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सात दशक के बाद-- रघु ठाकुर

स्वतंत्रता और स्वाधीनता का क्या अर्थ है? स्वतंत्रता एक व्यवस्थागत आजादी का बोध कराती है। मसलन, स्वतंत्र यानी हमारे देश का अपना प्रशासन, अपनी शासन-प्रशासन प्रणाली। पर स्वाधीनता उससे कुछ ज्यादा व्यापक अर्थ देती है, जिसमें किसी भी प्रकार की अधीनता न हो। एक देश के रूप में हम अपने ही अधीन हों- एक नागरिक के रूप में, हम अपनी अंतरात्मा के अधीन हैं। अब प्रश्न यह है कि आज की स्थितियां क्या इस प्रकार की हैं। इन उनहत्तर वर्षों में हमने अपने लोकतंत्र को बरकरार रखा है तथा अपने मत से समयबद्व चुनाव के अधिकार का हनन नहीं होने दिया। इकतालीस वर्ष पूर्व जब आपातकाल थोप कर वयस्क मतदान के अधिकार, प्रेस की आजादी और अन्य मौलिक अधिकारों को समाप्त करने का प्रयास किया तो लगभग समूचा देश एकजुट होकर इसके खिलाफ निर्णायक मतदाता बना तथा सत्तारूढ़ पार्टी को पराजित कर तत्कालीन व भावी शासकों को भी संदेश दे दिया कि लोकतंत्र से खिलवाड़ वह सहन नहीं करेगा। पर विचारणीय प्रश्न यह है कि हमारा लोकतंत्र क्या स्वस्थ या वास्तविक लोकतंत्र कहा जा सकता है? यह प्रश्न उठते ही हमारे सामने भारतीय लोकतंत्र और राजनीति में जन्म ले रही, फल-फूल रही विकृतियां आ जाती हैं।

लोकतंत्र केवल साधन नहीं बल्कि साध्य भी है। लोकतंत्र केवल प्रणाली नहीं, बल्कि आदर्श भी है। लोकतंत्र यानी जिसमें तंत्र का नियंत्रण लोग या जन के पास हो। पर यह आज के हालात में कैसे संभव है। जब एक मतदाता के रूप में हमने स्वत: अपने आपको विकृतियों का दास बना दिया है तो आदर्श लोकतंत्र कैसे आएगा। आज भारतीय राजनीति में जातिवाद, संप्रदायवाद, परिवारवाद, पूंजीवाद, बाजारवाद की बीमारियों का संक्रमण व्यापक रूप से फैला है। परिवारवाद, लोकंतत्र की मूल अवधारणा के खिलाफ है। परिवारवाद राजतंत्रीय परंपरा है। लोकतंत्र व्यक्ति की आजादी की व्यवस्था है। पर आज तो अधिकतर दल परिवारवाद के पोषक हैं। कतिपय राजनेता तो सार्वजनिक रूप से यह तर्क देते हैं कि अगर डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, वकील का बेटा वकील बन सकता है तो नेता का बेटा नेता बने इसमें क्या बुरा है। मगर यह तुलना तर्कसंगत नहीं है। वंशानुगत उत्तराधिकर संपत्ति का या संपत्ति कमाने का औजार हो सकता है, पर राजनीति तो समाज के निर्माण की क्रिया है। डॉ लोहिया कहते थे कि राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालिक राजनीति। अब अगर राजनीति या धर्म का उत्तराधिकार वंश के आधार पर होगा तो दोनों के गुण व मूल्य समाप्त हो जाएंगे।

राजनीतिक पद का आधार किसी व्यक्ति का, देश के प्रति न्याय या कुर्बानी होना चाहिए, न कि माता-पिता की हैसियत या सत्ता की ताकत। अगर भारत की आजादी के आंदोलन का मूल परिवारवाद होता तो फिर सदियों के राजतंत्र को समाप्त ही क्यों करते। संविधान में, जनता द्वारा निर्वाचित सरकार का प्रावधान क्यों करते? परिवारवाद एक सीढ़ी है जो अयोग्य को श्रेष्ठ और योग्य को हीन बनाती है। परिवारवाद जड़ता का पर्याय है, जो परिवर्तन को रोकता है। यह लोकतंत्र की मूल रचना का भी विरोधी है। साथ ही उन हजारों दलीय या अन्य कार्यकर्ताओं का भी अपमान है जो किसी व्यक्ति को सांसद या विधायक बनाने मेंनींव के पत्थर होते हैं। यह कैसी विडंबना है कि सैकड़ों, हजारों कार्यकर्ताओं के कंधे पर चढ़ कर, लाखों मतदाताओं के विश्वास पर जो कोई व्यक्ति विधायक या सांसद या फिर बाद में मंत्री आदि बनता है, वह निर्वाचित होते ही लोक से कट जाता है।

आज हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, पांच वर्ष में केवल एक दिन लोकतांत्रिक रहती है यानी चुनाव के दिन। उसके बाद वह नवसामंतवाद या लोकतांत्रिक राजतंत्र में बदल जाती है। निस्संदेह इस विकृति के लिए निर्वाचित सत्ताधीश/प्रतिनिधि तथा आमजन दोनों ही जवाबदेह हैं, क्योंकि जनप्रतिनिधियों या नेतृत्व का कार्य आदर्श प्रतिपादित करना है, न कि जनमानस की कमजोरियों को ढाल बना कर इस्तेमाल करना। और लोकतंत्र में अंतिम शक्ति तो मतदाता के पास ही है। अगर मतदाता परिवारवाद के प्रतीकों को हराने का निश्चय कर ले तो एक क्षण में परिवारवाद का अंत हो जाएगा। जातिवाद हमारे लोकतंत्र की दूसरी बड़ी बीमारी बन गई है। पहले सत्ताधीशों व राजनेताओं ने अपनी सुविधा के लिए चुनाव में बगैर परिश्रम, त्याग या योग्यता सिद्ध किए जाति को चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाया। अब लोगों ने अपनी इस जातिप्रथा को मजबूती से थाम लिया है। जातिवाद दिन-ब-दिन इस प्रकार बढ़ रहा है कि संसद, विधानसभा, न्यायपालिका व प्रशासन सभी उससे प्रभावित हो गए हैं या हो रहे हैं। जातिवाद के वायरस ने अतीत में भी योग्यता को नष्ट किया और आज भी कर रहा है। जातिवाद ने आमतौर पर जन्मना अयोग्यता को योग्यता व श्रेष्ठता में बदला तथा देश की बड़ी आबादी की योग्यता को पनपने का अवसर ही नहीं दिया। परिवारवाद व जातिवाद आज की राजनीति में टिकट पाने व सफलता की सीढ़ी बन गए हैं।

आजकल निर्वाचित शासकों के ठाटबाट, सुरक्षा व शाही अंदाज, पुराने राजे-रजवाड़ों को भी मात कर रहे हैं। पहले तो राजा की सवारी वर्ष में एकाध बार या कभी-कभी ही महल के बाहर निकलती थी, अब तो ये नए राजाओं के अवतार रूपी मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि लगभग हर दिन यातायात रोकने व जाम के कारण बनते हैं। उनकी सुरक्षा पर प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपए खर्च होते हैं। आम आदमी को उस सड़क पर चलना, उनकी ओर देखना भी गुनाह है जहां से ये नए राजे-महाराजे निकलते हैं। इनकी सवारियों का काफिला निकलते समय, आदमी को उलटमुंह करके खड़ा कर दिया जाता है। मकानों के दरवाजों पर पुलिस ताले डाल देती है। सुरक्षा प्रहरी घरों पर जूते पहन कर चढ़ जाते हैं और मकान मालिकों व निवासियों को उतने समय तक के लिए बंधक बना दिया जाता है, जब तक ‘राजाओं' की सवारी नहीं निकल जाती। सड़कों पर यातायात रोक दिया जाता है। हृदयाघात से पीड़ित व्यक्ति को ले जानी वाली एंबुलेंस से भी सत्ताधीशों को खतरा होता है। तथा कई बार इन घातक बीमारियों के पीड़ितों की अस्पताल के रास्ते में ही मृत्यु हो जाती है।

भ्रष्टाचार के विषधर ने हमारे देश को डस लिया है। हमारी गिनती दुनिया के सबसे ज्यादा भ्रष्ट देशों में होती है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट में भारतीयों को सर्वाधिक रिश्वत देने वाला बताया गया है। भ्रष्टाचार ने राजनीति को बुरी तरह प्रभावित व पतित कर रखा है। भ्रष्टाचार राजनीतिकों से लेकर मतदाता तक पहुंच चुका है। इसने हमारे देश के हर अंग को प्रभावित किया है- चाहे वह न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो, विधायिका हो या जनता हो। कुछ लोगों ने भ्रष्टाचार से मुक्ति के नाम पर जनलोकपाल कानून का अभियान चलाया; उनके इस अभियान को आंरभ में कॉरपोरेट मीडिया ने अपूर्व समर्थन दिया। लेकिन भारत को भ्रष्टाचार-मुक्त या अपराध-मुक्त बनाने में कानून की सीमित उपयोगिता है। अत: कड़े कानून के साथ ही देश में संस्कार अभियान चलाना होगा, जिसमें परिवार व माता-पिता की नागरिक के नाते अहम भूमिका होगी।

हमने लोकतंत्र को प्रणाली के रूप में तो अपनाया हुआ है, मगर अभी लोकतांत्रिक मानस की रचना नहीं हुई है। हम कानून का पालन केवल भय के आधार पर करते हैं। कानून का पालन बगैर भय के, एक स्वैच्छिक अभ्यास के रूप में नहीं करते। हमारे संस्कार लोकतांत्रिक नहीं हैं, सरकार पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है तथा हम एक समाज के नाते अपना कोई दायित्व नहीं मानते। अगर घर के पडोस में कीचड़ हो तो सारा मोहल्ला चर्चा करेगा, खेद व्यक्त करेगा, संस्थाओं की निंदा करेगा, पर उसे साफ करने के लिए स्वत: आगे नहीं आएगा। यह निर्भरता अन्य क्षेत्रों में भी परिलक्षित होती है।

ऐसा महसूस होने लगा है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं में कोई आपसी तालमेल नहीं है। हर संवैधानिक पदाधिकारी अपनी संवैधानिक सीमाओं को लांघ कर, अधिकतम अधिकार तथा अन्य क्षेत्रों में हस्तक्षेप करना चाहता है। भारतीय संविधान की एक बुनियादी विशेषता संवैधानिक संस्थाआें व पदों में शक्तियों के विभाजन तथा संतुलन की रही है। पर इस संतुलन को खंडित किया जा रहा है। चीन में एकदलीय शासन है। पर वहां न्यायपालिका ने पूर्व रेलमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में मृत्युदंड देकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। भारत में तो न्यायालय बरसों बीत जाने के बाद भी आय के अनुपात में अधिक संपत्ति होने के मामलों का निपटारा नहीं कर पाते।

सरकार ने नीति आयोग के माध्यम से गरीबी रेखा के नीचे की आबादी के लिए तय राशि और उनकी संख्या को भी कम कर दिया है। यह कुछ वैसा ही है कि टीबी के बीमारों की संख्या कम करने के लिए या तो टीबी के मरीजों को मार दिया जाए या फिर टीबी को टीबी मानने से ही इनकार कर दिया जाए। सरकार गरीबों की संख्या में कमी सिद्ध करने के लिए नीति आयोग के पक्ष में निहायत बेतुकी दलीलों का सहारा ले रही हैं। कल तक जो लोग, वैश्वीकरण, डंकल प्रस्ताव-एफडीआइ का विरोध करते थे अब एफडीआइ के पीछे पागल बन कर घूम रहे हैं। वैश्वीकरण की शक्तियों ने देश के मनों को बांट दिया है। इसके फलस्वरूप गरीबों की लड़ाई की संभावनाएं धूमिल हो गई हैं। आज राजनीति को नए ढंग से संगठित करना होगा। मूल्य आधारित राजनीति, संस्कारयुक्त कार्यकर्ता, निस्वार्थ व निस्पृह त्याग की भावना, लालच मुक्त समाज, निष्पक्ष प्रशासन, ईमानदार सत्ता और राष्ट्रवादी राष्ट्र का निर्माण करने की आवश्यकता है। यही समय की पुकार है।