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'सफेद सोना" बनता जा रहा है दूध - धर्मेंद्रपाल सिंह

भोपाल को-ऑपरेटिव मिल्क फेडरेशन ने सांची दूध के दाम दो रुपए प्रति लीटर बढ़ा दिए। इससे पहले मदर डेयरी और अमूल दूध के दाम बढ़ाए गए थे। चार महीने के भीतर दूध के दाम दूसरी बार बढ़े हैं। सबसे पहले गुजरात को-ऑपरेटिव दूध विपणन महासंघ ने अमूल दूध का भाव दो रुपए प्रति लीटर बढ़ाने की घोषणा की थी। देश की इस सबसे बड़ी को-ऑपरेटिव की देखा-देखी अन्य दूध उत्पादकों ने भी कीमतें बढ़ा दीं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में सब्जियों के बाद दूध का नंबर आता है, इस कारण महंगाई फिर भड़कने के आसार बन गए हैं।

पेट्रोल उत्पादों की मूल्य वृद्धि पर शोर मचाने वाले शायद दूध उत्पादों की मार से बेखबर है। दूध के दाम बढ़ने का अर्थ है मक्खन, घी, दही, लस्सी, खोया, पनीर, आइसक्रीम आदि की कीमत में भी आग लग जाना। इस आग से आम आदमी ही झुलसता है। यह तथ्य चौंकाता है कि पिछले आठ वर्ष में दूध की कीमत में लगभग 250 प्रतिशत वृद्धि हो चुकी है। मार्च 2006 में फुल क्रीम दूध का दाम प्रति लीटर 19 रुपए था, जो अब उछलकर 50 रुपए पर पहुंच चुका है। गत छह साल में अमूल ने 19 बार दाम बढ़ाए हैं। सन् 2010 से पहले कीमत एक रुपए लीटर के हिसाब से बढ़ाई जाती थी, लेकिन उसके बाद से हर बार जनता को दो रुपए लीटर का झटका दिया गया है। दूध उत्पादकों की इस मनमानी से आम आदमी में गहरा गुस्सा है। गुजरात और महाराष्ट्र में तो ताजा मूल्य वृद्धि के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए।

हर बार पशुओं का चारा महंगा हो जाने, परिवहन, ऊर्जा और मजदूरी बढ़ जाने की आड़ में दूध की कीमत में इजाफा किया जाता है। मूल्य वृद्धि की पहल ज्यादातर संगठित क्षेत्र से होती है। आज देश में दूध व्यापार में संगठित क्षेत्र (को-ऑपरेटिव व निजी डेयरी) की हिस्सेदारी 30 फीसद है। 70 फीसद कारोबार अभी भी छोटे-छोटे दूधियों और दुकानदारों के हाथ में है, जो स्थानीय मांग-आपूर्ति के हिसाब से दाम तय करते हैं। महानगरों और बड़े शहरों के दूध बाजार पर अमूल और मदर डेयरी का दबदबा रहा है और वे ही वहां दूध की कीमत तय करते हैं। मसलन दिल्ली में हर दिन 65 लाख टन दूध की खपत होती है। इसमें 26 लाख टन सप्लाई अमूल की है और 30 लाख टन मदर डेयरी की। अगर ये दोनों दाम बढ़ा दें तो अन्य सप्लायर स्वत: उसका अनुसरण करते हैं।

इस कारोबार से जुड़े बड़े खिलाड़ियों के मुनाफे पर नजर डालने से पता चलता है कि आज दूध का धंधा सोने-चांदी के कारोबार को टक्कर दे रहा है। हर साल दूध की कीमत में अमूमन 18 से 23 फीसद का इजाफा हो जाता है। अन्य खाद्य पदार्थों (सब्जी, फल, मांस, अनाज) के दाम तो ऊपर-नीचे होते हैं, लेकिन दूध की बढ़ी कीमत नीचे नहीं आती। दूध उत्पादकों की पोल खोलने के लिए एक ही उदाहरण काफी है। जनवरी-फरवरी 2012 में अमूल और मदर डेयरी जैसे बड़े खिलाड़ी अपने खरीद केंद्रों पर किसानों और छोटे दूध विक्रेताओं को 27-28 रुपए प्रति लीटर कीमत चुका रहे थे। एक साल बाद 2013 में दूध का दाम छह रुपए लीटर तक गिर गया। तब खरीद केंद्र पर दूध विक्रेताओं को एक लीटर के लिए महज 21-22 रुपए ही मिलते थे। इतनी भारी गिरावट के बावजूद बाजार में दूध की कीमत कम नहीं की गई। बड़ी को-ऑपरेटिव डेयरी व निजी उत्पादक एक लीटर दूध पर औसत 5-6 रुपए का मुनाफा कमाते हैं, जो 2013 में बढ़कर 9-10 रुपए लीटर तक पहुंच गया। जब खर्च बढ़ जाने के नाम पर वे कीमत बढ़ाते हैं तो दूध का क्रय मूल्य घटने पर उन्होंने दाम कम क्यों नहीं किए?

यह सच है कि गर्मी में दुधारू जानवरों के चारे की किल्लत हो जाती है। इस कारण कीमत बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन बरसात और ठंड के मौसम में यह दिक्कत नहीं रहती। दूध भी खूब मिलता है। ऐसे में दाम कम होने चाहिए। अब गंगा उल्टी बहती है। बड़े उत्पादक कई बार जाड़े के मौसम में भी दाम बढ़ा देते हैं।

आज संगठित क्षेत्र का 55 प्रतिशत कारोबार निजी डेयरी मालिकों के हाथ में है और उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। अंधा मुनाफा कमाने की होड़ में को-ऑपरेटिव डेयरी भी पीछे नहीं हैं। दूध के कारोबार की निगरानी और नियंत्रण के लिए कोई मशीनरी नहीं है। सब कुछ सप्लायर्स की मेहरबानी पर मुनस्सर है, इसीलिए उपभोक्ता निस्सहाय हैं।

फिलहाल हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक और उपभोक्ता देश है। पिछले 25 बरस में देश में दूध उत्पादन लगभग तीन गुना बढ़ गया है। प्रति व्यक्ति खपत में भी खासी बढ़ोतरी हुई है। सन् 1991-92 में हमारा दूध उत्पादन 5.56 करोड़ टन तथा प्रतिदिन प्रति व्यक्ति खपत 178 ग्राम थी। 2014 में उत्पादन बढ़कर 14 करोड़ टन और खपत 291 ग्राम हो गई। विश्व में दूध की औसत खपत 285 ग्राम प्रति व्यक्ति है। भारत में करीब 20 करोड़ दुधारू जानवर हैं, लेकिन अमेरिका की गायें हमारी गायों के मुकाबले सात गुना ज्यादा दूध देती हैं।

मध्य वर्ग के विस्तार से देश में दूध की मांग में तेजी से इजाफा हुआ है। दूध प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, लेकिन अब यह गरीब तबके की पहुंच से दूर हो चुका है। जिस गति से दाम छलांग लगा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि शीघ्र ही मध्य वर्ग के लिए भी यह महंगा शौक बन जाएगा। देश में एक से पांच वर्ष के 55 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। उनके लिए तो दूध ही दवा है।

ऑपरेशन फ्लड के दौरान नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की भूमिका को रेखांकित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य को-ऑपरेटिव आंदोलन को बढ़ावा देना है। आज दूध के कारोबार में निजी क्षेत्र की भागीदारी बहुत बढ़ी है। सरकार दूध निर्यात पर सबसिडी देती है। अब एनडीडीबी को अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करना चाहिए। निजी डेयरी क्षेत्र को वित्तीय सहायता देने, दुधारू जानवरों की नस्ल सुधारने, चारे व कोल्ड स्टोर की व्यवस्था करने के लिए उसे कदम उठाने चाहिए। दूध में मिलावट के धंधे पर रोक लगाने व मूल्य नियंत्रण की निगरानी के लिए भी कारगर पहल जरूरी है

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं)

भोपाल को-ऑपरेटिव मिल्क फेडरेशन ने सांची दूध के दाम दो रुपए प्रति लीटर बढ़ा दिए। इससे पहले मदर डेयरी और अमूल दूध के दाम बढ़ाए गए थे। चार महीने के भीतर दूध के दाम दूसरी बार बढ़े हैं। सबसे पहले गुजरात को-ऑपरेटिव दूध विपणन महासंघ ने अमूल दूध का भाव दो रुपए प्रति लीटर बढ़ाने की घोषणा की थी। देश की इस सबसे बड़ी को-ऑपरेटिव की देखा-देखी अन्य दूध उत्पादकों ने भी कीमतें बढ़ा दीं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में सब्जियों के बाद दूध का नंबर आता है, इस कारण महंगाई फिर भड़कने के आसार बन गए हैं।

पेट्रोल उत्पादों की मूल्य वृद्धि पर शोर मचाने वाले शायद दूध उत्पादों की मार से बेखबर है। दूध के दाम बढ़ने का अर्थ है मक्खन, घी, दही, लस्सी, खोया, पनीर, आइसक्रीम आदि की कीमत में भी आग लग जाना। इस आग से आम आदमी ही झुलसता है। यह तथ्य चौंकाता है कि पिछले आठ वर्ष में दूध की कीमत में लगभग 250 प्रतिशत वृद्धि हो चुकी है। मार्च 2006 में फुल क्रीम दूध का दाम प्रति लीटर 19 रुपए था, जो अब उछलकर 50 रुपए पर पहुंच चुका है। गत छह साल में अमूल ने 19 बार दाम बढ़ाए हैं। सन् 2010 से पहले कीमत एक रुपए लीटर के हिसाब से बढ़ाई जाती थी, लेकिन उसके बाद से हर बार जनता को दो रुपए लीटर का झटका दिया गया है। दूध उत्पादकों की इस मनमानी से आम आदमी में गहरा गुस्सा है। गुजरात और महाराष्ट्र में तो ताजा मूल्य वृद्धि के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए।

हर बार पशुओं का चारा महंगा हो जाने, परिवहन, ऊर्जा और मजदूरी बढ़ जाने की आड़ में दूध की कीमत में इजाफा किया जाता है। मूल्य वृद्धि की पहल ज्यादातर संगठित क्षेत्र से होती है। आज देश में दूध व्यापार में संगठित क्षेत्र (को-ऑपरेटिव व निजी डेयरी) की हिस्सेदारी 30 फीसद है। 70 फीसद कारोबार अभी भी छोटे-छोटे दूधियों और दुकानदारों के हाथ में है, जो स्थानीय मांग-आपूर्ति के हिसाब से दाम तय करते हैं। महानगरों और बड़े शहरों के दूध बाजार पर अमूल और मदर डेयरी का दबदबा रहा है और वे ही वहां दूध की कीमत तय करते हैं। मसलन दिल्ली में हर दिन 65 लाख टन दूध की खपत होती है। इसमें 26 लाख टन सप्लाई अमूल की है और 30 लाख टन मदर डेयरी की। अगर ये दोनों दाम बढ़ा दें तो अन्य सप्लायर स्वत: उसका अनुसरण करते हैं।

इस कारोबार से जुड़े बड़े खिलाड़ियों के मुनाफे पर नजर डालने से पता चलता है कि आज दूध का धंधा सोने-चांदी के कारोबार को टक्कर दे रहा है। हर साल दूध की कीमत में अमूमन 18 से 23 फीसद का इजाफा हो जाता है। अन्य खाद्य पदार्थों (सब्जी, फल, मांस, अनाज) के दाम तो ऊपर-नीचे होते हैं, लेकिन दूध की बढ़ी कीमत नीचे नहीं आती। दूध उत्पादकों की पोल खोलने के लिए एक ही उदाहरण काफी है। जनवरी-फरवरी 2012 में अमूल और मदर डेयरी जैसे बड़े खिलाड़ी अपने खरीद केंद्रों पर किसानों और छोटे दूध विक्रेताओं को 27-28 रुपए प्रति लीटर कीमत चुका रहे थे। एक साल बाद 2013 में दूध का दाम छह रुपए लीटर तक गिर गया। तब खरीद केंद्र पर दूध विक्रेताओं को एक लीटर के लिए महज 21-22 रुपए ही मिलते थे। इतनी भारी गिरावट के बावजूद बाजार में दूध की कीमत कम नहीं की गई। बड़ी को-ऑपरेटिव डेयरी व निजी उत्पादक एक लीटर दूध पर औसत 5-6 रुपए का मुनाफा कमाते हैं, जो 2013 में बढ़कर 9-10 रुपए लीटर तक पहुंच गया। जब खर्च बढ़ जाने के नाम पर वे कीमत बढ़ाते हैं तो दूध का क्रय मूल्य घटने पर उन्होंने दाम कम क्यों नहीं किए?

यह सच है कि गर्मी में दुधारू जानवरों के चारे की किल्लत हो जाती है। इस कारण कीमत बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन बरसात और ठंड के मौसम में यह दिक्कत नहीं रहती। दूध भी खूब मिलता है। ऐसे में दाम कम होने चाहिए। अब गंगा उल्टी बहती है। बड़े उत्पादक कई बार जाड़े के मौसम में भी दाम बढ़ा देते हैं।

आज संगठित क्षेत्र का 55 प्रतिशत कारोबार निजी डेयरी मालिकों के हाथ में है और उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। अंधा मुनाफा कमाने की होड़ में को-ऑपरेटिव डेयरी भी पीछे नहीं हैं। दूध के कारोबार की निगरानी और नियंत्रण के लिए कोई मशीनरी नहीं है। सब कुछ सप्लायर्स की मेहरबानी पर मुनस्सर है, इसीलिए उपभोक्ता निस्सहाय हैं।

फिलहाल हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक और उपभोक्ता देश है। पिछले 25 बरस में देश में दूध उत्पादन लगभग तीन गुना बढ़ गया है। प्रति व्यक्ति खपत में भी खासी बढ़ोतरी हुई है। सन् 1991-92 में हमारा दूध उत्पादन 5.56 करोड़ टन तथा प्रतिदिन प्रति व्यक्ति खपत 178 ग्राम थी। 2014 में उत्पादन बढ़कर 14 करोड़ टन और खपत 291 ग्राम हो गई। विश्व में दूध की औसत खपत 285 ग्राम प्रति व्यक्ति है। भारत में करीब 20 करोड़ दुधारू जानवर हैं, लेकिन अमेरिका की गायें हमारी गायों के मुकाबले सात गुना ज्यादा दूध देती हैं।

मध्य वर्ग के विस्तार से देश में दूध की मांग में तेजी से इजाफा हुआ है। दूध प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, लेकिन अब यह गरीब तबके की पहुंच से दूर हो चुका है। जिस गति से दाम छलांग लगा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि शीघ्र ही मध्य वर्ग के लिए भी यह महंगा शौक बन जाएगा। देश में एक से पांच वर्ष के 55 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। उनके लिए तो दूध ही दवा है।

ऑपरेशन फ्लड के दौरान नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) की भूमिका को रेखांकित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य को-ऑपरेटिव आंदोलन को बढ़ावा देना है। आज दूध के कारोबार में निजी क्षेत्र की भागीदारी बहुत बढ़ी है। सरकार दूध निर्यात पर सबसिडी देती है। अब एनडीडीबी को अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करना चाहिए। निजी डेयरी क्षेत्र को वित्तीय सहायता देने, दुधारू जानवरों की नस्ल सुधारने, चारे व कोल्ड स्टोर की व्यवस्था करने के लिए उसे कदम उठाने चाहिए। दूध में मिलावट के धंधे पर रोक लगाने व मूल्य नियंत्रण की निगरानी के लिए भी कारगर पहल जरूरी है

(लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं)

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