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संवेदनहीन व्यवस्था और लापरवाह चिकित्सक-- सुनीता मिश्रा

दुनिया भर में डॉक्टरों को भगवान का पर्याय माना जाता है। लेकिन पैसों की भूख और लापरवाही के कारण उनमें संवदेनशीलता शून्य होती जा रही है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के झांसी में एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया, जहां महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने इलाज के लिए आए एक व्यक्ति के सिर के नीचे उसी का कटा हुआ पैर रख तकिया बना दिया। दरअसल, एक स्कूल बस दुर्घटना में घायल इस व्यक्ति को इलाज के लिए इमरजंसी में भर्ती कराया गया था, जहां तैनात डॉक्टरों ने उसके कटा हुए बाएं पैर को उसके तकिये की तरह इस्तेमाल किया। हालांकि घटना के बाद दोषी डॉक्टरों सहित कई कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया। लेकिन इससे देश की चिकित्सा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। डॉक्टरों की संवेदनहीनता का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी मानवता को शर्मसार करने वाली ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। डॉक्टर और मरीज का रिश्ता बेहद खास होता है। लेकिन पिछले दो-ढाई दशक से डॉक्टर और मरीज का रिश्ता वैसा नहीं रह गया है, जैसा पहले हुआ करता था। आज के दौर में बहुत सारे डॉक्टरों का उनके फर्ज से भटकाव चिंता का विषय बनता जा रहा है। इसी साल जनवरी में मुंबई के नायर अस्पताल में बत्तीस साल के युवक की एमआरआइ मशीन में आकर दर्दनाक मौत हो गई थी। पिछले साल एक दिसंबर को दिल्ली के शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल के लापरवाह डॉक्टरों ने जिंदा बच्चे को मृत घोषित कर दिया था। दिल्ली से सटे गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में पैसों की भूख का एक और अमानवीय मामला सामने आया, जहां डेंगू से पीड़ित एक बच्ची के इलाज के लिए उसके माता-पिता को सोलह लाख रुपए का बिल थमा दिया गया, जबकि उस बच्ची की मौत हो गई थी। डॉक्टरों की लापरवाही का एक अन्य मामला मध्य प्रदेश में देखने को मिला, जहां एक गर्भवती महिला को सरकारी प्रसूति केंद्र में ताला लगे होने के कारण सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। कई घंटों तक सड़क पर पड़े रहने के कारण बच्चे की मौके पर ही मौत हो गई।


पिछले साल अगस्त में ऐसी ही निष्ठुरता का एक और बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में देखने को मिला, जहां जापानी बुखार से पीड़ित कई बच्चे ऑक्सीजन न मिलने के कारण वह काल के गाल में समा गए। राजस्थान के अलवर में मोतियाबिंद के ऑपरेशन में लापरवाही बरतने के कारण कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गई। छत्तीसगढ़ में गर्भाशय निकाल देने की घटना को शायद इतने सालों के बाद भी कोई भूल पाया हो। यह कुछ ऐसे मामले हैं जो मीडिया की वजह से लोगों के सामने आ गए और इनका संज्ञान लिया गया। पर डॉक्टरों की लापरवाही के ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते। कई बार लोग अपनी शिकायत लेकर कहीं जा सकने की स्थिति में नहीं होते, कइयों को पता नहीं होता कि क्या करना चाहिए। यह किसी एक राज्य या फिर एक अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है, जहां डॉक्टर और अस्पताल के कर्मचारियों की कर्मचारियों की लापरवाही मरीजों के लिए जानलेवा साबित होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब आए दिन इस तरह की शिकायतें मिलती रहती हैं, गंभीर मामले सामने आते रहते हैं तो फिर सरकार और उसका स्वास्थ्य महकमा आखिर करता क्या रहता है? कोई कदम क्यों नहीं उठाया जाता इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए? क्या हर बार की तरह अस्पताल का लाइसेंस रद्द करना या फिर लापरवाही बरतने वाले डॉक्टरों को निलंबित कर देना ही समस्या का समाधान है? ऐसे में मरीज को तो न्याय नहीं मिला। हाल ही में बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दुनिया की सबसे बड़े स्वास्थ्य सुरक्षा योजना- राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का एलान किया, जिसे ‘मोदी केयर' नाम दिया गया। इस योजना के तहत दस करोड़ गरीब परिवारों को अब हर साल पांच लाख रुपए तक का इलाज मुफ्त होगा। उन्होंने वित्त वर्ष 2018-19 के लिए आयुष्मान भारत कार्यक्रम के लिए बारह अरब रुपए का कोष आवंटित किया है। तपेदिक (टीबी) के रोगियों को पोषक पदार्थ मुहैया कराने के लिए छह सौ करोड़ रुपए आबंटित किए। इसके अलावा चौबीस नए मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की स्थापना और जिला स्तरीय अस्पतालों को भी उन्नत करने की बात कही। लेकिन इसमें दो राय नहीं है कि वर्तमान में भारत में चिकित्सा व्यवस्था का ढांचा जिस तरह से चरमरा गया है, उस पर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है।


हैरानी की बात यह है कि भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है, जहां स्वास्थ्य क्षेत्र पर सरकारी खर्च बेहद कम होता है। यहां कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र एक फीसद हिस्सा ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है जो निम्नतम है। विकसित राष्ट्रों में यह आंकड़ा लगभग दस गुना ज्यादा है। यहां तक कि चीन में भी स्वास्थ्य पर तीन फीसद से ज्यादा खर्च किया जाता है। इसलिए भारत में सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था हमेशा संसाधनों और कर्मियों की तंगी से जूझती रहती है। जननी सुरक्षा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाएं भी पर्याप्त आबंटन नहीं मिलने का दंश झेल रही हैं। लेकिन भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र एक और जिस बड़ी बीमारी से ग्रस्त है, वह है- लापरवाही और संवेदनहीनता। यह सरकारी अस्पतालों में तो है ही, निजी अस्पतालों में भी खूब देखने को मिलती है। हाल ही में हुई घटनाएं न सिर्फ सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था पर एक बड़ा तमाचा हैं, बल्कि यह देशभर के सरकारी-निजी अस्पतालों को आईना दिखाती हैं। वर्ष 2014-15 के स्वास्थ्य बजट में इक्यावन अरब रुपए की कटौती हुई। इस बार सांकेतिक बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन वर्तमान चुनौतियों से लड़ने में यह नाकाफी है। वर्ष 2018 तक कुष्ठ रोग, 2020 तक खसरा और 2025 तक टीबी से देश को मुक्ति दिलाने की घोषणा निश्चित रूप से उत्साहवर्धक है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक मूल्यांकन के अनुसार भारत को टीबी मुक्त होने में 2050 तक का समय लग सकता है। पिछले कुछ वर्षों में तमाम सुख-सुविधाओं से लैस कई बड़े आधुनिक अस्पताल खोले गए हैं। लेकिन महंगे इलाज के कारण इन अस्पतालों से आबादी के बड़े हिस्से को कोई लाभ नहीं मिल पाया है। नेशनल सेंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार अस्सी फीसद से ज्यादा आबादी के पास न तो कोई सरकारी स्वास्थ्य योजना है और न ही कोई निजी बीमा योजना।


गौरतलब है कि इन सब समस्याओं के पीछे कहीं न कहीं चिकित्सा शिक्षा भी प्रमुख कारक है। दरअसल, चिकित्सा शिक्षा वर्तमान में बेहद मंहगी हो गई है। एमबीबीएस करने में कम से कम साठ लाख और स्नातकोत्तर में एक से डेढ़ करोड़ का खर्चा आता है। कई लोग बैंक से कर्ज लेकर पढ़ते हैं और फिर बाद में उसे चुकाते हैं। वहीं दूसरी ओर, हमारे यहां सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की तनख्वाह मात्र चालीस से पचास हजार और निजी अस्पतालों में एक से सवा लाख रुपए है। ऐसे में देश में डॉक्टरों की कमी होना स्वाभाविक है। हर साल पचपन हजार के करीब डॉक्टर तैयार होते हैं, लेकिन आज भी देश में कम से कम पांच लाख डॉक्टरों की तत्काल जरूरत है। ये ऐसी समस्याएं हैं जो कहीं न कहीं डॉक्टरों और चिकित्साकर्मियों को संवेदनहीन बनाती हैं।