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सुधारों से ही बदलेगी कृषि की तस्वीर - सीता

पिछले हफ्ते दो अलग-अलग राजनीतिक समूह यह दर्शाने की कोशिश करते नजर आए कि उन्हें वास्तव में किसानों के हितों की दूसरों से ज्यादा फिक्र है। इस संदर्भ में सबसे बड़ी घोषणा तो बेशक मोदी सरकार द्वारा खरीफ सीजन की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में डेढ़ गुने इजाफे को लेकर की गई। वहीं दूसरी ओर कर्नाटक की जद(एस) व कांग्रेस की साझा सरकार ने अपने पहले बजट में किसानों के लिए 34,000 करोड़ रुपए की कर्ज माफी योजना घोषित की।

 

कह सकते हैं कि किसानों की आपदा दूर करने के नाम पर सत्ताधारी वर्ग द्वारा अमूमम ऐसी ही घोषणाएं की जाती हैं, खासकर जब चुनाव नजदीक हों। लेकिन ऐसी लोक-लुभावन घोषणाओं की इनके प्रतिकूल वृहद-अर्थशास्त्रीय निहितार्थों की वजह से आलोचना भी होती है। एमएसपी में हालिया इजाफे की भी यह कहते हुए आलोचना की जा रही है कि ये उस अनुपात में नहीं है, जितना किसान उम्मीद कर रहे थे। किसान फसल की सी2 लागत पर डेढ़ गुना इजाफा चाहते हैं, जबकि यहां पर ए2 प्लस एफएल पर डेढ़ गुना इजाफे की बात हो रही है। गौरतलब है कि सी2 लागत में फसल उत्पादन हेतु प्रयुक्त नकदी और गैर-नकदी के साथ ही जमीन पर लगने वाले लीज रेंट और जमीन के अलावा दूसरी कृषि पूंजियों पर लगने वाला ब्याज भी शामिल होता है। वहीं ए2 लागत में किसानों द्वारा फसल उत्पादन में किए गए सभी तरह के नकदी खर्च जैसे बीज, खाद, रसायन, मजदूर खर्च, ईंधन खर्च, सिंचाई खर्च आदि शामिल होते हैं। ए2 प्लस एफएल लागत में नकदी खर्च के साथ ही कृषक परिवार के सदस्यों की मेहनत की अनुमानित लागत को भी जोड़ा जाता है।

 

बहरहाल, यहां बुनियादी सवाल यह है कि क्या कर्ज माफी या न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा करने जैसी कवायदों से वास्तव में किसानों का भला होता है? पहले कर्ज माफी की बात करते हैं। यदि कर्ज माफी योजनाओं से किसानों की समस्याओं का समाधान होता तो वर्ष 2008 में संप्रग सरकार द्वारा 72,000 करोड़ रुपए की भारीभरकम कर्ज माफी की जो घोषणा की गई थी, उससे तो किसानों की समस्याओं का हमेशा के लिए अंत हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि यह योजना उस मूल कारण का समाधान नहीं करती थी, जिसके चलते किसान कर्ज चुका नहीं पाते और वह है कृषि में लाभकारिता का अभाव। लिहाजा कर्ज माफी योजनाओं से किसानों के तात्कालिक कर्ज की समस्या का तो समाधान हो जाता है, किंतु वे अगले कर्जों को चुकाने में सक्षम नहीं बन पाते।

 

इसके अलावा कर्ज माफी योजनाओं से सिर्फ उन्हीं किसानों को फायदा मिल पाता है जो किसी सरकारी या सहकारी संस्था अथवा बैंक जैसे संस्थागत स्रोत से कर्ज लेते हैं। इन कर्ज माफी योजनाओं का एक बड़ा हिस्सा बड़े किसानों के खाते में चला जाता है। सीमांत किसान, जिनके पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है और जो कुल किसानों के तकरीबन 67 फीसदी हैं, अपने ज्यादातर कर्जे महाजनों या सूदखोरों, रिश्तेदारों, व्यापारियों और भू-स्वामियों से लेते हैं और इस तरह वे कर्ज माफी योजनाओं के दायरे से बाहर रह जाते हैं।

 

अब न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की बात करें तो पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने भी वर्ष 2009 के चुनाव से पहले इसमें अच्छा इजाफा किया था। लेकिन क्या इससे किसानों की बदहाली दूर होने की राह प्रशस्त हुई? ऐसा नहीं हो सका क्योंकि कुल सरकारी खरीद में से 80 फीसदी तो पांच राज्यों में ही हो रही थी और आज भी ज्यादातर किसान एमएसपी या उस सरकारी खरीद एजेंसी के बारे में नहीं जानते, जिसके तहत वे अपनी उपज को बेच सकें। ऐसे में सरकारी खरीद तंत्र को जमीनी स्तर पर प्रभावी और कारगर बनाए बगैर महज एमएसपी में इजाफे से क्या होगा?

 

इस परिप्रेक्ष्य में ओईसीडी-आईसीआरआईईआर द्वारा भारत में कृषि संबंधी नीतियों पर केंद्रित रिपोर्ट पर चर्चा लाजिमी है। इस रिपोर्ट में कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने बताया कि किस तरह एमएसपी के तहत आने वाले तमाम खेतिहर उत्पादों की बाजार कीमतें घोषित मूल्य इजाफे से कहीं कम थीं। मसलन, गुजरात के जामनगर में मूंगफली की कीमतें घोषित एमएसपी के मुकाबले 43 फीसदी कम पाई गईं, उज्जैन की मंडी में उड़द की कीमतें 59 फीसदी कम थीं और सूरत में मूंग 36 फीसदी कम भाव में बिक रही थी।

 

क्या सरकार के पास उच्च एमएसपी पर खरीद करने के वित्तीय व भौतिक संसाधन हैं, यदि बाजार इन मूल्यों को चुकाने के लिए तैयार नहीं हो? क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी का आकलन है कि यदि सरकारी खरीद पिछले साल के स्तर पर ही की जाती है तो मौजूदा एमएसपी से सरकारी खजाने पर 11,500 करोड़ रुपए का बोझ पड़ेगाा। लेकिन चूंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य बाजार कीमतों से उच्च होंगे, लिहाजा सरकारी खरीद और ज्यादा हो सकती है, इससे इसकी लागत और बढ़ेगी।

 

हमारे कहने का मतलब यह नहीं कि एमएसपी में इजाफा व कर्ज माफी योजनाओं की जरूरत नहीं। लेकिन महज इतना करना ही काफी नहीं। जिस तरह पैरासिटामोल से हमें बुखार में राहत तो मिल जाती है, लेकिन इससे बीमारी के कारणों का निदान नहीं होता। किसान बदहाल हैं, क्योंकि उनके कार्य से जुड़े हर पहलू पर सरकार का कुछ ज्यादा ही नियंत्रण है। ऐसे में उनकी मदद के लिए बनाई जाने वाली योजनाएं आखिरकार उन्हें ही चोट पहुंचाने लगती हैं। इसकी एक प्रमुख मिसाल कृषि उत्पाद विपणन समितियों की मोनोपॉली है, जिससे किसान आढ़तियों के रहमोकरम पर निर्भर होकर रह गए हैं। किसानों के पास तो यह पता करने के भी समुचित स्रोत नहीं हैं कि विभिन्न् बाजारों (यहां तक कि राज्य में ही) में क्या भाव चल रहे हैं।

 

छोटे किसान कर्ज के लिए महाजनों और अन्य अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं, क्योंकि ऐसे ज्यादातर बटाईदार किसान होते हैं और उनके पास पट्टे का औपचारिक अनुबंध नहीं होता। लिहाजा वित्त के औपचारिक स्रोतों तक उनकी पहुंच नहीं होती। अनौपचारिक बटाईदार प्रक्रिया को नियमित करने का कोई समुचित तंत्र नहीं है।

 

फिर मूल्य निर्धारण नीति में शहरी उपभोक्ताओं की पक्षधरता का भी मामला है। जैसे ही किसी उत्पाद की कीमतें शहरी उपभोक्ताओं को चुभने लगती हैं, सरकार प्रतिक्रियास्वरूप निर्यात प्रतिबंधित करने, आयात में ढील देने और उसका स्टॉक रखने की सीमा निर्धारित करने जैसे कदम उठाने लगती है। इससे किसानों के लिए कीमतें गिर जाती हैं।

 

इस संदर्भ में साख बाजार, भूमि बाजार सुधार समेत विपणन संबंधी सुधार करने भी जरूरत है। मौजूदा केंद्र सरकार ने ऐसे कुछ सुधार शुरू किए भी हैं, पर वह राज्य सरकारों को इसके लिए तैयार नहीं कर पा रही है। लेकिन इन बदलावों के बगैर, एमएसपी में वृद्धि और कृषि कर्ज माफी जैसी कवायदें भी किसानों के लिए दीर्घकाल में मददगार साबित नहीं होंगी।

 

(लेखिका आर्थिक मामलों की जानकार हैं)