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सितारों से संवाद पर बंदिशें-- उर्मिलेश

इसी 17 जनवरी को रोहित वेमुला के हमारी दुनिया से विदा हुए एक साल पूरे हो जायेंगे. हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के प्रतिभाशाली शोधछात्र ने अपनी आत्महत्या, जो वस्तुतः किसी हत्या से भी ज्यादा नृशंस थी, से ऐन पहले एक मार्मिक पत्र लिखा. रोहित ने कहा था- ‘मैं हमेशा एक लेखक बनना चाहता था. विज्ञान पर लिखनेवाला, कार्ल सगान की तरह. लेकिन, अंत मे मैं सिर्फ यह पत्र लिख पा रहा हूं.
 

मुझे विज्ञान से प्यार था, सितारों से, प्रकृति से और मैंने लोगों से प्यार किया, पर यह नहीं जान पाया कि वे कब के प्रकृति को तलाक दे चुके हैं. हमारी भावनाएं नकली और प्रेम बनावटी हो गया है. मान्यताएं झूठी--.' वेमुला की आत्महत्या, जिसे ‘सांस्थानिक हत्या' कहा गया, के एक साल बाद भी लगता है, मानो हमारी व्यवस्था ने उक्त घटनाक्रम से कोई सबक ही नहीं लिया.

 

हैदराबाद की तर्ज पर ही देश के शीर्ष विश्वविद्यालय-जेएनयू में पिछले दिनों एक बेहद साधारण से घटनाक्रम के बाद नौ शोध-छात्रों को निलंबित कर दिया गया. इन्हें भी रोहत वेमुला की तरह हॉस्टल से बाहर जाने का आदेश हुआ. साथ में यह भी कि कैंपस में इन्हें किसी तरह का सहयोग देनेवालों के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी.

 

पता नहीं, यह संयोग है या सुनियोजित, जेएनयू के सारे निलंबित शोधछात्र दलित-ओबीसी-आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के हैं. इनमें दो दलित हैं, पांच ओबीसी, एक आदिवासी और एक अल्पसंख्यक. कसूर इतना भर कि छात्रों के एक समूह में शामिल होकर ये विश्वविद्यालय की शोध-छात्र प्रवेश नीति में मौखिक परीक्षा के अंकों को कम रखने की उच्चाधिकारियों से मांग कर रहे थे.

 

उस दिन कैंपस के प्रशासनिक भवन में उच्चाधिकारियों की बैठक थी. छात्रों का कहना था कि दाखिले में लिखित परीक्षा के अंक ज्यादा हों, मौखिक के कम. इसके पीछे उनकी मजबूत दलील थी कि मौखिक परीक्षा के अंक ज्यादा होने से ‘खास सोचवाले प्रोफेसरों' और अन्य पदाधिकारियों को आत्मगत होने और निजी पसंद के आधार पर अंक देने की छूट सी मिल जाती है.

 

 

दलित-ओबीसी-आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र इसके सर्वाधिक भुक्तभोगी होते हैं. उनके साथ भेदभाव होता है. छात्रों के प्रदर्शन से नाराज जेएनयू प्रशासन ने तत्काल नौ दलित-ओबीसी छात्रों को सस्पेंड कर दिया। सवाल उठता है, जब देश के अनेक उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-वर्ण के आधार पर भेदभाव के असंख्य मामले दर्ज हैं, कुछ प्रौद्योगिकी संस्थानों और दिल्ली के एम्स सहित कई विश्वविद्यालयों में हादसे हो चुके हैं फिर जेएनयू प्रशासन इस सामाजिक सच को मंजूर क्यों नहीं करना चाहता? 
 

इस बीच, केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की सलाह पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से एक नया फरमान आया है.
 

 

मौखिक परीक्षा के अंक घटाने पर विचार करने के बजाय जेएनयू प्रशासन अब यूजीसी के इस नये फरमान का हवाला देकर मौखिक परीक्षा के अंकों को घटाने के बजाय और बढ़ाने पर विचार कर रहा है. अब तक मौखिक परीक्षा के 30 फीसदी अंक रहे हैं, छात्र चाहते थे कि वह 15 फीसदी रहे. लेकिन, उसे अब 100 फीसदी करने का प्रस्ताव है. आखिर उत्पीड़ित वर्ग के छात्रों को दाखिले के दौरान ही रोकने की कोशिश क्यों हो रही है? क्या वे नहीं चाहते कि इन समाजों की नयी पीढ़ियां समाज को बेहतर बनाने या वेमुला की तरह सितारों से संवाद का सपना देखें.

 

मुझे याद है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोहित वेमुला की ‘सांस्थानिक हत्या' के कई दिनों बाद उक्त घटनाक्रम पर गहरा दुख जताते हुए एक कार्यक्रम में कहा, ‘रोहित वेमुला मां भारती के लाल थे. मां भारती ने एक लाल खो दिया.' वेमुला की आत्महत्या के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति सहित खास उच्चाधिकारियों, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ छात्र नेताओं और स्थानीय भाजपा सांसद को जिम्मेवार ठहराया गया.

 

वह तो रोहित वेमुला का महान सदाशय और उदात्त व्यक्तित्व था कि आत्महत्या से ऐन पहले लिखे अपने पत्र में उसने दर्ज किया, ‘इस कृत्य के लिए कोई जिम्मेवार नहीं. मेरे जाने के बाद मेरे दोस्तों और दुश्मनों को परेशान न किया जाये.' पर, रोहित वेमुला के बाद भी हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों ने जाति-वर्ण आधारित भेदभाव का सिलसिला कायम रखा, प्रतिभाशाली छात्रों की मांगों पर लोकतांत्रिक विमर्श के बजाय निलंबन-निष्कासन के हथकंडे आजमाये जा रहे हैं और वेमुला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के आरोपी हैदराबाद के विवादास्पद कुलपति पी अप्पाराव को फिर से पद पर बैठा दिया गया. यही नहीं, उन्हें गत तीन जनवरी को इंडियन साइंस कांग्रेस के दौरान बायो-टेक्नोलॉजी में विशिष्ट योगदान के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों सम्मानित भी किया गया. बायो-टेक्नॉलाजी के बड़े वैज्ञानिकों को भी नहीं मालूम कि अप्पाराव ने इस क्षेत्र में क्या कुछ किया है! पर वेमुला के बजाय अब अप्पाराव बन गये हैं ‘मां भारती के लाल!'