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श्योपुर जिले में जलसंकट : मवेशियों के साथ पलायन कर गए ग्रामीण

श्योपुर-बड़ौदा। सूखे का असर इंसानों के साथ जानवरों पर भी विपरीत रूप से पड़ा है। कराहल एवं विजयपुर विकासखंड के वनांचल में बसने वाले पशुपालक अपने मवेशियों की जान बचाने के लिए पलायन कर गए हैं। दोनों विकासखंड से पलायन करने वाले मवेशियों की संख्या 7 हजार से अधिक हैं। इनमें से 5 हजार गाय व 2 हजार भैंस और भेड़-बकरियां हैं।

कलमी-गोरस पिपरानी आदि गांवों में गुर्जर-मारवाड़ी समुदाय के लोग मवेशी पालकर आजीविका चला रहे हैं। इस समुदाय के लोग जंगलों में ही अपने निवास बनाकर रहते हैं और मवेशियों का दूध दुहकर बाजार में बेचने का काम कर रहे हैं। यह लोग नदियों के आसपास बसे हैं ताकि मवेशियों को पानी का संकट न हो।

इन दिनों पड़ रही भयंकर गर्मी से सभी जंगल की नदियां व तालाब आदि सूख गए हैं। मवेशियों को तो क्या इंसानों के पीने के पानी का भी संकट आन खड़ा हुआ है। अपने मवेशियों को बचाने के लिए पशुपालक किसान पशुओं को बड़ौदा व विजयपुर के आसपास पानी वाले स्थानों पर ले जाकर बस गए हैं।

बड़ौदा के चन्द्रसागर तालाब के पास, नहर के नीचे मैदान में, पांडोला के पास, अजापुरा गांव में खुले मैदान में इन दिनों बाहर से आई मवेशियों का मेला खूब देखा जा रहा है। यह मवेशिया कलमी गांव से आई है जिनकी संख्या 2 हजार के आसपास है। इसी तरह खातौली रोड पर और विजयपुर-वीरपुर में भी पलायनित मवेशियों की फौज खूब देखी जा रही है।

फसल अवशेष बना मवेशियों का चारा

इन दिनों गेहूं की कटाई से खाली हुए खेतों में शेष बचे अवशेष को यह पलायनित मवेशी खाकर पेट भर रही है। मवेशी पालक दिनभर खेतों में मवेशियों को फसल के अवशेष खिलाकर शाम को वापस नियमित ठिकाने पर ले आते हैं। मवेशियों के खेतों में चरने से किसानों को भी कोई एतराज नहीं है। ऐसा मान्यता है कि जिस खेत में मवेशी चरेंगे उस खेत में आगामी फसल की पैदावार अच्छी होगी। मवेशी चरते हैं वहां पर खाद के रूप में गोबर दानकर आते हैं। यही गोबर मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने का काम करती है।

विजयपुर क्षेत्र में दम तोड़ रही मवेशी

विजयपुर के आसपास सभी नदियां व जलाशय सूख चुके हैं। इसका विपरीत प्रभाव मवेशियों पर पड़ने लगा है। कई गांव ऐसे हैं जहां पर ग्रामीण जलसंकट व रोजगार के अभाव में पलायन कर गए हैं। ऐसे लोग अपने घरों में तो ताले डाल गए है लेकिन मवेशियों को भगवान भरोसे छोड़ गए हैं। सूखे के कारण इन दिनों जंगल में चारे के साथ पानी का भी संकट आ गया हैं। नदियां व नाले सूख जाने से मवेशियों को जो थोड़ा बहुत पानी मिलता था वह भी नहीं मिल रहा हैं। अब पानी के अभाव में मवेशियों की मौत होने लगी है।

चन्द्रसागर बना मवेशियों की प्यास बुझाने का साधन

बड़ौदा के आसपास बसे गुर्जर-मारवाड़ी परिवार अपने मवेशियों को दिनभर खेतों में चराने के बाद पानी पिलाने के लिए चन्द्रसागर पर ले जा रहे हैं। चन्द्रसागर इन दिनों उक्त मवेशियों की प्यास बुझाने का मुख्य साधन बन गया है। पर्यटक क्षेत्र के रूप में विकसित हो चुके चन्द्रसागर पर पानी पीने आने वाले मवेशियों को नगरपरिषद भी नहीं रोक रही है। नगरपरिषद अध्यक्ष भारती तोमर ने इस विषम परिस्थिति में पशुपालकों को सहयोग करने के निर्देश सीएमओ को दिए हैं। नपा कोई भी कर्मचारी मवेशियों को तालाब से पानी पीने से नहीं रोकता है।

इनका कहना है

-कलमी गांव से करीब 10 परिवार 1500 गाय और 500 भेड़-बकरी व भैंस लेकर अजापुरा से बड़ौदा तक विगत एक माह से रुके पड़े हैं। जब तक मानसून नहीं आएगा तब तक यहां रुकना हमारी मजबूरी है।

रंगलाल गुर्जर पशुपालक, कलमी

-कलमी में पानी का संकट नदी पर बने डैम के फूटने से गंभीर हुआ है। 2003 में नदी पर बना डैम तीन साल पूर्व फूट गया था। तब से ही नदी में पानी नहीं ठहरता है। प्रशासन उक्त डैम को बनवाकर समस्या हल कर सकती है।

गोविंद गुर्जर पशुपालक कलमी