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सातवें वेतन आयोग का प्रभाव-- डा. भरत झुनझुनवाला

सातवें वेतन आयोग के सुझाव के अनुसार, सरकार ने केंद्रीय कर्मियों के वेतन में वृद्धि की है. इनके हाथ में अतिरिक्त आय आयेगी, जिससे ये बाजार में माल खरीदेंगे. विशेषकर कार, टीवी एवं फ्रिज इत्यादि के निर्माताओं में उत्साह बना है. उन्हें आशा है कि केंद्रीय कर्मियों द्वारा उनके उत्पादों को अधिक मात्रा में खरीदा जायेगा.

कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केंद्रीय कर्मियों द्वारा की गयी खरीद का संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर भी सुप्रभाव पड़ेगा. कार निर्माताओं द्वारा स्टील अधिक मात्रा में खरीदी जायेगी. कार के उत्पादन में ज्यादा श्रमिकों को लगाया जायेगा. अर्थव्यवस्था चल निकलेगी.

बात सही है. कार तथा फ्रिज की बिक्री बढ़ेगी. पर यह आधी कहानी है. केंद्रीय कर्मियों को दिये गये अतिरिक्त वेतन के स्रोत को भी देखना होगा. जैसे फ्रिज खरीदा जाये, तो किचन में उत्साह तो बनेगा, किंतु देखना होगा कि बच्चे की फीस में कटौती करके तो फ्रिज नहीं खरीदा गया है. तब परिवार के समग्र हित को झटका लगेगा, चूंकि अच्छी शिक्षा के अभाव में भविष्य में बच्चे की आय न्यून रह जायेगी. वही फ्रिज ठेके में हुए किसी प्रॉफिट से खरीदा गया होता, तो प्रभाव सकारात्मक रहता. तब किचन में फ्रिज का उत्साह और बच्चे के भविष्य दोनों ही सही दिशा में चलते.

केंद्रीय कर्मियों को बढ़े हुए वेतन सरकार द्वारा वसूले गये टैक्स से दिये जायेंगे. अतः देखना होगा कि टैक्स कौन अदा करता है. टैक्स के दो प्रकार हैं- प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष. इन दोनों टैक्स में प्रत्यक्ष टैक्स अमूमन अमीरों के द्वारा अदा किया जाता है. 100 रुपये के टैक्स में सरकार द्वारा 50 रुपये प्रत्यक्ष टैक्स के रूप में वसूले जा रहे हैं.

शेष 50 रुपये अप्रत्यक्ष टैक्स है, जिसे अमीर-गरीब दोनों से समान वसूला जाता है. मान लेते हैं कि इसमें 25 रुपये गरीब से तथा 25 रुपये अमीर से वसूले जा रहे हैं. इस तरह देखें, तो केंद्रीय कर्मियों को दिये गये 100 रुपये के बढ़े हुए वेतन में 75 रुपये अमीर से तथा 25 रुपये गरीब से वसूले जा रहे हैं.

इस वसूली से इनके हाथ में क्रय शक्ति घटेगी. टैक्स देनेवाले अमीर द्वारा कार, फ्रिज आदि कम खरीदे जायेंगे. टैक्स देनेवाले गरीब द्वारा कपड़े, मिक्सी, मोटरसाइकिल आदि कम खरीदी जायेगी. दूसरी तरफ केंद्रीय कर्मियों के हाथ में आये अतरिक्त ताय से वे कार-फ्रिज खरीदेंगे. अतः सरकारी कर्मियों के वेतन में वृद्धि का प्रभाव खपत के स्थानांतरण का होगा. टैक्स देनेवाले अमीर व गरीब की खपत में कटौती होगी, जबकि केंद्रीय कर्मियों की खपत में वृद्धि.

खपत के स्थानांतरण के दो पक्ष हैं. कुछ खपत अमीर से लेकर केंद्रीय कर्मियों को दी जायेगी. इसे दो अमीरों के बीच स्थानांतरण कहा जा सकता है, चूंकि 30,000 प्रतिमाह पानेवाला केंद्रीय कर्मी को अमीर ही माना जाना चाहिए. गरीब परिवार की मोटरसाइकिल के स्थान पर केंदीय कर्मी द्वारा कार खरीदी जायेगी. अतः कार निर्माताओं में बना उत्साह ठीक ही है. परंतु, मोटरसाइकिल की बिक्री में आयी गिरावट की अनदेखी की जा रही है. समग्र रूप से बाजार में अतिरिक्त मांग शून्य रहेगी.

वसूली गयी रकम का उपयोग केंद्रीय कर्मियों को वेतन देने के स्थान पर हाइवे बनाने, इ गवर्नेंस पोर्टल बनाने, अंतरिक्ष में स्पेस शटल भेजने के लिए किया जाता, तो अलग प्रभाव पड़ता. मान लीजिए, सरकार ने 100 रुपये का अतिरिक्त टैक्स वसूल किया और इसका निवेश हाइवे बनाने में किया. टैक्स अदा करनेवाले अमीर द्वारा कार एवं गरीब द्वारा मोटर साइकिल की खरीद कम हुई, लेकिन हाइवे बनाने के लिए सीमेंट, स्टील, एस्कावेटर तथा श्रम की मांग में वृद्धि हुई. खपत का स्थानांतरण इस व्यवस्था में भी हुआ. टैक्स अदा करनेवाले की खपत घटी, जबकि सरकारी निवेश बढ़ा.

गरीब से 25 रुपये लेकर 100 रुपये का अतिरिक्त वेतन सरकारी कर्मियों को देने से आम आदमी और सरकारी कर्मियों में वैमनस्य बढ़ता है. आज आप देश के किसी भी गांव में चले जाइए, सरकारी कर्मियों के घर अवश्य ही पक्के मिलेंगे. विश्व बैंक के कुछ साल पहले के एक अध्ययन के मुताबिक, आम आदमी की तुलना में सरकारी कर्मियों के वेतन भारत में पांच गुना थे. विश्व में यह अधिकतम अंतर था. सातवें वेतन आयोग को लागू करने के बाद यह अंतर दस गुना हो जायेगा. आम आदमी इन सरकारी कर्मियों से पहले ही पीड़ित है. अतः गरीब का पेट काट कर सरकारी कर्मियों को पोषित करने से सामाजिक वैमनस्य बढ़ेगा.

केंद्रीय कर्मियों के वेतन में की गयी वृद्धि से कार निर्माताओं में उत्साह सही है, लेकिन समग्र अर्थव्यवस्था की दृष्टि से यह हानिप्रद होगा. बाजार में कुल मांग में कोई वृद्धि नहीं होगी. केंद्रीय कर्मियों द्वारा कार अवश्य अधिक खरीदी जायेगी, लेकिन आम आदमी द्वारा मोटरसाइकिल की खरीद में उतनी ही कटौती होगी. खपत का स्थानांतरण गरीब से केंद्रीय कर्मियों की ओर होगा. बढ़े हुए वेतन ब्रिटिश सरकार की पॉलिसी के तहत दिये जा रहे हैं. ब्रिटिश सरकार ने इन्हें ऊंचे वेतन दिये थे और भारतीयों का दमन करने में इन्हें हथियार बनाया था. केंद्र सरकार अब भी उसी राह पर चल रही है.