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हिमालय पर संकट: आपदाओं पर अंकुश के लिए पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी

डाउन टू अर्थ, 11 अक्टूबर

हिमालय में बढ़ती आपदाओं पर अंकुश लगाने के लिए ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर योजनाएं बनानी होंगी और स्थानीय लोगों के पारंपरिक ज्ञान को आधार बनाना होगा। हिमालय के पर्यावरण पर काम कर रही संस्था हिमधरा पर्यावरण समूह द्वारा ‘हिमालय में आपदा-निर्माण’ नामक रिपोर्ट का सारांश यही है।

यह रिपोर्ट 10 अक्टूबर 2023 को जारी की गई। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में भूस्खलन के खतरों पर सामुदायिक दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करने वाली यह रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि देश में आपदा नीति और कानून 2005 में बन गए थे, लेकिन यह आपदाओं के 'प्रबंधन' जिसमें रेस्क्यू और स्थिति को सामान्य में लाने तक ही सीमित है, जबकि आपदाओं की हालिया घटनाओं से साफ हो गया है कि वैज्ञानिक तथ्यों की अनदेखी की वजह से आपदाएं बढ़ रही हैं।

रिपोर्ट ऑनलाइन प्रेस वार्ता में जारी की गई। जिसका संचालन द स्क्रोल की क्लाइमेट रिपोर्टर वैष्णवी राठोर ने किया। इस वार्ता में हिमधरा पर्यावरण समूह से मान्शी आशर, हिमशी सिंह और प्रकाश भंडारी शामिल हुए और किन्नौर से रोशन लाल नेगी, जिया लाल नेगी व प्रमिति नेगी शामिल हुए।

अध्ययन के लिए चुना गया किन्नौर एक बहु-जोखिम क्षेत्र है, जहां सरकार द्वारा 1500 से अधिक भूस्खलन संभावित स्थलों की पहचान की गई है। हिमशी सिंह ने बताया कि किन्नौर के तीन उप-जलवायु क्षेत्रों में फैले 22 गांवों में लोगों से बातचीत की गई। मई 2023 में रिकांग पियो में एक सार्वजनिक परामर्श आयोजित किया गया। अध्ययन का उद्देश्य जोखिम-ग्रस्त परिदृश्य में रहने के बारे में स्थानीय समुदाय की धारणाओं को समझना था।
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