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समाज सेवा के नाम पर-- मोनिका शर्मा

हाल ही में केंद्र सरकार ने देश में चल रहे तैंतीस हजार गैर-सरकारी संगठनों में से करीब बीस हजार संगठनों के लाइसेंस रद््द कर दिए हैं। सरकार ने यह कार्रवाई तब की, जब पाया गया कि ये एनजीओ विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन कर रहे हैं। यानीजिन एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस रद््द किया गया है, वे अब विदेशी चंदा नहीं ले सकेंगे। इस कार्रवाई के बाद अब देश में सिर्फतेरह हजार एनजीओ कानूनी तौर पर मान्य हैं। गौरतलब है कि एनजीओ के कामकाज की समीक्षा की कवायद करीब एक साल पहले शुरू हुई थी। इसी प्रक्रिया के तहत यह कदम उठाया गया है और सरकार द्वारा विदेशी चंदा नियमन कानून का पालन नहीं करने के कारण कुछ एनजीओ पर ये बंदिशें लगाई हैं। सरकार ही नहीं, आमजन के मन में भी गैरसरकारी संगठनों के कामकाज और उनके पास आ रहे धन के इस्तेमाल को लेकर हमेशा से ही सवाल रहे हैं। साल भर पहले जब ऐसे संगठनों की जवाबदेही को लेकर गंभीरता से कदम उठाने की बात की गई तो विरोध के स्वर भी तेज हुए। लेकिन यह एक बड़ा सवाल है कि देश में सुधार, बदलाव और जन-कल्याण के नाम पर मोटी धनराशि जुटाने वाले गैर-सरकारी संगठनों की रीति-नीति की समीक्षा करना गलत क्यों माना जाए? प्रश्न तो यह भी है कि करोड़ों-अरबों रुपए का अनुदान पाने वाले गैर-सरकारी संगठन अब तक बदलाव के नाम पर क्या और कितना बदल पाए हैं?


सरकार का दावा है कि जिन बीस हजार गैर-सरकारी संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस रद्द किए गए हैं उनके कामकाज में कई तरह की गड़बड़ियां पाई गई हैं। यों भी यह किसी से छिपा नहीं कि ऐसे संगठनों में अनियमितताएं होना आम बात हो चली है। इतना ही नहीं, ऐसे संगठनों के खिलाफ कई बार आमजन की ओर से भी शिकायतें दर्ज होती हैं। खासतौर पर विदेशी धन पाने वाले या विदेशी एनजीओ की कार्यप्रणाली लंबे समय से संदेह के घेरे में है। वैसे भारत में सक्रिय अधिकांश एनजीओ को देश की सरकार से ही आर्थिक मदद मिलती है। लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे भी गैर-सरकारी संगठन हैं जो अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड, नीदरलैंड, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड और डेनमार्क जैसे देशों से आर्थिक मदद पाते हैं। आर्थिक सहायता के रूप में दूसरे देशों से मिलने वाली यह धनराशि मोटी रकम होती है। नतीजतन, यह समाज-सेवा के नाम पर खुद को समृद्ध बनाने वाला कारोबार बन गया है। निस्संदेह इसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठना लाजिमी है।


गौरतलब है कि विदेशी चंदा नियमन कानून के तहत, कोई एनजीओ पूर्व-अनुमति श्रेणी के तहत केवल दो बार विदेश से चंदा प्राप्त कर सकता है लेकिन नियम का कड़ाई से क्रियान्वयन न होने की वजह से अब तक इसका दुरुपयोग होता रहा है। अंतरराष्ट्रीय संगठन इंटरनेशनल चैरिटीज एड फाउंडेशन ने कुछ साल पहले खुलासा किया था कि भारत में करीब बारह लाख एनजीओ हैं, जिनमें सत्ताईस लाख लोग काम करते हैं और इस ‘उद्योग' में हर साल दो सौ अरब से ज्यादा रुपए कमाए जाते हैं। निश्चित रूप से हालिया सालों में गैर-सरकारी संगठनों की संख्या और ये अनियमितताएं, दोनों बढ़ी हैं। यही वजह है कि गृह मंत्रालय अब इस पर कड़ी निगरानी रख रहा है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई भी एनजीओ की बढ़ती संख्या की जांच कर रही है। अब न केवल एनजीओ के श्रेणीकरण से लाइसेंस की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने की कोशिश की जा रही है बल्कि ऐसी संस्थाओं के लाइसेंस के नवीनीकरण से पहले उनकी जांच भी हो रही है। यों भी भारत में एनजीओ पंजीकरण के मानक बहुत पुराने हो चुके हैं।


यह अफसोसनाक है कि ऐसे संगठनों का उद््देश्य मोटी धनराशि जुटा कर उसे मनचाहे ढंग से काम में लेना है। जिस देश की जनता के हालात के नाम पर यह धन जुटाया जाता है, वहां की सरकार और समाज द्वारा किए गए सवालों का जवाब देना भी ऐसे संगठन अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। ‘क्रेडिबिलिटी अलायंस' जो कि एनजीओ के साथ मिल कर पैसों की जिम्मेदारी पर काम करती है, के अनुसार जब अच्छे प्रशासन और वित्तीय जिम्मेदारी के मानकों के बारे में गैर-सरकारी संगठनों से बात की गई तो अलायंस के शुरू होने के बाद सदस्यता लेने वाले चार सौ संगठनों में से ढाई सौ संगठनों ने अपने नाम वापस ले लिये। यानी अधिकतर एनजीओ जवाबदेही से बचने की कोशिश करते हैं। यह सच है कि एनजीओ यानी गैर-सरकारी संगठन सामाजिक न्याय, विकास और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले समूह के रूप में पहचाने जाते हैं। लेकिन गैर-सरकारी संगठन अब तक बदलाव के नाम पर क्या कर पाए हैं? एनजीओ को जनता की बुनियादी समस्याओं को जानने-समझने का महत्त्वपूर्ण जरिया माना जाता रहा है। उन्हें सरकार की सेवाओं और योजनाओं की जानकारी और मदद दोनों ही आमजन तक पहुंचाने की सार्थक कड़ी समझा गया है। हमारे यहां तिरपन प्रतिशत एनजीओ ग्रामीण क्षेत्रों में, सत्रह प्रतिशत मानव संसाधन विकास, दस फीसद सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण और दस प्रतिशत अन्य क्षेत्रों में कार्यरत हैं। देश में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के विकास तथा कुरीतियों से लड़ने में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका अर्थपूर्ण भी रही है, पर यह भागीदारी उस स्तर की नहीं है जिस स्तर पर ये एनजीओ धन जुटाने का काम करते हैं। यही कारण है कि धरातल पर बदलाव लाने की बात करने वाले गैर-सरकारी संगठनों की कार्यप्रणाली अब सवालों के घेरे में है।


पिछले दो दशक में हमारे देश में एनजीओ की संख्या तेजी से बढ़ी है। एक आंकड़े के अनुसार, देश में बीस लाख से अधिक एनजीओ सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट आदि में पंजीकृत हैं। इनमें सक्रिय रूप से काम करने वाले संगठनों की संख्या, पंजीकृत संख्या के मुकाबले काफी कम है। जबकि समाज सेवा के लिए दिए जा रहे पैसों का गलत इस्तेमाल करने वाले गैर-सरकारी संगठन बड़ी संख्या में हैं। अब तक कई बड़े और जाने-माने गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विदेशी चंदे के दुरुपयोग के मामले सामने भी आ चुके हैं। फिर भी विदेशी मदद से चलने वाले गैर-सरकारी संगठनों पर लगाम कसने की सरकार की कोशिशों को ही सवालों के घेरे में खड़ा किया जाता है। जबकि कई देशों में गैर-सरकारी संगठनों के प्रति न केवल समीक्षात्मक रवैया अपनाया जा रहा है बल्कि कुछ सख्त नियम-कानून भी बनाए जा रहे हैं। हाल ही में चीन में सक्रिय गैर-सरकारी संगठनों को लेकर बनाए गए कानून के अनुसार, राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाने या समाज के हितों को खतरा पहुंचाने पर ऐसी संस्थाओं का पंजीकरण रद््द किया जा सकता है। इजराइल, तुर्की और रूस जैसे देशों में भी विदेशी फंड लेने वाले समाजसेवी संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीरता से विचार किया गया है और कुछ दिशा-निर्देश दिए गए हैं। ऐसे में हमारे यहां भी इन संगठनों को लेकर सख्ती से सोचने की जरूरत है। एनजीओ को लेकर कई सारे सवाल इसलिए भी उठे हैं कि विदेशी दान के रूप में मिल रही मदद आम नागरिकों तक क्यों नहीं पहुंच पाती? यह सरकार ही नहीं, आमजन के लिए भी विचारणीय है कि दुनिया में देश की जो छवि दिखा कर पैसा जुटाया जाता है उसका इस्तेमाल कहां और कैसे हो रहा है? सरकार की यह सख्ती सालों से जड़ें जमाए और बार-बार विदेशी फंड लेते रहने वाले संगठनों पर लगाम लगा कर, उन लोगों के लिए राह खोलेगी जो स्वयंसेवी संगठन बना कर वाकई कुछ सार्थक करने की सोच रखते हैं। ...