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सुप्रीम कोर्ट ने सुनाए समाज और लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले फैसले

नई दिल्ली। यह साल न्यायिक संक्रांति के लिए भी याद किया जाएगा। देश की शीर्ष अदालत ने समाज और हमारे लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले कई अहम फैसले इस साल सुनाए।

जेल में बंद लोगों के निर्वाचित प्रतिनिधि बनने और दो साल से अधिक की सजा पाने वाले सांसदों-विधायकों को सदन की सदस्यता के अयोग्य करार देने जैसे चुनाव सुधारों पर ऐतिहासिक फैसलों, ‘पिंजरे में बंद’ सीबीआइ की स्वायत्तता की गुहार और यौन उत्पीड़न के आरोप में एक पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ जांच जैसे मसलों ने साल भर सुप्रीम कोर्ट को व्यस्त रखा। इस दौरान समलैंगिक यौनाचार को अपराध की श्रेणी में रखने संबंधी अदालत के फैसले की भारी आलोचना भी हुई।

कोयला खदान आबंटन और 2-जी स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाला जैसे मामलों ने जहां केंद्र और कारपोरेट जगत को पूरे साल सांसत में रखा वहीं 1993 के मुंबई विस्फोट कांड में अभिनेता संजय दत्त को दोषी ठहराते हुए पांच साल की सजा सुनाकर न्यायालय ने फिल्म जगत को भी हतप्रभ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की जांच समिति ने कानून की एक प्रशिक्षु के प्रति अशोभनीय व्यवहार और यौन प्रकृति के आचरण के लिए शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश एके गांगुली को कठघरे में खड़ा किया। एकांत में स्वेच्छा से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखने संबंधी दिल्ली हाई कोर्ट के 2009 के फैसले को निरस्त करने का फैसला सुनाने के कारण न्यायालय को भारी आलोचना झेलनी पड़ी। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भादंसं की धारा 377 संवैधानिक है। संसद चाहे तो इसमें बदलाव कर सकती है। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय के इस फैसले को समाज के विभिन्न वर्गों ने मध्ययुगीन और देश को पीछे ले जाने वाला करार दिया। इसके बाद केंद्र सरकार इस पर पुनर्विचार के लिए शीर्ष अदालत में याचिका दायर करने को बाध्य हुई।

यह साल सुप्रीम कोर्ट के चुनाव प्रणाली को भ्रष्ट तत्त्वों से मुक्त कराने की कवायद के रूप में भी याद किया जाएगा। न्यायालय ने जहां आपराधिक मामलों में दो साल से अधिक की सजा पाने वाले सांसदों-विधायकों को जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) में मिला संरक्षण खत्म करतेहुए व्यवस्था दी कि सजा सुनाए जाने के साथ ही ऐसे सदस्य सदन की सदस्यता के अयोग्य होंगे, वहीं जेल में बंद होने या पुलिस हिरासत के दौरान नेताओं के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने का भी फैसला सुनाया। न्यायालय ने राजनीतिक दलों के जनता से लोकलुभावन वादे करने, मतदाताओं को नकारात्मक मतदान का अधिकार देने और इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के साथ ही कागज की पर्ची की व्यवस्था शुरू  करने के बारे में भी अहम व्यवस्था दी।

कोयला खदानों के आबंटन में अनियमितताओं से संबंधित मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो की कार्यशैली की तीखी आलोचना करते हुए अदालत ने उसे ‘पिंजरे में बंद तोते’ और ‘मालिक की भाषा बोलने वाले’ जैसी उपमा दी। कोयला खदान आबंटन मामले की जांच को लेकर सीबीआइ और केंद्र सरकार भी न्यायालय में आमने-सामने आ गए। शीर्ष अदालत ने इस मामले की जांच में आ रही बाधाओं को दूर किया, जिसकी वजह से कोयला खदान आबंटन मामले में उद्योगपति कुमार मंलगम बिड़ला और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारख के नाम भी सामने आए।

एडीएजी के मुखिया अनिल अंबानी, भारती समूह के प्रमुख सुनील मित्तल और टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष

रतन टाटा समेत कारपोरेट जगत की कई हस्तियां अलग-अलग मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। औद्योगिक घरानों के लिए संपर्क का काम करने वाली नीरा राडिया के टैप किए गए टेलीफोन की बातचीत से मिली जानकारी के कारण परा व्यवसायी जगत न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गया। राडिया की टैप की गई बातचीत के आधार पर शीर्ष अदालत ने सीबीआइ को मामले दर्ज करने का निर्देश भी दिया।

सहारा समूह को भी सुप्रीम कोर्ट में परेशानी का सामना करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने समूह की दो सहयोगी कंपनियों से निवेशकों को 20 हजार करोड़ रुपए लौटाने संबंधी न्यायिक आदेश पर अमल के लिए पूरे साल कड़ी निगाह रखी। इसी दौरान सेबी की याचिका पर समूह के मुखिया सुब्रत राय के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की और सुब्रत राय के विदेश जाने पर रोक लगा दी। 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में भी सुब्रत राय को न्यायालय की नाराजगी झेलनी पड़ी। न्यायालय ने समाज के उपेक्षित वर्ग, महिलाओं और कमजोर तबके के संरक्षण व उनके कल्याण के बारे में भी कई आदेश दिए तो देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों के अनावश्यक उत्पीड़न मामले में पुलिस को आड़े हाथों लिया। सांसदों-विधायकों के वाहनों से लालबत्ती हटाने का निर्देश दिया।

न्यायालय ने सहजीवन की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए संसद से कहा कि इस तरह के रिश्तों से जुड़ी महिलाओं और इनसे जन्म लेने वाले बच्चों के हितों की रक्षा के लिए उचित कानून बनाया जाए। न्यायालय ने कहा कि ऐसे रिश्ते न तो अपराध हैं और न ही पाप। न्यायालय ने महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण कानून के तहत सहजीवन को ‘विवाह के स्वरूप रिश्ते’ के दायरे में शामिल करने के लिए दिशानिर्देश भी दिए। केंद्र सरकार की महत्त्वाकांक्षी आधार कार्ड योजना को उस समय झटका लगा जब शीर्ष अदालत ने इसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस मामले पर फैसला होने तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए लोगों के पास इसका होना अनिवार्य नहीं है। न्यायालय के दखल से बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की मरीजों पर दवाओं के परीक्षण की प्रक्रिया भी थम गई। केंद्र सरकार की नई औषधि मूल्य नियंत्रण नीति भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आई।

न्यायालय ने लालू प्रसाद से संबंधित चारा घोटाले के मुकदमे की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश की विशेष अदालत से यह मामला स्थानांतरित करने से इनकार करते हुए उनकी याचिका खारिज की। इसके बाद ही लालू प्रसाद को पांच साल की सजा सुनाई गई और उनकी लोकसभा सदस्यता चली गई। शीर्ष अदालत ने बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला निरस्त किया। तुलसीराम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले में भाजपा नेता अमित शाह के खिलाफ दायर याचिकाएं खारिज कीं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में भड़के सिख विरोधी दंगों से संबंधित मामलों में न्यायालय ने कांग्रेस नेता सज्जन कुमार के खिलाफ आरोप निरस्त करने से इनकार कर दिया। एक अन्य कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर को भी कोई राहत नहीं दी।

महिलाओं को तेजाब हमले से जख्मी करने की प्रवृत्ति रोकने के लिए न्यायालय ने इस अपराध को गैरजमानती बनाने का निर्देश दिया और तेजाब हमले के पीड़ितों के लिए मुआवजे की राशि तीन लाख रुपए तय की। न्यायालय ने तेजाब की बिक्री रोकने के लिए राज्य सरकारों को उचित नियम तैयार करने का निर्देश भी दिया।