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हमारी अम्मा, दीदी और बहनजी - मृणाल पांडे

हालिया चुनावों के नतीजों के साथ ही दो कद्दावर महिला मुख्यमंत्रियों (जयललिता और ममता बनर्जी) ने तमाम ऐतिहासिक साक्ष्यों को नकारते हुए दोबारा अपनी राजनैतिक ताकत का लोहा मनवा लिया। गुजरात में आनंदीबेन की कुर्सी फिलवक्त तो सुरक्षित लगती ही है। अब यदि उत्तर प्रदेश में भी अगले बरस बहिन मायावतीजी फिर सत्ता में आ जाती हैं, तो देश के चार महत्वपूर्ण राज्यों की कमान ताकतवर महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों में होगी। इन हाईकमानों के कार्यकाल के कतिपय विवादास्पद ब्योरों और उनमें अपेक्षित महिलासुलभ दब्बूपने के अभाव तथा गठजोड़ साधने को लेकर गर्वीली विमुखता की लोग जितनी चाहे निंदा करें, लेकिन उनकी ही जैसी हनक वाले महत्वाकांक्षी और सफल पुरुषों को भी उनकी पार्टियों ने कई दशकों से हाईकमान के बतौर बार-बार स्वीकारा है। फिर महिला राजनेताओं पर ही निशाने क्यों साधे जाएं? भारतीय लोकतंत्र में ही कुछ ऐसे आंतरिक रसायन हैं, जिनकी वजह से राजनैतिक दल और वोटर, उदार लोकतांत्रिकता पर तमाम जिरह के बाद एक सख्तदिल और करिश्माती छवि वाले दलीय नेता पर ही भरोसा करना पसंद करते हैं।

आजादी के छह दशक बाद भी हमारे यहां संसद से सड़क और दफ्तर से घर तक सत्ता का लीवर पुरुषों के नियंत्रण में ही रहा आया है। यही हाल मीडिया उद्योग और अर्थजगत का भी है। इसलिए इन तमाम धंधों के सफल टेम्प्लेट पुरुष निर्मित हैं। हर क्षेत्र में लैंगिक भेदभाव, शहरीकरण के प्रति रुझान और अपनी निजी ब्रांडिंग के लिए दमनकारी तानाशाही अपनाना नेता के लिए अपने दल व वोटर पर जकड़ बनाए रखने की इकलौती गारंटी बन गई है। इंदिरा से जया तक तमाम सफल महिला राजनेताओं ने पुरुषों जैसा ही नायकत्व का बाना अंगीकार किया है। वजह यह, कि वे भी समझती हैं कि पार्टियों के भीतर भावनाओं का उफान बिलाते देर नहीं लगती और विफल होने पर नेता के खिलाफ शक और कानाफूसी की छुरियां तुरत निकल आती हैं। यदि वह महिला हो और अकेली हो तब तो तमाम तरह के और लांछन लगते भी देर नहीं होती। इसलिए भारत में हर महिला नेता के लिए आज की तारीख में दो चुनौतियां हैं : एक, अपनी पार्टी के बीच भी अपनी असली भावनाएं और रणनीति गोपनीय रखते हुए एक रहस्यमय वलय अपने गिर्द रचने की क्षमता। और दो, जनता के बीच आमजन के प्रति अपनी गहरी चिंता का सार्वजिनक ढिंढोरा पीटते हुए वित्तीय प्राथमिकताओं को ताक पर रखकर भी लगातार तमाम तरह की लोकलुभावन योजनाएं यथा दो रुपए किलो चावल, एक रुपए की इडली, छात्रों के लिए अम्मा, दीदी या बहनजी के चेहरे का छापा लिए साइकिल या लैपटॉप वगैरा विमोचित करते रहना। इससे कम से कम बहुसंख्य गरीबों के मन में तो उनके हितस्वार्थ से जुडी स्वामिभक्ति उपजाई ही जा सकती है। साथ ही बाहरी या दलीय चुनौतियों के खिलाफ एक मजबूत ढाल भी मिल जाती है। महिला नेत्रियों ने राष्ट्रीय दलों और उनके गठजोड़ों को चित कर इस बार जो ऐतिहासिक जीत दोबारा हासिल की है, उससे साफ है कि आज दल के पुरुष नेताओं को खुद से नीचे बिठाने, उनसे सार्वजनिक दंडवत करवाने और महिलाओं की झोलियों में सतत स्वामिभक्ति के पुरस्कार डालने वाली, उनकी भाषा में बतियाने वाली अम्मा या दीदी महिलाओं के वोटबैंक को तो सर्वसंभव और अपनी इकलौती हितैषी नजर आती हैं।

हां, एक जमाना जरूर था, जब इस तरह के कदमों की गांधी, नेहरू, तिलक और गोखले सरीखे नेताओं को जरूरत नहीं पड़ती थी। पर तब भी निष्क्रिय जनता को सक्रिय बनाने के लिए आमरण अनशन, नमक बनाने, विदेशी वस्त्रों की होली जलाने और सरकारी दफ्तरों पर तिरंगा फहराने सरीखे नाटकीय (आप चाहें तो उनको स्त्रैण कह लें) टोटके अपनाए गए थे। इससे जन्मा बयालीस का आंदोलन भावनात्मक उफान के साथ एक राष्ट्रीय रूप से संगठित मोर्चा बना सका, जिसके नेता जनता के बीच और उनके साथ खड़े होकर पूरे देशवासियों के जीवन की बेहतरी और न्याय के लिए समवेत लड़ सकते थे। महिलाओं की शिरकत इसमें बहुत काम आई, पर उसे लेकर पुरुष-बहुल नेतृत्व में शुरू में झिझक थी। वह तो सरोजिनी नायडु और फिर कमला देवी ने दांडी यात्रा में महिलाओं को शामिल न करने की बापू की जिद के खिलाफ अपनी जिद बेझिझक भिड़ाकर महिलाओं को नमक सत्याग्रह से जुड़वाया और मुंबई में घर और सरकारी दफ्तरों में घुसकर पवित्र आजादी नमक की थैलियां बेचकर राशि हरिजन फंड में भी जमा कराईं। जब प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी से लेकर सुभद्रा कुमारी सरीखी कवयित्रियां भी आंदोलनकारियों के साथ जेल गईं तो वह भले ही रामसेतु निर्माण में गिलहरी का योगदान था, पर उसका भारी प्रतीकात्मक महत्व बना। और उसी का गतिशास्त्र आजादी के बाद अगली पीढ़ी की महिलाओं को अपने हक की लड़ाई लड़ने को प्रेरित करता रहा।

2016 तक आते हुए वह आर्केस्ट्रा युग, जब कई साज एकसाथ सुरीला संगीत पैदा किया करते थे, वोटों के खेमों में बिखर गया है और एकल गायन के युग में हर वोट बैंक अपनी ढपली पर अपने गुट व क्षेत्र के लिए खास रागिनी गा बजा रहा है। 1942 तक एक ही लक्ष्य था विदेशी हुकूमत से आजादी। पर लोकतंत्र के लंबे मंथन के बाद आज अनेक तरह के वर्गों व क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के नए साज बजने को हुमक रहे हैं। अर्थनीति या राजनीति के पुरोधाओं के पास कोई राष्ट्रीय कंडक्टर नहीं, जो इन साजों का ऑर्केस्ट्रा सफलता से बजवा सके। लगातार टकराते विवादी स्वरों : शहरी बनाम ग्रामीण, महिला बनाम पुरुष, खेतीबारी-हस्त उद्योग बनाम बड़े उपक्रम, युवा बनाम गैर युवा, अवर्ण बनाम सवर्ण - किस-किस स्वर की वे चिंता करें? इसको कंधा देने वाले क्षेत्रीय नेतृत्व के ताकतवर बनने का रहस्य यही है।

तमाम वोटबैंकों से प्रेरणा लेकर इधर शिक्षा, स्वास्थ्य कल्याण, घर-बाहर सुरक्षा इन मुद्दों को लेकर हर आयुवर्ग की आम शहरी, ग्रामीण महिलाएं काफी मुखर हो गई हैं। और उनको बड़े दलों के बजाय अपने इलाके की अम्मा, दीदी या बहनजी का तेवर पसंद आता है। नेत्रियां भी समझती हैं कि महिलाओं के एकजुट वोटों का वजन क्या है, लिहाजा जनापवाद की परवाह किए बिना हर चुनाव से पहले खासकर बहनों के लिए खुले हाथों से इमदाद बांटकर महिला वोटरों को सफलता से खींच रही हैं। अम्मा या दीदी की जीत पर शंख-घंट बजाकर रंग उड़ाने और उन्मुक्तता से नाचती महिलाओं की खुशी इसी परिप्रेक्ष्य में देखी-गुनी जानी चाहिए। राजनीति से दूर, पुरुष नेताओं द्वारा उपेक्षित महिला वोटर यदि अपनी नेता का प्यार व महत्व सिर्फ पैसे और सबसिडी से ही मापकर उनको जिताएं तो यह बहुत सराहनीय स्थिति नहीं, पर भारतीय चुनावों की एक बड़ी जमीनी सचाई तो यह बन ही गई है।

(लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)