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संकट के दोराहे पर हैं आदिवासी-- गिरिधारी राम गौंझू ‘गिरिराज

सर्वोच्च न्यायालय ने जंगलों में रहने वाले ऐसे आदिवासियों और वनवासियों को निकालने के लिए कहा है, जिनका वनभूमि पर दावा नहीं बनता। जाहिर है, इस आदेश के बाद झारखंड और बिहार समेत तमाम राज्यों के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों और वनवासियों के समक्ष बड़ा संकट खड़ा हो गया है। जंगल को ही अपना सब कुछ मानने वाले ये आदिवासी वहां से बेदखल होने के बाद कहां जाएंगे?

अगर हम सिर्फ झारखंड को लें, तो यहां के पुराने बाशिंदे हैं सदान, आदिवासी- मुंडा, उरांव, खड़िया आदि। इनके खेत-खलिहान और गांव-घरों को न तो प्रकृति ने बनाकर दिया है, और न किसी सरकार या शासक ने। यहां के बाशिंदों ने अपनी हाड़तोड़ मेहनत से जंगल के बीच खाली स्थान पर, पहाड़ों के नीचे और नदियों के किनारे खेत, चांवरा, टांड़ आदि खेती करने के लिए बनाए। जंगल, पहाड़, नदी ही नहीं, जंगली जानवरों को भी इन्होंने बचाकर रखा। सदानों ने ‘कोड़कर' खेत बनाए, मुंडाओं ने ‘खुटकटी' व गांव बनाए और उरांवों ने ‘भुइहरी' खेत बनाए। आदिकाल से ये अपने पुरखों के बनाए खेत-दोन को आबाद करते आ रहे हैं। तब भूमि (खेत-दोन) बनाने की छूट थी। इन झारखंडियों के बनाए खेत-दोन और बसाए गांव को सरकार ने विकास के लिए, यानी कारखाने लगाने, बडे़ डैम बनाने, खान-खदान और बड़े-बडे़ प्रतिष्ठान आदि के लिए उजाड़ दिया। इनकी जगह बाहर के लोगों को सुख-सुविधा के साधनों के साथ बसाया गया, परंतु उजाडे़ गए या बेदखल किए गए लोगों को न तो सही ढंग से मुआवजा मिला, न नौकरी मिली। न इन्हें उनकी संस्कृति और सुविधाओं के साथ बसाया गया।

झारखंड के लोगों को जंगल, पहाड़, नदी-झरने प्रिय हैं। इनको बचाकर रखना जंगल के लोग जानते हैं। इसके बिना झारखंडियों के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जंगल के बीच खेत-दोन होने के कारण वर्षा में जंगल के सडे़-गले पत्ते खेत को उपजाऊ बनाते हैं। जंगल में इनके मवेशी चरते हैं। जंगल से ही इन्हें लकड़ी, कंद-मूल, साग-पात, दतवन, जड़ी-बूटी, रूगड़ा-खुखड़ी आदि वनोपज प्राप्त होते हैं, जो इनकी आजीविका के साधन भी हैं।

जंगल कानून बनाकर ब्रिटिश सरकार ने झारखंडियों को जंगल में पशु चराने, लकड़ी, वनोपज आदि लेने पर रोक लगा दी। अंग्रेजी शासनकाल में रेल लाइन बनाने के समय पटरियां बिछाने के लिए साल के बडे़-बड़े पेड़ काट डाले गए, जबकि, झारखंडी आदिवासी, सदान आवश्यक होने पर ही पेड़ काटते हैं, वह भी जमीन से एक हाथ ऊपर, ताकि उससे फिर चारों तरफ नए पेड़ निकल सकें। जलावन के लिए झाड़ियों या टेढ़े-अनुपयोगी वृक्षों की डालियां काटते हैं। पर, जंगल बचाकर रखते हैं। जंगल इनका पोषण करता है। कोई अपने पालनकर्ता का विनाश कैसे कर सकता है? जंगल में रहने वाले बिरहोर कभी भी लकड़ी काटकर घर नहीं बनाते। वे पत्तों से कुंबा (झोंपड़ी) बनाकर सदियों से रहते आ रहे हैं, पर जंगल बर्बाद नहीं किया। जंगल को बचाए रखना वन देवता की पूजा है। अकाल के समय लोगों को जंगल ही पालता है।

जंगल के पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जीव-जंतु (जल जीव भी) इनके गोत्र (टोटेम) हैं। इनकी रक्षा करना इनका धर्म है। ये इनकी जाति वंश के प्रतीक हैं। इससे पर्यावरण की रक्षा भी होती है। सरहुल में सिर्फ साखू के फूल का, करम पर्व या जीतिया में तीन पतली डालियों को एक बार में काटते हैं। वे मोटी डाली का प्रयोग नहीं करते। शिकार करने के दौरान भी मादा, गाभिन और शिशु जानवरों को मारना पूरी तरह से वर्जित है। ये आगे के लिए बचाकर जड़ी-बूटी आदि का प्रयोग करते हैं, यानी जंगल का आदमी हमेशा जंगल को बचाए रखने की चिंता और उपाय में लगा रहता है। वन ही इनके जीवन का आधार है।

सुप्रीम कोर्ट ने 27 जुलाई, 2019 तक वन भूमि में रहने वालों को बेदखल करने का आदेश दिया है। इन्हें इनके गांव-घर, सरना, मसना, हड़गड़ी, बाग-बगीचों से सरकारें विकास के नए मंदिर बनाने के लिए बेदखल करती आ ही रही थीं, अब जो बचे-खुचे जंगल में रहने वाले आदिवासी-मूलवासी हैं, उन्हें भी सरकार जंगली जानवरों की तरह खदेड़ रही है। कभी सरकार वन भूमि में रहने वालों को पट्टा देने की बात करती है, तो अदालत बेदखल करने की। आदिवासी, वनवासी संकट के दोराहे पर हैं।

आदिवासियों को झारखंडी ब्रिटिश न्यायालय का बहुत कड़वा अनुभव रहा है। तब अदालत के बारे में कहा जाता था- ‘अ' माने आओ, ‘दा' माने दाखिल करो, ‘ल' माने लड़ो, ‘त' माने तबाह हो जाओ। मरंग गोमके जयपाल सिंह ने कहा था कि ब्रिटिश अदालतें हम झारखंडियों के लिए तबाह करने की जगहें हैं। फिर कचहरी के बारे में कहते हैं कचिया (काचा- रुपया-पैसा) हारने की जगह। इतना ही नहीं, गांव वाले यह भी कहते हैं- ‘धनी को बेल, गरीब को जेल।' कितने निरपराध जेलों में सड़ रहे हैं। हमारी अदालतें इतनी खर्चीली हैं, हजारों-लाखों में वकील फीस लेते हैं। तभी तो लोग कहते हैं- ‘धनी शासन करता है कानून पर और कानून शासन करता है गरीब पर।' ऐसी कहावत जनमानस में क्यों उठती हैै?

वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि वन क्षेत्र में रहने वालों को वहां से बेदखल कर दिया जाए। उनको फिर से बसाने की चिंता क्यों नहीं है? हमेशा से झारखंडी उजाड़े जाते रहे, बेदखली के शिकार होते रहे। कब इन्हें बसाने की चिंता होगी और इसके लिए कानून कब बनेंगे? जंगलों को जितना नुकसान सभ्य बाहरी समाज ने पहुंचाया है, उसका एक अंश भी आदिवासियों ने नहीं किया।

वर्तमान में अदालत में एक हिरण के शिकार का मुकदमा 18 वर्ष से चल रहा है, जबकि झारखंड में हर जाति की अपनी पारंपरिक पंचायत होती थी। इनमें पारंपरिक पड़हा पंचायत, मानकी मुंडा, माझी परगना आदि जातीय पंचायतें शामिल थीं। ये पंचायतें कम से कम समय में बिना खर्च के मामलों का निपटारा पंचों की मदद से करती थीं। क्या ऐसी न्याय व्यवस्था गलत थी वर्तमान की तुलना में?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)