Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 73
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 74
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
Notice (8): Undefined variable: urlPrefix [APP/Template/Layout/printlayout.ctp, line 8]news-clippings/समस्या-की-अनदेखी-करते-समाधान-हिमांशु-13084.html"/> न्यूज क्लिपिंग्स् | समस्या की अनदेखी करते समाधान-- हिमांशु | Im4change.org
Resource centre on India's rural distress
 
 

समस्या की अनदेखी करते समाधान-- हिमांशु

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत ने कृषि संकट को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। इस चुनावी जीत के निश्चय ही कई कारक थे, लेकिन खेतिहरों की दुश्वारियां इन सबमें प्रमुख थीं। यह माना जाता है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी कृषि संकट को लेकर उदासीन रही है, बल्कि कुछ हद तक उसने इसे बढ़ाया ही है, लेकिन वास्तव में इस संकट का कोई आसान उपाय दिखता भी नहीं। यहां तक कि जीत हासिल करने वाली कांग्रेस ने भी किसानों का भरोसा जीतने के लिए कर्जमाफी के पुराने फॉर्मूले और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी जैसे वादों पर भरोसा किया।

ये दोनों नुस्खे पुराने हैं और हर पार्टी द्वारा आजमाए जा चुके हैं। यहां तक कि भाजपा भी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों और अन्य जगहों पर यह दांव खेल चुकी है। मगर क्या सिर्फ कर्जमाफी और एमएसपी में वृद्धि कृषि संकट पर निर्णायक चोट कर सकती है? और क्या केवल इन्हीं के बूते दीर्घकालिक समाधान संभव है? बिल्कुल नहीं। ये न सिर्फ आधे-अधूरे कदम हैं और असल समस्याओं के समाधान नहीं सुझाते, बल्कि हताशा का एक माहौल भी बनाते हैं, जो कृषि के पुनर्जीवन की संभावनाओं के खिलाफ है। इन सबसे संस्थागत बकायेदारों और बड़ी जोत के किसानों को बेजा फायदा मिलता है, और राज्यों एवं केंद्र के वित्तीय संसाधन काफी ज्यादा खर्च हो जाते हैं। कृषि में निवेश में कमी तो आती ही है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में भी कृषि निवेश घट रहा है, और ऐसा उन तमाम राज्यों में भी हो रहा है, जहां की सरकारों ने किसानों को कृषि-कर्ज चुकाने से राहत दी है।

ये कदम हमें उन मूल मुद्दों से भी भटकाते हैं, जो कृषि-संकट के कारण हैं। कर्ज का जाल असल में इस बात का संकेत है कि कृषि आय में भयंकर गिरावट आई है। किसानों की आमदनी इसलिए कम हुई है, क्योंकि बढ़ी लागत के अनुपात में उन्हें फसल के दाम नहीं मिल रहे। ऐसा सिर्फ खाद्यान्न फसलों में नहीं, गैर-खाद्यान्न उपज के साथ भी हो रहा है। पिछले चार वर्षों में कृषि को लेकर व्यापार-शर्तों में जो तब्दीली की गई, उसने हाल के वर्षों में स्थिति बिगाड़ी ही है। हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि पिछले पांच महीनों से थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) में कुल खाद्य मुद्रास्फीति नकारात्मक बनी हुई है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़ों से कीमतों में गिरावट जैसे सवालों की गंभीरता कम हो जाती है, क्योंकि किसानों के लिए फसल की कीमतें मायने रखती हैं, जो कि थोक मूल्यों से भी कम हैं।

बुनियादी सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई प्रवृत्ति दिखाई न देने के बावजूद आखिर कृषि मूल्य क्यों गिर रहे हैं? तर्क दिए जा रहे हैं कि हद से अधिक उत्पादन के कारण कीमतें गिरती हैं। मगर यह इतना सरल नहीं है, और उस देश के लिए तो बिल्कुल ही निंदनीय है, जहां भुखमरी और कुपोषण अब भी सुर्खियों में रहते हैं। बेशक इसके लिए अनावश्यक आयात, बाजार पर प्रतिबंध और कुछ उत्पादों की हद से अधिक आपूर्ति जैसे कई कारक भी जिम्मेदार हैं, लेकिन यह अर्थव्यवस्था, खासतौर से ग्रामीण आर्थिकी में मांग में आई गंभीर गिरावट का नतीजा भी है।

कृषि उत्पादों की कम कीमतों का एक कड़वा सच वह राजनीतिक अर्थशास्त्र भी है, जो अन्य तमाम उत्पादों की कीमतों के कम बढ़ने पर जोर देती है। और ऐसा खाद्य कीमतों को कम करके हासिल किया जाता है, क्योंकि इसे महंगाई बढ़ने का एक प्रमुख कारण माना जाता है। हालांकि तथ्य यही है कि खाद्य मुद्रास्फीति और मूल महंगाई दर के बीच कोई रिश्ता नहीं होता। यह हाल के महीनों में दिखा भी है, जब दोनों की राह अलग-अलग थी।

फिर भी, कम खाद्य महंगाई दर और इस वजह से समग्र मुद्रास्फीति एक ऐसा मसला है, जिस पर रेटिंग एजेंसियों और विदेशी संस्थागत निवेशकों का जोर रहता है, क्योंकि विकासशील मुल्कों में वे अपनी संपत्तियों के वास्तविक मूल्य बनाए रखने की कोशिशों में लगे रहते हैं। इसमें यदि थोड़ा सा भी भटकाव होता है, तो उसका नतीजा रेटिंग के कम होने और राजकोषीय घाटे के डर के रूप में दिखता है।

लेकिन इन सबसे किसानों की कमर जरूर टूटती है, और ऐसा मध्य वर्ग और वित्तीय संस्थानों को सब्सिडी देकर किया जाता है। कृषि में कम कीमत की समस्या एक व्यापक राजनीतिक-आर्थिक ढांचे का हिस्सा है, जो कृषि को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखता है, जिसका सौदा किया जा सके। यह महंगाई कम करने वाली नीतियों का ही एक हिस्सा है, जिसे 1990 के दशक के बाद से तमाम सरकारें अमल में लाती रही हैं। इस तरह की नीतियों से सरकारी खर्च में भी कमी आती है, जिसके कारण सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में औसत वृद्धि से बेहतर होने के बावजूद देश रोजगार संकट से जूझता है।

जाहिर है, ग्रामीण क्षेत्र गहरे संकट में है, जहां मांग अपने सबसे निचले स्तर पर है। वास्तविक मजदूरी में भी गिरावट जारी है। बढ़ती लागत और फसलों की कम कीमत के कारण किसानों की आमदनी घटी है। नोटबंदी और जीएसटी ने भी कामगारों को नौकरी देने और मांग पैदा करने की असंगठित क्षेत्र की क्षमता को प्रभावित किया है। नतीजतन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक आभासी गतिरोध पैदा हो गया है। और यह सब तब हुआ है, जब कृषि उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर है और विकास दर बढ़ रही है। इसका अर्थ यही है कि समस्या मूल रूप से आर्थिक विकास के उस मॉडल में है, जिस पर देश चल रहा है। साफ है, जब तक सरकारों को इसका एहसास नहीं होगा कि मौजूदा संकट दोषपूर्ण राजनीतिक-आर्थिक ढांचे का ही नतीजा है, तब तक कृषि संकट के दूर होने की कोई संभावना नहीं है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)