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सुधार पर हावी सियासत : केविन रैफर्टी

मेरे पुराने मित्र मनमोहन सिंह इस वक्त आखिर क्या सोच रहे होंगे? क्या अब समय आ गया है कि वे भारत के प्रधानमंत्री पद के दायित्व से मुक्त हो जाएं और 40 वर्षो की शीर्षस्तरीय लोकसेवा के बाद रिटायरमेंट ले लें? या क्या उन्हें और सोनिया गांधी के कांग्रेस-नीत गठबंधन को इस उम्मीद में मध्यावधि चुनाव करा लेना चाहिए कि शायद युवा राजनेता सामने आएं और अपने ताजगीभरे विचारों के साथ भारत को २१वीं सदी की आकांक्षाओं और संभावनाओं तक ले जाएं? ये तमाम सवाल हाल की घटनाओं के बाद उठे हैं।

मनमोहन सिंह ने प्रस्ताव रखा था कि 500 अरब डॉलर कीमत के विशाल भारतीय रिटेल बाजार को सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोल दिया जाए, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हें यू-टर्न लेते हुए अपने इस विचार को त्यागना पड़ा। यहां चिंता का विषय रिटेल सेक्टर नहीं होना चाहिए। न ही चिंतनीय पक्ष यह है कि भारत सभी विदेशी निवेशकों के लिए अपने दरवाजे बंद कर देगा। चिंतनीय मसला राजनीतिक है।

आखिर ऐसा कैसे संभव है कि एक ऐसी सरकार, जिसके पास पर्याप्त बहुमत है, राजनीतिक परिदृश्य के साथ ही अपने ही खेमे में मौजूद विपक्षी स्वरों को भी पहचान नहीं सकी? जो सरकार इतने कम अंतराल में अपने इरादों से पीछे हट सकती है, उस पर आखिर कितना भरोसा किया जा सकता है?

बहुराष्ट्रीय उत्पादों से लदे चमचमाते शॉपिंग मॉल्स का जादू निश्चित ही भारत के बड़े शहरों और उनके उपनगरों के सिर चढ़कर बोल रहा है। महानगरों के बाहर भारत का खुला बाजार भी असीमित अवसरों और संभावनाओं से भरा पड़ा है। इनमें क्षति की संभावनाएं भी कम नहीं हैं।

भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया अनुमान लगाते हैं कि भारत की ४क् फीसदी खाद्य सामग्री बाजार तक पहुंचते-पहुंचते ही खराब हो जाती है और इसकी वजह है खराब सड़कें और अनुपयुक्त स्टोरेज। इसीलिए इस विचार ने बल पकड़ा था कि विदेशी निवेशकों को निमंत्रित कर क्वालिटी कंट्रोल की दिशा में प्रयास किए जाएं, ताकि उपभोक्ताओं तक अच्छी गुणवत्ता का उत्पाद पहुंच सके और किसानों को भी अच्छा रिटर्न मिले।

इस विचार का विरोध करने वालों ने जो भयावह तस्वीर पेश की, वह यह थी कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक आधुनिक संस्करण भारत को लूटने-खसोटने के लिए उसकी ओर कूच कर रहा है। यह हास्यास्पद था। बड़े विदेशी निवेशकों की तात्कालिक प्रतिक्रिया यह थी कि कहीं सौ फीसदी एफडीआई का प्रस्ताव भी लाल फीते की चपेट में न आ जाए। आखिर यही हुआ।

खेत से बाजार तक खाद्य सामग्री पहुंचने की प्रक्रिया रॉकेट साइंस की तरह जटिल नहीं है। लेकिन इसके बावजूद भारतीय विदेशियों की तुलना में यह ज्यादा अच्छी तरह जानते हैं कि यदि आपको पता न हो कि किसान अपने खेतों में क्या उगा रहे हैं तो यह सरल-सी प्रक्रिया भी बड़ी दुष्कर सिद्ध हो सकती है।

इसकी वजह है किसानों की आर्थिक तंगी, मानसून पर निर्भरता, खराब सड़कें और बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का चिंतनीय अभाव। भारत सांस्कृतिक और भाषिक बहुलता वाला एक विशाल और जटिल देश है। यहां ३क् करोड़ लोगों का मध्यवर्ग जहां २१वीं सदी के फैशन और उत्पादों के लिए लालायित है, वहीं एक बड़ा वर्ग उन लोगों का भी है, जिन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है और प्राथमिक स्तर की शिक्षा की चिंतनीय स्थिति के कारण वे अपने लिए अच्छी नौकरियां नहीं तलाश पाते।

इस दलील में कोई दम नहीं है कि विदेशी निवेशकों के कारण भारत की रिटेल क्रांति को एक प्रतिस्पर्धात्मक स्वरूप मिलेगा। भारत को बहुत बुनियादी चीजों पर काम करने की जरूरत है, जैसे सड़कें, शिक्षा, बिजली, किसानों का सशक्तीकरण, ताकि बिचौलिये उन्हें छल न सकें।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के कारण भारत के बुनियादी ढांचे में कुछ सुधार आ सकता था। लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि भारत की राजनीति में जिन मध्यस्थों का वर्चस्व है, उन्होंने इस पूरी बहस को हाइर्जैक कर लिया। उन्होंने खुद को किराना दुकानों के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन वे यह भूल गए कि देश के सबसे गरीब देहाती इलाकों में इस तरह की दुकानें तक नहीं हैं।

वहीं वे यह भी भूल गए कि भारत के उपभोक्ता बेहतर सेवाएं और श्रेष्ठ सस्ते उत्पाद पाना चाहते हैं। विदेशी निवेश पर राजनीतिक निर्णयों को उन्हीं मध्यस्थों द्वारा प्रभावित किया गया, जो जाति, क्षेत्र, धर्म के आधार पर सियासत करते हैं और अपनी जेबें भरते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रधानमंत्री ने उनके सामने घुटने टेक दिए और देश में सुधारों का पथ प्रशस्त करने के अपने प्राथमिक दायित्व को तिलांजलि दे दी।

मैं उन्हें पिछले चालीस सालों से जानता हूं, जब वे सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। यह एक अर्थशास्त्री और राजनयिक के लिए शीर्ष पद जरूर हो सकता है, लेकिन एक राजनेता के लिए नहीं। भारत के वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने आर्थिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वे भद्र व्यक्ति हैं और संभवत: नौकरशाही की नकेल कसने में भी सक्षम हैं, लेकिन वे भ्रष्टाचार के उस परिवेश में खुद को अपरिचित महसूस करते हैं, जो अब भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली का हिस्सा बन चुका है। हाल के दिनों तक मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी का पूर्ण राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था। लेकिन विचित्र बात है कि एकाध अवसरों को छोड़ दें तो सोनिया गांधी ने अमेरिका से अपना इलाज कराकर लौटने के बाद से ही सुर्खियों में जगह नहीं बनाई है।

रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर जो स्थिति बनी, उससे यह भी जाहिर हुआ है कि मनमोहन सिंह अब थक रहे हैं और समय आ गया है कि सोनिया के पुत्र राहुल गांधी और उनके युवा साथी अपनी योग्यता सिद्ध करें। लेकिन यह भी विचित्र बात ही है कि राहुल गांधी, जो कि कांग्रेस के महासचिव भी हैं, भी चुप्पी साधे हुए हैं। -लेखक विश्व बैंक के पूर्व मैनेजिंग एडिटर व प्लेनवर्डस मीडिया के एडिटर इन चीफ हैं।