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सक्रिय अदालत के बेमिसाल फैसले-- कमलेश जैन

इस साल अदालतों की सक्रियता खूब दिखी। ऐसे कई फैसले आए, जो ऐतिहासिक साबित हुए। इन फैसलों से यह खासतौर से लगा कि न्यायालय महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाने और समाज में फैली असमानता को दूर करने को लेकर काफी गंभीर है। हालांकि उसकी यह गंभीरता पहले भी कई बार दिखी है। जैसे, शीर्ष अदालत ने ही बलात्कार के मामलों में पीड़िता को दोषी मानने वाले प्रावधान खत्म किए, जबकि पहले ऐसे मामलों में पीड़िता को सहभागी समझा जाता था और उनके लिए ‘एकम्पिल्श' शब्द का इस्तेमाल किया जाता था। मगर बाद में न सिर्फ इस शब्द को हटा दिया गया, बल्कि पीड़िता को ‘विक्टिम' माना गया। साफ है, औरतों की जिंदगी में बदलाव लाने वाले ऐसे कई फैसले सुप्रीम कोर्ट पहले भी सुनाता रहा है। इस साल भी दूरगामी फैसलों का सिलसिला जारी रहा।


भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को निरस्त करना एक ऐसा ही फैसला है। इस धारा के तहत पत्नी को पति की संपत्ति माना जाता था। इस कानून को रद्द करके सुप्रीम कोर्ट ने पत्नियों को पति की गुलामी से मुक्त कर दिया है। केरल के सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के दाखिल होने, पिता की पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हक देने, लड़कियों के खतना को असांविधानिक बताने, औरतों के रंग पर बेजा टिप्पणी को तलाक का आधार बनाने, एकल मां को बच्चे के पिता का नाम बताने की बाध्यता से मुक्त करने जैसे कई दूसरे फैसले भी महिलाओं को अधिकार-संपन्न बनाते दिखे। लेकिन गौर करने की बात यह है कि कानून तो बदलाव ले आता है, लेकिन समाज उस पर अमल करने में काफी वक्त लेता है। अब सबरीमाला मंदिर में ही अब तक कहां हर उम्र की महिलाएं प्रवेश कर पाई हैं? इसी तरह, एक साथ ‘तीन तलाक' के खिलाफ अदालती फैसले को भी मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग कुबूल नहीं कर पा रहा है।


इस साल शीर्ष अदालत ने कई ब्रिटिशकालीन कानूनों को भी रद्द किया। धारा 497 एक ऐसा कानून तो था ही, भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को निरस्त करना भी ऐतिहासिक फैसला था। धारा 377 को अदालत ने अतार्किक माना और एलजीबीटी समुदाय को आम नागरिकों की तरह मौलिक अधिकार मुहैया कराए। अब इसी तरह का काम हिंदू विवाह अधिनियम-1955 की धारा नौ पर भी होना चाहिए, जिसमें वैवाहिक संबंधों की वापसी की बात कही गई है। इसके तहत यदि पति या पत्नी किसी कारण से एक-दूसरे को छोड़कर चले जाते हैं, तो इस कानून के माध्यम से दोनों में से कोई जबर्दस्ती एक-दूसरे को अपने पास बुला सकता है। दिलचस्प है कि इस कानून को ब्रिटेन अपने यहां निरस्त कर चुका है, पर हम अब तक इसे ढो रहे हैं। ब्रिटिश अदालत में जब इस कानून को निरस्त करने का फैसला हो रहा था, तब तर्क ये दिए गए कि चूंकि ब्रिटिश महिलाएं अब काफी तरक्की कर चुकी हैं, इसलिए इस कानून की उन्हें कोई जरूरत नहीं। जाहिर है, भारत की महिलाओं के लिए भी अब यह कहने का वक्त आ गया है।


साल 2018 शीर्ष अदालत के चार जजों द्वारा ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस' किए जाने के कारण भी याद किया जाएगा। यह इस वर्ष की शुरुआती घटना थी, जब जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई (वर्तमान प्रधान न्यायाधीश), जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार आम जनता के सामने एक स्वर से कहा कि वे (तत्कालीन) प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के रोस्टर (बेंच बनाने के प्रक्रिया) से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण रवैया माना। इस प्रेसवार्ता में उच्चतम न्यायालय की कमियां सामने लाई गईं और यह इशारा किया गया कि देश की शीर्ष अदालत की कार्य-प्रणाली भी दोषपूर्ण है; यह संपूर्ण न्याय देने में अक्षम है, जिसका वादा हमारे संविधान की प्रस्तावना में है। जनता को यह कदम स्तब्ध कर गया। एकबारगी यह लगा कि सबको न्याय देने वाली न्यायपालिका में सब कुछ ठीक नहीं है। हालांकि बाद के कई फैसलों में उम्मीद की किरणें भी दिखीं। अब तो सांविधानिक महत्व के सभी मुकदमों के सीधा प्रसारण का फैसला भी किया जा चुका है, ताकि जनता की जानकारी बढे़। आधार कानून की धारा 57 को भी रद्द किया गया, जिसके मुताबिक निजी कंपनियां अब किसी का व्यक्तिगत डाटा साझा नहीं कर सकतीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसलों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद उपलब्ध कराने का फरमान सुनाना भी उल्लेखनीय है, क्योंकि यह फैसला उन तमाम फरियादियों के हित में है, जो अंग्रेजी ज्ञान में कमजोर होने की वजह से ‘ऑर्डर' को पूरी तरह समझ नहीं पाते। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़ा कानून ही लंबे अरसे के बाद साकार हो सका।


साल 2018 भारतीय न्यायपालिका को एक ऊंचे मुकाम पर ले गया है। ऐसी ही उम्मीदें 2019 से हैं। भरोसा है कि वंचित तबकों तक न्याय पहुंचाने में शीर्ष अदालत विशेष तौर से सक्रिय होगा। हालांकि इस एक सुझाव पर भी काम होना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट आदेश तो जारी करता है, पर उसके पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है कि वह उसे लागू करा सके। साफ है कि अदालत के पास ऐसी शक्ति होनी चाहिए कि न्यायसंगत कानून को वह एक तय समय-सीमा में लागू करवा सके।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)