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श्रम संकट से जूझते जापान की बढ़ती उलझनें

इन दिनों जब भारत समेत एशिया और अफ्रीका के कई देशों से आबादी के तेजी से बढ़ने की खबर आ रही है, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने स्वीकार किया है कि जापान में जन्म-दर में भारी गिरावट के कारण वहां की जनता जिस तरह तेजी से बूढ़ी हो रही है, वह घोर चिंता का विषय है। उन्होंने इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए सुधार के कई कदम उठाने की बात भी कही है। जापान की सरकार देश के बाहर से चार लाख विदेशी कामगार लाना चाहती है और वह भी सिर्फ पांच वर्षों के लिए। जापान की संसद में जब यह मामला आया है, तो विपक्षी दल इसका जोरदार विरोध कर रहे हैं।

इस समय जापान में नागरिकों की औसत उम्र 84 साल है, जो संसार में सबसे अधिक औसत आयु है। वहां 28 प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जिनकी उम्र 65 वर्ष से अधिक है। इसकी तुलना में जर्मनी में केवल 21 प्रतिशत लोग हैं, जिनकी उम्र 65 साल से अधिक है। अमेरिका में तो मात्र 15 प्रतिशत लोग हैं, जिनकी उम्र 65 वर्ष से अधिक है और भारत में मात्र छह प्रतिशत ऐसे लोग हैं, जिनकी उम्र 65 वर्ष से अधिक है। जापान में 100 वर्ष से ऊपर आयु के लोग 70 हजार के लगभग हैं। यह संख्या पिछले 20 वर्षों में सात गुना ज्यादा बढ़ गई है। खुद सरकार के आंकड़े यह भी बता रहे हैं कि यहां काम करने की उम्र के लोगों की संख्या काफी कम होती जा रही है। आगे यह संकट और बढ़ेगा, क्योंकि वृद्ध होती आबादी के बीच यह संख्या लगातार कम होती जाएगी। इसका असर देश के उत्पादन और उत्पादकता, दोनों पर पड़ना तय है।

लेकिन आम जापानी इस बात के खिलाफ हैं कि बाहर से श्रमिकों का आयात किया जाए। सरकार ने इसका एक समाधान सुझाया है। सरकार ने छात्रों और ऐसे युवकों का, जो ट्रेनिंग ले रहे हैं, पांच वर्षों के लिए जापान में आकर रहने की अनुमति दी है। लेकिन शर्त यह होगी कि वे पांच वर्ष से अधिक अवधि के लिए जापान में नहीं रहेंगे और अपने परिवार के सदस्यों को भी नहीं ला सकेंगे। विपक्षी दलों के लगातार विरोध के बाद शिंजो आबे अब लगातार सबको यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि ये लोग ज्यादा से ज्यादा छह वर्ष ही जापान में श्रमिक या प्रशिक्षु के रूप में काम करेंगे।

इस बीच सरकार कुछ और भी नुस्खे आजमा रही है। जापान में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि महिलाएं प्राय: एक बच्चे के जन्म के बाद नौकरी छोड़ देती थीं। इस प्रवृत्ति को समाप्त करने के लिए सरकार ने कार्यस्थलों पर ऐसी सुविधाएं मुहैया कराई हैं, जहां नवजात शिशुओं की देख-रेख की जा सके। इसके अच्छे परिणाम भी मिले हैं। इसके साथ ही सरकार जल्द ही रिटायरमेंट की उम्र 60 से बढ़ाकर 65 करने वाली है। निजी कंपनियों को भी यही सलाह देने की तैयारी चल रही है कि वे रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाएं। इसके अतिरिक्त जो लोग रिटायर हो चुके हैं, उन्हें आकर्षक शर्तों पर अंशकालिक नौकरी देने की कोशिशें भी हो रही हैं। व्यवस्था यह भी है कि काम के साथ ही उनकी पेंशन भी जारी रहेगी। इन सुविधाओं के आकर्षण से लोग जापान में सरकारी और निजी कंपनियों में फिर से नौकरी करने के लिए आगे आ रहे हैं। लेकिन जो लोग नौकरी करने आ रहे हैं, उनकी यह आम शिकायत है कि उन्हें पेंशन के अलावा नई नौकरी में जो तनख्वाह मिलेगी, उस पर बहुत अधिक आयकर लग जाएगा। इसलिए बहुत से लोगों को यह स्कीम ज्यादा फायदेमंद नहीं लग रही है।

पूरी दुनिया में हुए तमाम सर्वे यही बताते हैं कि रिटायर हो चुके ज्यादातर लोग अंशकालिक नौकरी के लिए तैयार रहते हैं। काफी हद तक यही स्थिति जापान मैं भी है, लेकिन एक कल्याणकारी राज्य के रूप में जापान की जटिलताएं भी बहुत ज्यादा हैं। सरकार अब अपने इस रूप में बदलाव करना चाहती है। वहां एक योजना बन रही है, जिसके तहत बूढ़े लोगों पर अस्पताल का जो खर्च आएगा, उसे आधा सरकार वहन करेगी और आधा मरीज को वहन करना होगा। पहले अस्पताल का पूरा खर्च सरकार वहन करती थी। इसका जिस तरह से विरोध हो रहा है, उससे यह नहीं लगता कि जापान सरकार यह काम कर पाएगी। लेकिन कम श्रम बल और कम उत्पादकता के बीच सरकार पर खर्च कम करने के दबाव भी बहुत बड़े हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)