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संपादकीय : विकास बनाम विस्थापन

गुजरात में सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने को मिली हरी झंडी निश्चित ही देश में बदले राजनीतिक माहौल का नतीजा है। 2006 में नरेंद्र मोदी ने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर इस परियोजना को पूरी मंजूरी दिलाने के लिए 51 घंटों का उपवास किया था। अब वे प्रधानमंत्री हैं तो नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण (एनसीए) ने बांध की ऊंचाई 121.9 मीटर से बढ़ाकर 138.7 मीटर करने की इजाजत दे दी है। इससे बांध के जलाशय में परियोजना में अपेक्षित पूरी क्षमता के साथ जल संग्रहण हो सकेगा।

गुजरात सरकार और राज्य के कई हलकों में इस खबर का स्वागत होना स्वाभाविक ही है। राज्य के अधिकारियों का कहना है कि इससे गुजरात में सिंचाई और पेयजल की सुविधाएं अधिक इलाकों में दी जा सकेंगी और बिजली उत्पादन को बल मिलेगा। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को भी बिजली उत्पादन के लिहाज से लाभ होने का अनुमान है। तो सरकारों का कहना है कि ये फैसला कृषि और उद्योग दोनों क्षेत्रों तथा उपभोक्ताओं के हित में है।

इसके बावजूद यह निर्णय आठ साल से ज्यादा समय से लटका था, तो कारण अधिक इलाकों के डूब क्षेत्र में आने और उससे बड़ी संख्या में लोगों (खासकर आदिवासी समुदायों) के विस्थापित होने की आशंका थी। नर्मदा नदी पर अतीत में बनी परियोजनाओं से विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास पर कई तरह के सवाल उठे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि हजारों लोगों का पुनर्वास नहीं हुआ, जबकि बहुत-से दूसरे लोगों का पुनर्वास असंतोषजनक है। इसीलिए यह प्रश्न प्रासंगिक है कि नए डूब क्षेत्र के विस्थापित लोगों के साथ क्या होगा? केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने कहा है कि उनका पूर्ण पुनर्वास होगा। लेकिन अगर अतीत में सरकारें ऐसा करने में विफल रहीं तो अब इसे कैसे सुनिश्चित किया जाएगा, सरकार इसकी कार्ययोजना सार्वजनिक रूप से पेश करे तो वह इस मुद्दे पर समाज के सभी वर्गों में भरोसा पैदा कर सकेगी।

अपने देश में विकास को समावेशी बनाने की बातें गुजरे वर्षों में खूब की गई हैं। परंतु ऐसे मॉडल की अब भी तलाश है, जिसमें सभी तबके सहभागी बन सकें। केंद्र में नई सरकार बनने से विकास परियोजनाओं के संदर्भ में निर्णय प्रक्रिया के तीव्र होने के संकेत हैं। इससे आर्थिक विकास को गति देने में जरूर मदद मिलेगी। मगर अब यह दुनियाभर में स्वीकृत सिद्धांत है कि विकास वही टिकाऊ होता है, जिसमें समाज के सभी वर्ग अपना हित देखते हों और जो पर्यावरण जैसी व्यापक महत्व की चिंताओं का उचित समाधान प्रस्तुत करते हुए आगे बढ़ता हो। सरदार सरोवर बांध के सिलसिले में भी यह कसौटी प्रासंगिक है। सरकार यह संतुलन बना पाई तो वह 'विकास बनाम विनाश" की लंबे समय से जारी बहस को वांछित परिणति तक ले जाएगी। इससे देश में विकास परियोजनाओं को लेकर उभरने वाले टकरावों का समाधान होगा। यह चुनौती बड़ी है, लेकिन नामुमकिन नहीं।