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सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था- केसी त्यागी

मुजफ्फरपुर में ‘एक्यूट इंसेफेलाइटिस' नामक बीमारी से हुई बच्चों की मौत दर्दनाक घटना है. इसने सरकार और समाज दोनों को विचलित किया है. हालांकि, विशेषज्ञ अब तक इसे अज्ञात बीमारी बता रहे हैं, लेकिन चिकित्सकों ने भीषण गर्मी, कुपोषण और जागरूकता के अभाव आदि को इसका तात्कालिक कारण माना है. इस भीषण त्रासदी पर दलगत राजनीति भी हुई और मीडिया का बाजार भी गरमाया. मीडिया के एक वर्ग द्वारा राज्य और नेतृत्व विशेष की क्षमता तक पर सवाल उठाये गये.


मुजफ्फरपुर जैसी घटनाएं किसी राज्य विशेष तक सीमित नहीं हैं. गत वर्ष इंसेफेलाइटिस के कारण ऐसी ही मर्माहत घटना गोरखपुर में घटी थी.


चूंकि यह राज्यवार या दलगत बचाव योग्य विषय भी नहीं है, ऐसी घटनाओं पर आरोप-प्रत्यारोप की बजाय स्थिति पर काबू पाने और स्थायी समाधान पर विमर्श वांछनीय है. पूरे देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था लंबे समय से आलोचना का केंद्र बिंदु रही है. दो राय नहीं कि आर्थिक वृद्धि के अनुरूप इस क्षेत्र में विकास नहीं हो पाया है.


आज जब भारत कई बीमारियों का गढ़ बना हुआ है, यहां स्वास्थ्य पर जीडीपी का मात्र 1.15 फीसदी हिस्सा खर्च होता है, जो बहुत ही कम है. सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में कम खर्चे के कारण निजी अस्पतालों का उदय हुआ है और इन महंगे अस्पतालों की बोझ ने आम जनों को और गरीब बनाने का काम किया है. जो पहले से गरीब हैं, वे अपनी जान बचाने तक के लिए उचित इलाज तक से वंचित रह जाते हैं.


एक ताजा आकलन के अनुसार, महंगे इलाज के कारण देश की कुल आबादी का लगभग 3.5 फीसदी जनसंख्या प्रतिवर्ष दरिद्रता की शिकार हो जाती है और लगभग पांच फीसदी जनसंख्या आर्थिक विपत्ति का दंश झेलने को मजबूर है. अपने देश से इतर, ब्रिटेन, कनाडा आदि देशों में प्रत्येक नागरिक को निःशुल्क चिकित्सा मुहैया करायी जाती है, जिसका खर्च नागरिकों से प्राप्त ‘कर' में ही समाहित होता है. इन देशों में कुल जीडीपी का लगभग 9 से 12 फीसदी हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है. स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश में विशेषज्ञ चिकित्सकों की औसतन 82 फीसदी कमी है.


लगभग 40 फीसदी लैब टेक्नीशियन तथा 12 से 16 फीसदी नर्सों की अनुपलब्धता चिकित्सा व्यवस्था को कमजोर किये हुए है. यह स्थिति प्रत्येक राज्य की है. हिमाचल, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा केरल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की लगभग 90 फीसदी कमी है. वहीं बिहार, झारखंड तथा तमिलनाडु में ऐसे डॉक्टरों की कमी लगभग 86 फीसदी है.


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 41 और 47 राज्य द्वारा नागरिक को उपचार मुहैया कराने को निर्देशित करते हैं. पिछले 70 वर्षों में देश आर्थिक विकास की बड़ी-बड़ी गाथाएं लिखने में कामयाब रहा है, लेकिन इस दिशा में संवेदनशीलता नदारद दिखी. गत वर्षों के दौरान तमाम सुख-सुविधाओं से लैस हजारों की संख्या में बड़े-बड़े आधुनिक अस्पताल खोले गये हैं, लेकिन इनके महंगे इलाज के कारण भारतीय जनसंख्या के बड़े हिस्से को किसी भी प्रकार का लाभ नहीं मिल पाया है.


सरकार द्वारा भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी क्षेत्र के निवेशकों तथा बीमा कंपनियों को मुख्य भूमिका में लाने जैसे प्रस्ताव रखे जा चुके हैं, लेकिन यह आम नागरिकों के लिए हितकारी नहीं है. निजी अस्पतालों के खुलने से संपन्न और गैर संपन्न नागरिकों के इलाज के बीच भी एक बड़ी खाई बन चुकी है.


मुजफ्फरपुर की घटना भी इसी असमानता का उदाहरण है, जहां मृतक बच्चों में सर्वाधिक संख्या गरीब और पिछड़े समाज से है. सीमेंट की कर्कट से बनी छत की उमस भरी गर्मी तथा उचित कैलोरी युक्त भोजन, शुद्ध पेय जल, शौचालय आदि मूलभूत जरूरतों का अभाव समेत साफ-सफाई की कमी भी ऐसी घटनाओं के लिए बराबर जिम्मेदार है.


सरकारों का दायित्व होना चाहिए था कि जनसंख्या के समानुपातिक उचित बजट के अंतर्गत नागरिकों को मुलभूत चिकित्सीय सुविधाएं प्रदान करे. इन सुविधाओं के अभाव में भारत कई बीमारियों का गढ़ बन चुका है. कुपोषण, भुखमरी, टीबी, मलेरिया, हैजा, टायफायड, मानसिक विकलांगता जैसे कारणों से अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की छवि धूमिल हुई है. स्वास्थ्य बीमा भी भारतीय संरचना के अनुकूल नहीं है.


एनएसएसओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक आबादी के पास न तो कोई सरकारी स्वास्थ्य स्कीम है और न ही कोई निजी बीमा. ऐसे में जनसंख्या के बड़े समूह के लिए सरकारी स्वास्थ्य ही विकल्प बचता है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक, केवल 21 फीसदी महिलाओं को ही प्रसव से पूर्व की सभी सेवाएं मिल पाती हैं. कुपोषण व अन्य संक्रमण रोगों के कारण प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में बच्चे पांच वर्ष की आयु से पहले ही दम तोड़ देते हैं.


ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 119 देशों की सूची में भारत 103वें स्थान पर है. यहां भी हम नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी मुल्कों से काफी पीछे हैं. स्पष्ट है कि भारत में भुखमरी और कुपोषण की समस्या बड़े स्तर पर विद्यमान है. विश्व के कुल कुपोषणग्रस्तों का 24 फीसदी हिस्सा भारत में है.


इससे स्पष्ट है कि कुपोषण से लड़ने और नागरिकों को पोषाहार प्रदान करने में हम विफल रहे हैं. सत्तर से पहले के दशक तक खाद्य की कमी ऐसी समस्याओं के लिए बहाना बनती रही, लेकिन आज जब देश खाद्य उत्पादन में संपन्न और बड़ा निर्यातक बना हुआ है, भंडारण क्षमता के अभाव में करीब 20 फीसदी अनाज बेकार हो जाता है, ऐसे में भुखमरी व कुपोषण जैसी समस्याओं की निरंतरता गले नहीं उतरती.


देश में गरीबी रेखा के निर्धारण हेतु 2005 में तेंदुलकर कमेटी बनी, 2012 में रंगराजन कमेटी बनी, जिसने शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों के लिए क्रमशः 33 व 27 रुपये तथा 47 व 32 रुपये प्रतिदिन खर्च करनेवालों को गरीबी रेखा से बाहर रखा. ये आंकड़े हास्यास्पद हैं.


आवश्यकता है कि इन बिंदुओं पर मौजूदा महंगाई के समानुपातिक व्यय सीमा को आधार बना कर गरीबी रेखा निर्धारित की जाए. प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना के तहत 50 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य बीमा स्वस्थ भारत निर्माण में सराहनीय पहल है, लेकिन अब युद्ध स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र को दुरुस्त करने की जरूरत है. यह नये भारत का मजबूत आधार होने के साथ ही देश के मानव संसाधन के लिए भी जरूरी है.