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समाज और कानून की नजर में समर्पण की कीमत बस इतनी-सी?

जो महिलाएं दफ्तरों में काम करती हैं या बिजनेस संभालती हैं, उनकी सेवाओं की कीमत कमाई के आंकड़े से आंकी जा सकती है, लेकिन एक गृहिणी की सेवाओं और परिवार के प्रति समर्पण भाव की कीमत कैसे आंकी जाए? ऐसे ही एक मामले में चेन्नई के दुर्घटना दावा प्राधिकरण की संकीर्ण सोच सामने आई है।

मामला है 31 वर्षीय सेल्‍वी का, जो कपड़े बेचकर पांच हजार रुपए प्रतिमाह कमाती थीं। एक सड़क दुर्घटना में 23 अप्रैल 2004 को उनकी मौत हो गई थी। इस मामले में उनके पति, मां और उस वक्‍त उनकी पांच वर्षीय बेटी ने दुर्घटना दावा प्राधिकरण का दरवाजा खटखटाया था।

सेल्‍वी की स्‍वतंत्र आय साबित करने का कोई दस्‍तावेज नहीं था। इस कारण प्राधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने उनकी वार्षिक आय 15,000 रुपए प्रति वर्ष मानी, यानी 1250 रुपए महीना। इस तरह प्राधिकऱण ने मृतका के परिवार को महज 1.62 लाख रुपए का मुआवजा दिया। प्राधिकरण के इस फैसले की खूब आलोचना हुई। खासतौर पर महिला संगठनों ने एक गृहिणी की कमाई और समर्पण को कम आंकने के लिए प्राधिकऱण की खिंचाई की।

मृतका के परिवार ने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने ट्रिब्‍यूनल के संकीर्ण नजरिये पर टिप्‍पणी करते हुए इस क्षतिपूर्ति को बढ़ाकर 6.76 लाख रुपए कर दिया। जस्टिस एस. विमला ने कहा कि पीड़िता की पांच वर्षीय बच्‍ची को अपनी मां की गोद की कमी महसूस हो रही होगी। एक महिला की प्राथमिक जिम्‍मेदारी घर को खुशहाल, स्‍वस्‍थ और संपन्‍न रखने की होती है।

न्‍यायाधीश ने कहा कि घर को परिवार का केंद्र बनाने के लिए और परिवार के सदस्‍यों को पूरी आजादी व आराम देना महत्‍वपूर्ण काम है, जो महिला खुशी से स्‍वीकार करती है और आनंदपूर्णक उसे पूरा करती है। यह कार्य स्‍वेच्‍छापूर्वक किया जाता है, ऐसे में कई बार इसे नजरअंदाज कर दिया जाता है, भुला दिया जाता है या इस काम का अवमूल्‍यन कर दिया जाता है।


जस्टिस विमला ने कहा कि पत्‍नी की सेवाओं को ट्रिब्‍यूनल ने ध्‍यान नहीं दिया। उन्‍होंने इस मामले में 6.76 लाख रुपए क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया और अधिकारियों को कहा कि यह राशि तीन हफ्तों में जमा कराई जाए।

रोजगार/वेतनमान में भेदभाव की शिकार हैं महिलाएं

भारत सरकार के सर्वेक्षण कार्यालय की तरफ से समय-समय पर देश के विभिन्न हिस्सों में सैम्पल सर्वेक्षण किए जाते हैं जिसके आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति का आकलन किया जाता है।

ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि महिलाएं रोजगार तथा वेतनमान में भेदभाव की शिकार हैं।

श्रम बाजार में महिलाओं को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में कम दर पर पारिश्रामिक मिलता है।

शहरों में पुरुषों की औसत प्रतिदिन की आय 365 रूपए तथा महिलाओं की आय 232 रूपए है तथा गांवों में पुरूषों की 249 रूपए तथा महिलाओं की आय 156 रूपए है।

अनियमित कामगारों की मजदूरी में भी अंतर है। पुरुषों को 102 रुपए और महिलाओं को 69 रुपए मिलते हैं।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत मिलने वाले रोजगारों में भी अंतर है।

आईटी उद्योग में महिलाओं का वेतन कम

देश में आईटी उद्योग में भी महिलाओं को मिलने वाले वेतन-भत्तों में बड़ी असमानता है। महिला कर्मियों को अपने पुरुष समकक्षों के मुकाबले कम वेतन मिलता है। इस वर्ष जुलाई में जारी मान्स्टर.काम की एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है।

मान्स्टर सैलरी इंडेक्स आईटी सेक्टर रिपोर्ट, 2014 के अनुसार देश में आईटी क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को जो वेतन मिलता है, वह उनके पुरुष समकक्षों को मिलने वाले मेहनताने के मुकाबले 29 प्रतिशत कम है।

एक पुरूष आईटी कर्मचारी का कुल वेतन 359.25 रुपए प्रति घंटा है जबकि महिलाओं को 254.04 रुपये प्रति घंटा मिलता है। यह अंतर संभवत: इस तथ्य के कारण है कि महिलाओं की तुलना में निगरानी वाले पदों पर पुरुषों की पदोन्निति ज्यादा होती है। केवल 36 प्रतिशत महिला कर्मचारियों को पदोन्नित देकर निरीक्षक के पद पर लाया जाता है जबकि पुरुषों के मामले में यह 52 प्रतिशत है।


देश में कामकाजी महिलाओं की स्थिति

रजिस्ट्रार जनरल तथा सेंसस कमीश्नर आफ इंडिया द्वारा बीते वर्ष जारी किए आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी दिल्ली में महिलाओं की आबादी की तुलना में कामकाजी महिलाओं की तादाद महज 10.6 फीसद है। वहीं कामकाजी पुरूषों का आंकड़ा 53.1 फीसद है। अन्य शहरों में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। इस मामले में बेंगलुरू सबसे आगे है जहां कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत 24.3 फीसद है, चेन्नई में 19.4 फीसद है तो मुंबई में 18.8 फीसद तथा कोलकाता में 17.9 फीसद है।


महिलाएं बनाम प्रत्यक्ष श्रमशक्ति

वर्तमान में हमारे समाज में महिलाओं को अप्रत्यक्ष श्रमशक्ति की श्रेणी में रखा गया है। नारी शक्ति के लिए आवाज उठाने वाले मांग करते हैं कि महिलाओं को प्रत्यक्ष श्रमशक्ति का हिस्सा माना जाए। प्रत्यक्ष श्रमशक्ति से तात्पर्य है सीधे काम के बदले मेहनताना मिले। घर के अंदर का श्रम तथा ग्रामीण इलाके में खेतीबाड़ी का काम या अन्य छोटे मोटे ऐसे काम जो सीधो बाजार के दायरे में नहीं आते हैं, उनका बड़ा हिस्सा महिलाओं के हिस्से में ही आता है।

अमेरिका में भी चल रहा ऐसा ही संघर्ष

अमेरकी सीनेट ने महिला और पुरूष कर्मचारियों की आय के बीच के अंतर को कम करने के उद्देश्य से डेमोक्रेटिक पार्टी समर्थित विधेयक को पारित नहीं होने दिया। यह घटनाक्रम इस साल अप्रैल का है। रिपब्लिकन पार्टी के 42 और एक निर्दलीय सीनेटर ने विधेयक के विरोध में और डेमोक्रेटिक पार्टी के 53 सीनेटरों ने समर्थन में मत दिए लेकिन सीनेट में बहुमत प्राप्त दल के नेता हैरी रीड ने विधेयक पर अपने अधिकार सुरक्षित रख लिए।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा पेश जनगणना के आंकडों में दिखाया गया है कि वहां पूर्णकालिक महिला कर्मचारी डॉलर में आय अर्जित करने वाले प्रत्येक पुरूष कर्मचारी की तुलना में प्रतिदिन 77 सेंट आय अर्जित करती हैं।


-16 करोड़ महिलाएं हैं देश में 15-59 आयुवर्ग की, जो सिर्फ घरेलू कार्य करती हैं, और बेरोजगारों की श्रेणी में आती हैं

-20 करोड़ महिलाएं ऐसी हैं जो घर-दफ्तर, दोनों मोर्चे पर काम करती हैं।