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सौ फीसदी कट-ऑफ मार्क्‍स! हद है... - प्रेमपाल शर्मा

पिछले कुछ वर्षों से पूरा देश सुन रहा है दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले की ऊंची कट-ऑफ के बारे में। हर वर्ष ऊंची होती कट-ऑफ अब शत प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। पहले एक-दो कॉलेज में कट-ऑफ 100 के करीब रहती थी, अब कई कॉलेजों में हो गई है। मान भी लें अच्छी बात है - बच्चे मेहनती, मेधावी हैं तो नंबर भी अच्छे लाएंगे, लेकिन दाखिले के बाद?

क्या नंबरों की यह खुली लूट रटंतू शिक्षा को ही नहीं दर्शाती? कॉलेज में प्रतिभाओं के इस झुंड ने कोई खोज की? कोई ऐसा आविष्कार किया जिसने देश-दुनिया को बदला हो? किसी बीमारी की खोज की हो, प्राकृतिक आपदा को जानने का उपकरण बनाया हो? या सिर्फ कॉलेजों की वातानुकूलित कैंटीन, क्लासों में दो-तीन साल बिताकर और अंग्रेजी सुधारकर विदेश या बहुराष्ट्रीय कंपनियों में चले गए? देश की सिविल सेवा में भी गए तो वहां भी भ्रष्टाचार, कुशासन के अनोखे कीर्तिमान बना डाले।

ऐसी ऊंची प्रतिशतता वाले छात्र जब 'पीसा" नाम की एक अंतरराष्ट्रीय परीक्षा में बैठे तो भारत का नंबर 76 देशों में फिसड्डी क्यों रहा? और क्यों फिसड्डी रहने के डर से भारत ने इसमें अब भाग लेना भी बंद कर दिया है? सौ में सौ लाने के डंके से हम किसको मूर्ख बना रहे हैं? क्या अंग्रेजी और अमीरी के बूते शिक्षा के नाम पर स्कूली धंधा अब कॉलेज/विश्वविद्यालयों को भी अपनी चपेट में ले रहा है?

प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब 'अंतिम उदारवादी" में 'महात्मा गांधी की मार्कशीट" नाम का रोचक लेख है। उस लेख के अनुसार स्कूल में महात्मा गांधी की उपस्थिति बहुत खराब रहती थी और वार्षिक परीक्षा में 45 से 55 प्रतिशत के बीच ही अंक मिलते थे। मैट्रिक परीक्षा में शामिल 3067 बच्चों में 799 उत्तीर्ण हुए, जिसमें गांधीजी 404 वें स्थान पर रहे। उन्हें 40 प्रतिशत अंक मिले थे। क्या दुनिया ने कभी गांधीजी की मार्कशीट या डिग्री देखने की हिम्मत की? आज के मां-बाप तो खुदकुशी ही कर लें 40 फीसदी अंकों को देखकर।

95 प्रतिशत अंक लाने वाले बच्चे के पिता ऐसे उदास से थे, जैसे घर लुट गया हो। स्वाभाविक है कि बच्चा और भी परेशान कि मेरे इस विषय में दो नंबर कैसे कट गए? अब दाखिला कैसे मिलेगा? दिल्ली ने पिछले वर्षों में प्रदूषण, कानून व्यवस्था, दुर्घटना जैसे कई पैमानों पर बदनामी कमाई है। अब उसमें यह भी जुड़ रहा है कि यहां के कई कॉलेजों में दाखिला तभी मिलता है, जब आपको 99 या शत प्रतिशत अंक मिलें। दिल्ली में दाखिले की खातिर हर वर्ष फर्जी मार्कशीट बनाने का धंधा भी जोरों से चल निकला है।

ऐसे अवसरों पर याद आते हैं दुनिया को बदल देने वाले वैज्ञानिकों, लेखकों के बचपन और स्कूली दिन। आइंस्टीन 20वीं सदी के महानतम वैज्ञानिक हैं, लेकिन स्कूल में थे निपट भौंदू। मां-बाप भी उन्हें बुद्धू ही समझते थे। जैसे-तैसे विश्वविद्यालय में उनका दाखिला हुआ और आगे चलकर प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर भी हुए और नोबेल पुरस्कार भी मिला।

महान जीवविज्ञानी और विकासवाद के जनक डॉर्विन को कभी किसी स्कूल ने दाखिला नहीं दिया। और तो और, प्रोफेसर यशपाल जब अमेरिका पढ़ने गए तो प्रवेश परीक्षा में असफल रहे। भला हो अमेरिकी विश्वविद्यालयों का, जिसने एक महीने बाद प्रोफेसर यशपाल को फिर से मौका दिया। आज पूरा देश प्रोफेसर यशपाल के योगदान से परिचित है। आखिर इन सभी उदाहरणों से हम क्यों नहीं सीखते?

पूरी दुनिया शिक्षा की बेहतरी की तरफ बढ़ रही है और इस बेहतरी में सबसे अहम योगदान रहा है अपनी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने का, बच्चों को तनावमुक्त रखने का। शिक्षक और स्कूल जैसी संस्थाओं में भी बदलाव आए हैं। भारतीय संदर्भ में प्रसिद्ध शिक्षाविद 'जॉन टेलर गेट्टो" का सहारा लिया जाए तो भारतीय स्कूल-कॉलेज मूढ़ बनाने के कारखाने में तब्दील हो रहे हैं।

दुनिया के कई आश्चर्य भारतीय शिक्षा के परिदृश्य में रेखांकित किए जा सकते हैं। एक तरफ सौ में से सौ नंबर लाने वालों की संख्या सैकड़ों-हजारो में है तो दूसरी तरफ ऐसे भी हजारों-लाखों में हैं जो हैं तो आठवीं, दसवीं पास, लेकिन दूसरी-तीसरी की किताब भी नहीं पढ़ सकते। इससे भी बड़ा आश्चर्य कि वे मंत्री हैं, कानून बनाते हैं, लेकिन हर कानून तोड़कर उनके पास फर्जी डिग्रियां हैं। अफसोस यह है कि इस परिदृश्य से दुनियाभर का यकीन भारतीय विश्वविद्यालयों से हट गया है। जगतगुरु कहलाने वाले देश के नौजवान पढ़ने की ललक में दुनियाभर में मारे-मारे फिर रहे हैं। एक तरफ दिल्ली में दाखिला नहीं मिलता तो वहीं दिल्ली के करीब, नोएडा, बागपत, करनाल से लेकर बिहार के कॉलेज खाली पड़े हैं।

समस्याएं हर समाज में होती हैं, लेकिन उन्हें हल करने वाले समाज और देश ही आगे बढ़ते हैं। दसवीं तक प्रतिशतता को ग्रेड में बदलकर अच्छा ही किया है, लेकिन बारहवीं तक आते-आते फिर बेताल ताल पर। और वह भी इतने भयानक ढंग से कि इतनी ऊंची प्रतिशतता देश ने कभी नहीं देखी। ठीक इसी वक्त का एक और विरोधाभास। भारतीय नौकरशाही की सर्वोच्च परीक्षा सिविल सेवा में वर्ष 2013-14 में उन अभ्यर्थियों में से चुने और सफल घोषित किए गए हैं, जिनके 35 प्रतिशत से अधिक अंक आए थे। सर्वोच्च नौकरशाही 40 प्रतिशत से काम चला सकती है, दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज नहीं। एनसीईआरटी ने पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा के मूल्यांकन पर कुछ पहल भी की थी, लेकिन आधे-अधूरे मन से लागू सीसीई ने मामला और पेचीदा बना दिया है। शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और सीबीएसई को तुरंत हस्तक्षेप करने की जरूरत है।

वक्त आ गया है जब देश के कर्णधार, राजनीतिक दल शिक्षा के मसले पर गंभीरता से विचार करें, वरना इतिहास और दर्शन की यह बात फिर सच होगी कि शासक बदलने से सत्ता का चरित्र नहीं बदलता। शिक्षा का तो कतई नहीं बदल रहा। न नकल रुक रही, न बेईमानी। शिक्षा बर्बादी की तरफ बढ़ रही है।

-लेखक वरिष्‍ठ स्‍तंभकार हैं।