छोटे-बड़े राजनीतिक दलों के लिए जन-स्वास्थ्य का ज्वलंत मुद्दा क्यों नहीं दिखता? विश्वबैंक-आइएमएफ-अमेरिका आदि के कहने पर हम जीएसटी लागू कराने या तमाम विभागों-सेक्टरों में सौ फीसदी एफडीआइ के लिए बैचैन रहते हैं. फिर जन-स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ाने की डब्ल्यूएचओ की सिफारिश क्यों नहीं मानते? जन-स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के हवाले क्यों कर रहे हैं? स्वास्थ्य का मुद्दा सिर्फ एक व्यक्ति की जिंदगी से ही नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है.

गंभीर बीमारी के चलते किसी व्यक्ति का खाता-पीता मध्यवर्गीय या निम्न-मध्यवर्गीय परिवार भी अचानक गरीबी रेखा के नीचे खिसक जाता है. क्या यह गंभीर चिंता का विषय नहीं कि ये जरूरी सवाल आज शासन और सियासत के शीर्ष एजेंडे से गायब हैं?