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सरोकार, संस्कृति व पर्यावरण की पहरेदार हैं खूंटी की अमिता- राहुल सिंह टूटी

खूंटी के सेफागड़ा गांव की रहने वाली अमिता टूटी से आप 5-10 मिनट किसी भी विषय पर बात कर लें, तो उनकी गहरी संवेदनशीलता का आपको अहसास हो जायेगा. अपने आसपास व आदिवासी समुदाय के लोगों की परेशानियों और उजड़ते जंगल व पर्यावरण के संकट ने उन्हें जंगल बचाने वाली आंदोलनकारी बना दिया. पिछले आठ-नौ  सालों से वे जंगल बचाओ आंदोलन से जुड़ कर वन रक्षा व उसके विस्तार के लिए काम करती रही हैं.

पर, अमिता के व्यक्तित्व को अभी और बड़ा फलक मिलना बाकी था. उन्हें जंगल बचाओ आंदोलन के ही एक वरिष्ठ साथी से जानकारी मिली कि वे चाहें तो वीडियो वोलेंटियर बन सकती हैं. अमिता ने इसके लिए 2012 की शुरुआत में फॉर्म भर दिया. रांची के नामकुम स्थित बगैचा में इंटरव्यू हुआ और सात प्रतिभागियों के बीच वे वीडियो वोलेंटियर चुन ली गयीं. जंगल बचाओ आंदोलन से जुड़ा अनुभव उनके चयन में काम आया.

इंडिया अनहर्ड व वीडियो वोलेंटियर्स नामक संस्था से जुड़ कर सामुदायिक संवाददाता (कम्युनिटी कॉरसपोंडेंट) बनी अमिता की सामाजिक कार्य करने की उम्मीदों को मानो अब पंख लग गये. महत्वपूर्ण बात यह कि अमिता के बनाये वीडियो में सिर्फ समस्याएं व दु:ख ही नहीं होता, बल्कि वे अपने इस कार्य के माध्यम से गौरवशाली आदिवासी संस्कृति व मुंडा व सरना रीति-रिवाज को भी देश-दुनिया के सामने लाती हैं. उनके परिवार में मां व भैया-भाभी हैं.

मनोविज्ञान स्नातक छात्र की समाज कल्याण में रुचि
मनोविज्ञान में स्नातक व बीएड डिग्रीधारी इस लड़की ने पहला वीडियो माओवाद की आड़ में आम लोगों के उत्पीड़न पर बनाया. विनम्रता व पूरे आत्मविश्वास के साथ वे कहती हैं : खूंटी मुद्दों के लिए संघर्ष करने और आंदोलन की भूमि रही है, इसलिए मेरा भी रुख इसी ओर रहा है और मैं वीडियो वोलेंटियर बन गयी. मार्च 2013 में तैयार उनके पहले वीडियो में यह दिखाया गया है कि किस तरह आम आदमी को माओवादी बता कर पुलिस प्रताड़ित करती है. उनके एक वीडियो में खूंटी के अड़की प्रखंड के मायंदपीड़ी की 14 वर्षीया मगदली मुंडू को पुलिस द्वारा  माओवादी होने के नाम पर गिरफ्तार किये जाने की घटना को दिखाया गया है. उस लड़की को पुलिस ने नामकुम के महिला सुधार गृह में रखा. अमिता के प्रयासों से वह अब बाहर आ चुकी है और डीसी से आग्रह कर उसका नाम अड़की के कस्तूरबा विद्यालय में लिखाया गया है. हालांकि उस पर मामला अभी चल ही रहा है. उसे हाजरी के लिए जाना पड़ता है. अमिता की कोशिश है कि ये मामले भी खत्म हो जायें. उसके बाद उन्होंने एक आंगनबाड़ी केंद्र से संबंधित वीडियो बनाया. खूंटी प्रखंड की ही डाड़ीऊटू पंचायत के देव गांव की बहामनी टूटी का चयन 2008 में वहां के आंगनबाड़ी केंद्र के लिए हुआ था, लेकिन अब तक उनकी नियुक्ति नहीं हो सकी है. सहायिका के भरोसे ही वह केंद्र चल रहा है. अमिता बताती हैं कि बहामनी टूटी पैसे नहीं मिलने पर धान बेच कर आंगनबाड़ी केंद्र के लिए पोषाहार की व्यवस्था करती थीं. पर, उनके साथ न्याय नहीं हो पाया है. अमिता ने वीडियो बना कर इस संबंध में सीडीपीओ से बात की तो उन्होंने कहा कि यह मेरे कार्यकाल का मामला नहीं है, इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकती. अमिता कहतीं हैं कि वे चुनाव बाद फिर इस संबंध में अधिकारियों से बात करेंगी. तिलमा स्थित उत्क्रमित विद्यालय के एक पारा शिक्षक के बिना कारण बताये एक साल से गायब रहने की स्थिति पर भी उन्होंने वीडियो बनाया. इस वीडियो का असर यह हुआ कि शिक्षक तुरंत समय पर स्कूल आने लगे.

आदिवासी बच्चों के छात्रवास पर बनाये वीडियो का हुआ असर
अमिता ने खूंटी जिले में आदिवासी बच्चों के छात्रवास पर वीडियो बनाया. जिले में कल्याण विभाग के माध्यम से बने कई छात्रवासों की स्थिति बदहाल हो चुकी है.अमिता ने एसएस उच्च विद्यालय की स्थिति पर वीडियो बनाया. उन्होंने दो बालक छात्रवास ठक्कर बप्पा बालक कल्याण छात्रवास व आदिवासी बालक कल्याण छात्रवास खूंटी पर भी वीडियो बनाया. अमिता कहती हैं कि आदिवासी बालक कल्याण छात्रवास, खूंटी की स्थिति काफी खराब है. यहां 60 छात्र रहते हैं. पर, भवन जजर्र है. शौचालय व बाथरूम नहीं है. पेयजल , चापानल व राशन नहीं है. उसके बावजूद बच्चे वहां पढ़ाई कर रहे हैं. वे पैसे संग्रहित कर अपनी जरूरतें पूरी करते हैं. इसी तरह ठक्कर बप्पा बालक कल्याण छात्रवास में 16 शौचालय हैं, लेकिन इसमें तीन का उपयोग होता है. पेयजल व अन्य कार्यो के लिए एकमात्र कुआं है. पानी टंकी है, पर उसका उपयोग नहीं होता. कमजोर उपकरणों के कारण सबकुछ टूट चुका है. उन्होंने इसका वीडियो बनाया व अधिकारियों को भी दिखाया. पिछले साल नौ अगस्त को आदिवासी दिवस पर 1500 लोगों के लिए आयोजित कार्यक्रम में इसकी स्क्रीनिंग की. अमिता के अनुसार, लक्ष्य को पाने की कार्रवाई के तहत उन्होंने अधिकारियों को ये वीडियो दिखाया व पूछा कि वे कब तक इस समस्या का समाधान करेंगे. फिर वीडियो को संबंधित अधिकारी के फोन नंबर के साथ वेबसाइट पर डाल दिया. अधिकारी के फोन नंबर पर लोगों से फोन कर दबाव डलवाया. इसका नतीजा है कि सभी आदिवासी छात्रवासों की मरम्मत के लिए पैसे आ गये हैं. हालांकि चुनाव के कारण थोड़ी तकनीकी बाधा आ गयी है और कल्याण विभाग से यह पैसा भवन निर्माण विभाग को ट्रांसफर नहीं हुआ है. इस कारण एग्रीमेंट भी नहीं हो सका है. लेकिन, अमिता कहती हैं कि चुनाव के बाद पूरी सक्रियता से वे इस कार्य को करायेंगी.

अमिता के वीडियो में संस्कृति व परंपरा के भी रंग
अमिता बताती हैं कि सरना समुदाय में किसी की मृत्यु होने पर दो अलग-अलग तरीके से शव को दफन किया जाता है ओर पत्थरगड़ी की जाती है. अगर किसी व्यक्ति की स्वाभाविक मृत्यु होती है तो उसे सामान्य तरीके से कब्र में दफन किया जाता है और पत्थरगड़ी की जाती है. लेकिन, किसी की असामयिक मृत्यु होने पर उस शव को अलग जगह दफन किया जाता है और उसे सामान्य कब्रगाह में जगह नहीं दी जाती है. वे कहती हैं : इस वीडियो के माध्यम से मैंने समाज की परंपरा को प्रदर्शित किया है. इसी तरह उन्होंने कान छेदने के रिवाज पर भी वीडियो बनाया कि कैसे एक परंपरा के रूम में मुंडा समाज में हर किसी के कान में छेद किया जाता है. बड़े होने पर भी इन परंपरा को पूरा किया जाता है और अगर किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है और उसका कान नहीं भेदा हुआ रहता है, तब उसके शव का कान भेदा जाता है. वे बताती हैं कि सामान्यत: माता-पिता की शादी नहीं हुए होने की स्थिति में उत्पन्न संतान का ही कान भेदा हुआ नहीं रहता है, लेकिन ऐसी स्थिति में बच्चे के मां-बाप की शादी करायी जाती है और फिर उसके बाद बच्चे के कान में छेद किया जाता है. कनभेदी परंपरा के द्वारा बच्चे व व्यक्ति को औपचारिक रूप से मुंडा समाज में प्रवेश दिलाने की भी प्रक्रिया पूरी की जाती है. कान हमेशा सोने या चांदी जैसे धातु से ही भेदा जाता है.

यादगार अनुभव
अमिता के लिए गोवा में नवंबर 2012 में आयोजित तहलका पत्रिका के थिंक फेस्टिवल में शरीक होना यादगार अनुभव है. वे कहती हैं कि मैं फ्लाइट से गयी और वह मेरी पहली हवाई यात्र थी, जो मेरे लिए अनूठा अनुभव था. अन्ना हजारे, शाहरुख खान, जावेद अख्तर जैसे मशहूर व्यक्ति यों के साथ मंच  व अपने अनुभवों को साझा करना उनके लिए एक रोमांचक अनुभव है.