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सियासी दलों पर किसानों का कर्ज-- गोपालकृष्ण गांधी

मेरा यह कहना उन्हें पसंद नहीं आएगा। सच यह है कि मैं कहने की कोशिश भी करूंगा, तो वह जबरन इनकार कर देंगे। फिर भी, यदि मुझे कहने का मौका मिलेगा, तो वह मुझे टोकेंगे और कहने से रोक देंगे। लेकिन मुझे तो अपनी बात कहनी ही है।

पालागुम्मि साईनाथ ने वह कर दिखाया, जो कोई दूसरा नहीं कर सका। किसी ने ऐसा करने की अभी तक कोशिश भी नहीं की है, और न ही किसी दूसरे के पास ऐसा करने का साहस है। उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों से एक लाख से अधिक किसानों को संगठित किया, उन्हें राष्ट्रीय राजधानी में एकजुट किया और रामलीला मैदान से यह कहने के लिए प्रोत्साहित किया कि ‘हम यहां पहुंच गए हैं'। अपनी खुली आंखों से राजधानी दिल्ली ने, और टेलीविजन और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हम जैसे लाखों लोगों ने जो कुछ देखा, वह अभूतपूर्व था। इसके अद्वितीय होने की पहली वजह तो दिल्ली पहुंचने वाले किसानों की संख्या थी। दूसरी, यह जुटान बता रहा था कि देश के पूरब, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण के किसानों के उद्देश्य किस कदर समान हैं। तीसरी और सबसे बड़ी वजह, इसका पूरी तरह शांतिपूर्ण बने रहना था। किसानों के इस जमावड़े की बुनियाद में जो था, वह यह कि इसने इस भूमि की ताकत और इसके खेतिहरों को सत्ता, अधिकार और सरकार के केंद्र में ला दिया। भारत के किसान, भारत सरकार के सामने खड़े थे, और कह रहे थे, ‘हम यहां आ चुके हैं... हमें देखो'।

किसानों के इस जुटान से रामधारी सिंह दिनकर के वे अविस्मरणीय शब्द याद आ गए, जिसे 1975 में इसी रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने दोहराया था- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...। साईनाथ की न तो ऐसी कोई मंशा थी, और न ही उन्होंने भीड़ को किसी से यह कहने के लिए उकसाया कि ‘सिंहासन खाली करो...'। उनका मतलब तो बस यह एहसास दिलाना था कि ‘अब आप हमें रोक नहीं सकते'। इस विशाल जमावड़े को देखकर लोग भी यही समझ रहे थे।

करीब दो दशक पहले की अपनी चर्चित किताब एवरीबॉडी लव्स अ गुड ड्राउट के बाद से ही पी. साईनाथ देश के किसानों के हमसफर बनकर उभरे। किसानों-खेतिहरों की आर्थिक बदहाली, बेरहम मौसम से उनका लगातार संघर्ष, बाजार की संवेदनहीनता, अन्नदाताओं की बढ़ती मुश्किलों के समाधान के लिए समय न निकाल पाने वाला प्रशासन- सब कुछ साईनाथ ने देखा और समझा है। अपने लेखों और भाषणों, अपनी मुखरता और सक्रियता के जरिए वह पिछले कई वर्षों से भारत और दुनिया को बताते आ रहे हैं कि वह ग्रामीण भारत ही है, जो भारत और इस धरती की परवाह करता है, जो नव-उदारवादी मुक्त व्यापार और अतिराष्ट्रवादी पूंजीवाद से पस्त है, और जो भारत का आधा से ज्यादा बड़ा हिस्सा है। यही हिस्सा मुफलिसी में जीता और मरता है।

जब भी देश के किसी इलाके में सूखा पसरता है या बाढ़ आती है, सरकार ‘आपदा प्रबंधन' में जुट जाती है। वह नकद पैसे बांटती है। इन ‘कदमों' से उनको मदद तो मिलती है, मगर क्या यह सहायता प्राकृतिक आपदाओं को दोगुना विनाशकारी बना देने वाली उनकी गरीबी और तंगहाली से निपटने में भी कारगर होती है? क्या इससे वे हालात बदल जाते हैं, जो हमारे किसानों की दरिद्रता, निराशा और बदहाली के मूल में हैं?

 

साईनाथ ने बताया है कि यह कदम कृषि अर्थव्यवस्था की बुनियाद, खासतौर से खेती-किसानी की स्थिरता में कारगर नहीं है, जो वास्तव में खतरे में भी है। जबकि किसानों का जीवन इसी पर टिका है। दुनिया ने जब विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास अशनि संकेत, बंगाल के भयावह अकाल को समेटती सुनील जाना की ऐतिहासिक तस्वीरों और सोमनाथ होरे की कलाकृतियों को गंभीरता से लेना शुरू किया, उससे पहले ही साईनाथ हमें बता चुके थे कि इस अंधेरे की वजह मानवजनित दरिद्रता है। लाशें कतई झूठ नहीं बोला करतीं, क्योंकि उन्हें गिना जा सकता है, जो कि एक प्रयोग-सिद्ध सुबूत भी है। मगर लाशों के इस सच से कन्नी काटी जा सकती है। यहां यदि कोई चाहे, तो किसानों की मौत के आंकड़ों को अपडेट यानी अद्यतन कर सकता है। मगर ये 
आंकड़े जहां जाकर ठहरते हैं, वह है- क्रमश: यानी आगे बढ़ते रहना।

 

30 नवंबर को हुई किसानों की रैली जन-विरोध के इतिहास में ठीक उसी तरह सहेजी जाएगी, जिस तरह पिछले मार्च में नासिक से मुंबई तक हुई 35,000 किसानों की मूक-रैली हमारे जेहन में बनी हुई है। साईनाथ व उनके सहयोगियों और देश भर में फैले किसान संघों के अन्य नेताओं, किसान सभा व योगेंद्र यादव के स्वराज अभियान जैसे किसान-असंतोष को स्वर देने वाले संगठनों द्वारा प्रेरित यह किसान मुक्ति मार्च दरअसल किसानों का खुद का आंदोलन था। उन्होंने ही इसे ऊर्जा दी, उन्होंने ही इसे आगे बढ़ाया, और उन्हीं ने यह साबित भी किया कि यह आखिर क्या है- यह तो उनकी पीड़ा की एक सहज अभिव्यक्ति है।

राष्ट्रीय पार्टियों के नेताओं का इस विरोध-प्रदर्शन में अगुवा के रूप में दिखना स्वाभाविक था। यदि मैं यह कहूं कि वे किसानों की सदाशयता और उनकी अनुमति से वहां थे, तो गलत नहीं होगा। इसी कारण उनकी वहां मौजूदगी गैर-मामूली हो जाती है। कर्ज-माफी को लेकर वे सबसे ज्यादा मुखर थे, क्योंकि यही अब तक हुआ है। मगर वहां जो कुछ हुआ, वह सिर्फ कर्ज की माफी के लिए नहीं था, बल्कि नेताओं द्वारा वह लहर बतौर उधार मांगना था, जो भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रीय असंतोष की लहर है।

भारत के किसानों और उनकी दुश्वारियों से देश की सियासी पार्टियों को अपनी ताकत बढ़ाने का वह कर्ज मिला है, जो आने वाले चुनावों में उनके लिए ईंधन का काम कर सकता है, और यह करना भी चाहिए। मगर यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि उधार मांगी गई यह लहर माफ नहीं की जाएगी। भारतीय किसान इसे ब्याज सहित वसूल करेंगे, क्योंकि यह उनका कर्ज है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)