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स्त्री-पुरुष का पूरक संबंध- डा.भरत झुनझुनवाला

एक महिला को भावनात्मक गृहकार्य का सम्मान मिलेगा, तो वह गृहकार्य करना चाहेगी. यदि गृहकार्य का तिरस्कार होगा और मात्र राजनीति का सम्मान होगा, तो वह राजनीति की ओर ही बढ़ेगी. यूं तो सभी पार्टियां संसद में महिला आरक्षण को लागू करने के पक्ष में अपने को दर्शाती हैं. लेकिन उनके मन में इस कदम के पीछे प्रश्नचिह्न् है. यही कारण है कि लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने के साथ महिला आरक्षण बिल लैप्स कर गया है.

मूल मुद्दा स्त्री-पुरुष के आपसी संबंध का है. ये एक-दूसरे के ‘बराबर’ हैं अथवा पूरक हैं? बराबरी उन्हीं के बीच स्थापित हो सकती है, जिनकी क्षमताएं समान हों. जैसे दो एथलीट बराबर हो सकते हैं, लेकिन एथलीट और संगीतकार बराबर नहीं हो सकते. संगीतकार के दौड़ लगाने से या एथलीट के तान छेड़ने से इनकी बराबरी स्थापित नहीं होती है, बल्कि दोनों को भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित करने से इनमें बराबरी स्थापित हो सकती है.

प्रश्न है कि स्त्री-पुरुष की क्षमताओं में भिन्नता किस प्रकार की है? स्पष्ट है कि शारीरिक क्षमता के आधार पर इनका कार्य विभाजन आज तर्कसंगत नहीं रह गया है. आज महिला सफलतापूर्वक हवाई जहाज चला रही है, चूंकि घर संभालना आसान हो गया है. लेकिन दूसरी तरफ विकास के साथ-साथ स्त्री-पुरुष में अंतर बढ़ रहा है. ‘द इम्पीरियल एनिमल’ पुस्तक में लेखक लायनल टाइगर लिखते हैं कि प्राइमेट जाति में केवल मनुष्य ने जीविकोपाजर्न और गृह कार्य का विभाजन किया है. 

बंदर आदि प्राइमेटों में मादा स्वयं अपना जीविकोपाजर्न तथा बच्चों का पालन करती है. लेकिन मनुष्य ने महिला को बच्चों को पालने और पुरुष को जीविकोपाजर्न का कार्य अलग-अलग आवंटित किया है. मनुष्य प्रजाति को भारी मात्र में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ज्ञान का हस्तांतरण करना होता है. इतनी मात्र में ज्ञान को हमारे जींस ग्रहण नहीं कर पाते हैं. इसलिए बच्चों को लंबे समय तक शिक्षा देकर इस ज्ञान को फैलाया जाता है. इसलिए महिला के लिए लंबे समय तक परिवार का रख-रखाव अनिवार्य हो जाता है. बच्चा गली में झगड़ा करके आता है, तो मां उसे समझाती है. लेकिन ऑफिस में बास की झड़प सुन कर लौट रही मां बच्चे को भावनात्मक सहारा शायद ही दे पायेगी.

पश्चिमी देशों में 70 के दशक के बाद विचार फैला कि माता-पिता के द्वारा बच्चों के साथ ध्यानपूर्वक बिताया गया कम समय पर्याप्त होता है. इसे ‘क्वालिटी टाइम’ की संज्ञा दी गयी. सोच थी कि मां दिनभर घर से बाहर काम करे, तो भी बच्चे की अच्छी परवरिश हो सकती है. अब इस पर प्रश्न चिह्न् लगाया रहा है. ओप्राह विन्फ्रे प्रोग्राम पर रब्बी श्मूली कहते हैं कि जो बच्चे माता-पिता द्वारा अनदेखे किये जाते हैं, उनमें हीनता की भावना पैठ जाती है और वे समाज के प्रति क्रोधित दिखते हैं. मानव समाज की जटिलताओं के बढ़ने के साथ बच्चों की भावनात्मक जरूरतें बढ़ेंगी और तदनुसार मां के द्वारा मिलनेवाले भावनात्मक सहारे की भी.

विषय के दो परस्पर विरोधी पक्ष हमारे सामने हैं. एक तरफ गृह कार्य सुलभ होने से महिला का समय बच रहा है. दूसरी तरफ बच्चों की भावनात्मक परवरिश की जरूरत बढ़ रही है. ऐसे में महिला और पुरुष में राजनीति तथा जीविकोपाजर्न की बराबरी स्थापित करायी जाये. महिला को घर में बच्चों को दिये जा रहे भावनात्मक सहारे का सम्मान दिया जाये. मेरे आकलन में बराबरी का रास्ता घातक होगा, क्योंकि अगली पीढ़ी भावनात्मक स्तर पर अस्थिर एवं क्रोधी होगी. यह परिणाम आज अमेरिका में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है.

महिला पुरुष में कार्य विभाजन बुरा नहीं है. बुराई है महिला के कार्य को सम्मान न देने में. महिला को उसके गृहकार्य का सम्मान मिलेगा, तो वह गृहकार्य करना चाहेगी. यदि गृहकार्य का तिरस्कार होगा और मात्र राजनीति का सम्मान होगा, तो वह राजनीति की ओर बढ़ेगी. अत: मुद्दा राजनीति से महिला सशक्तिकरण का नहीं है. गृहकार्य का बोझ घटने से महिला सशक्त होगी, चाहे वह राजनीति करे या गृहकार्य करे. मुद्दा है समाज द्वारा महिला की किस भूमिका को सम्मान दिया जाता है.

ऐसा उपाय निकालना है कि महिला के भावनात्मक कार्य को सम्मान मिले और आत्मविकास के पर्याप्त अवसर मिलें. महिला सशक्तीकरण धनोपाजर्न के माध्यम से ही होगा इस मिथक को तोड़ना जरूरी है. लेकिन महिला को घर तक सीमित करना भी अनुचित है. राजनीति में आरक्षण से संदेश जाता है कि महिला को राजनीति में पुरुष की बराबरी करने से ही सम्मान मिलेगा. इसके स्थान पर महिलाओं के लिए अलग चुनाव क्षेत्र बनाने पर विचार करना चाहिए. तब महिलाएं ऐसे व्यक्ति को चुन सकेंगी जो उनके हित में काम करे. 

महिला सांसदों ने महिलाओं के हित में कम ही कदम उठाये हैं. अत: महिला को चुनने के स्थान पर महिला द्वारा चुनने की प्रक्रिया को अपनाना चाहिए. साथ ही कुछ कार्यो को महिलाओं के लिए सुलभ बनाना चाहिए जैसे चार घंटे की शिफ्ट बना कर अथवा प्राइमरी शिक्षा को महिलाओं के लिए आरक्षित करके. तब उसे खुली हवा मिलेगी और अगली पीढ़ी भी सशक्त होगी.