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स्वायत्तता ही अकेला विकल्प-- हरिवंश चतुर्वेदी

हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ट्विटर के माध्यम से यह घोषणा की कि पांच केंद्रीय विश्वविद्यालयों, 21 राज्य विश्वविद्यालयों, 26 निजी विश्वविद्यालयों और 10 कॉलेजों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने स्वायत्तता दे दी है। इन 62 संस्थानों को यह स्वायत्तता शैक्षणिक गुणवत्ता के आधार पर दी गई, जिसके लिए उनको नैक, बेंगलुरु द्वारा मिले स्कोर को पैमाना बनाया गया है। अब ये संस्थान अपना पाठ्यक्रम और फीस निर्धारित करने व प्रवेश प्रक्रिया तय करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त कर दिए गए हैं।


भारत की उच्च शिक्षा के विस्तार व विराट चुनौतियों की तुलना में यह सुधार घटाटोप अंधेरे में टिमटिमाते दीये की तरह है। 62 उच्च शिक्षा संस्थानों की दी गई स्वायत्तता भले ही देश की उच्च शिक्षा के एक छोटे से हिस्से को प्रभावित करें, लेकिन उससे उम्मीद जगी है कि अब उच्च शिक्षा की नौकरशाही के शिकंजे में कैद विद्या की देवी सरस्वती को भी मुक्त कराया जा सकेगा। पिछले दस वर्षों से केंद्र और राज्यों के स्तर पर उच्च शिक्षा के सुधारों को लेकर बड़े पैमाने पर चर्चाएं, बहस, संवाद व कार्यशालाएं होती रही हैं। नामी-गिरामी शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों की अध्यक्षता में कमेटियों व आयोगों को नियुक्त किया गया, जिन पर करोड़ों रुपये खर्च कर भारी-भरकम रिपोर्टें तैयार की गईं। इनमें सैम पित्रोदा की अध्यक्षता वाला राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (2006), प्रो़ यशपाल कमेटी (2009), फिक्की द्वारा मनोनीत नारायण मूर्ति कमेटी (2012) और अंबानी-बिड़ला कमेटी (2000) के नाम उल्लेखनीय हैं।


इस समय यह सवाल जरूर उठेगा कि क्या स्वायत्तता अल्लादीन का जादुई चिराग है, जो उच्च शिक्षा की सभी समस्याओं का रातोंरात हल कर देगा? सवाल यह भी उठेगा कि सरकारी और निजी क्षेत्र की नामचीन संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को तो उनके ऊंचे नैक स्कोर के आधार पर पर स्वायत्तता मिल जाएगी, किंतु समुचित वित्तीय संसाधनों के अभाव और अकुशल प्रशासन के फलस्वरूप दिवालियेपन की तरफ बढ़ रहे देश के अधिकांश सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का क्या हश्र होगा? क्या उन्हें बाजार की शक्तियों के हाथों अकाल मृत्यु का ग्रास बनने के लिए नहीं छोड़ दिया जाएगा?
उच्च शिक्षा में स्वायत्तता का विचार बहुत पुराना है। यूरोपीय पुनर्जागरण के दौरान इस विचार को और अधिक बल मिला। उच्च शिक्षा की स्वायत्तता का निहितार्थ है कि कॉलेज व विश्वविद्यालयों का वातावरण वैचारिक स्वंतत्रता, खुलेपन, नवाचार व अनुसंधान पर आधारित होना चाहिए।


इसके लिए जरूरी है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के दैनंदिन प्रबंधन में केंद्र, राज्य सरकारों, नौकरशाही, राजनीतिक दलों की दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। कुलपति व प्राचार्यों की नियुक्ति भी शिक्षाविदों द्वारा बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के होनी चाहिए। इस स्वायत्तता का विस्तार संकायों, विभागों, विश्वविद्यालय कार्यकारिणी, सीनेट, विद्वत परिषदों तक होना चाहिए। यशपाल कमेटी की यह सिफारिश थी कि विश्वविद्यालयों का प्रबंधन प्राध्यापकों के हाथों में होना चाहिए और सरकारी दखलंदाजी न्यूनतम होनी चाहिए।


आजादी के बाद का उच्च शिक्षा का इतिहास यह बताता है कि जहां पर भी स्वायत्तता के सिद्धांतों का ईमानदारी से पालन किया गया, वहां पर उच्च शिक्षा में शोध-अनुसंधान के कीर्तिमान स्थापित किए गए। आज दुनिया में भारत के आईआईएम संस्थानों में दी जाने वाली उच्च स्तरीय प्रबंध शिक्षा का लोहा माना जाता है। साठ के दशक में जब अहमदाबाद और कोलकाता में पहले दो आईआईएम स्थापित किए गए थे, तब यह प्रश्न उठा था कि उन्हें किसी विश्वविद्यालय से संबद्ध किया जाए या स्वायत्तशासी बनाया जाए। तब प्रख्यात वैज्ञानिक विक्रम साराभाई ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सुझाव दिया था कि विश्वविद्यालयों को लकीर की फकीर नौकरशाही से बचाने के लिए स्वायत्तशासी बनाया जाए। नतीजतन आईआईएम संस्थान शुरू से अपने स्नातकों को डिग्री न देकर अपना डिप्लोमा (पीजीडीएम) देते रहे। संसद द्वारा 2017 में पारित आईआईएम बिल में भी स्वायत्तता को ही प्रमुख रूप से आधार बनाया गया है।


उच्च शिक्षा में स्वायत्तता व जवाबदेही एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जिसका निहितार्थ है कि विश्वविद्यालयों व कॉलेजों के प्रबंध और दैनंदिन संचालन में किसी भी किस्म की बाहरी दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। इसी के साथ-साथ कुलपतियों और प्राचार्यों की भी जिम्मेदारी है कि वे कि वे पूरी ईमानदारी, प्रतिबद्धता से और विधि सम्मत काम करें। उन्हें सभी संबद्ध पक्षों को भरोसे में लेकर यह बताना होगा कि उनके द्वारा सभी निर्णय जनतांत्रिक ढंग व संस्था के संविधान के अनुरूप लिए गए हैं। इसके बाद अब अच्छी क्वालिटी वाले हजारों अन्य संस्थान भी स्वायत्तता की मांग करेंगे। इसके लिए जरूरी होगा कि नैक और एनबीए के अलावा कुछ अन्य एजेंसियों को भी इस काम में लगाया जाए।
स्वायत्तता के मुद्दे पर कुछ शिक्षाविदों, शिक्षक संगठनों व विद्यार्थी संगठनों में यह संशय है कि इसकी आड़ में कहीं केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पोषित सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के अलावा अनुदानित महाविद्यालयों का धीरे-धीरे निजीकरण न कर दिया जाए।


निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को भी स्वायत्तता लेने के बाद अपनी सामाजिक जवाबदेही के प्रति सजग रहना चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके द्वार किसी भी गरीब या निम्न मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले प्रतिभाशाली युवा के लिए इसलिए न बंद कर दिए जाएं कि उनके मां-बाप इन संस्थानों की भारी फीस नहीं जुटा सकते। इसके लिए निजी क्षेत्र के संस्थानों को बड़ी मात्रा में छात्रवृत्तियां व शुल्क मुक्ति देनी चाहिए। उच्च शिक्षा ने देश की अर्थव्यवस्था, शासन, सुरक्षा और नवाचार को शक्ति प्रदान की है। बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली का एक अवगुण यह रहा है कि तमाम राजनीतिक दल सत्ता पाने की होड़ में कॉलेजों व यूनिवर्सिटियों में अपने पांव जमाने के लिए उनके दैनिक कामकाज व नियुक्तियों में हस्तक्षेप करने लगे हैं। अगर हमें भारत की उच्च शिक्षा को पटरी पर लाना है, तो हमारे पास एक ही विकल्प है स्वायत्तता और जवाबदेही।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)